रॉयल एनफील्ड और यामाहा मज़दूरों का लंबा संघर्ष

रॉयल एनफील्ड और यामाहा मोटरसाइकिल कंपनियों के मज़दूरों ने अपना 50 दिनों का लंबा संघर्ष 13 नवंबर, 2018 को ख़त्म कर दिया। ये दोनों कंपनियां चेन्नई के नजदीक ओरगडम औद्योगिक शहर में बसी हुई हैं। मज़दूरों का यह संघर्ष उनके लिए अपूर्ण जीत के साथ ख़त्म हुआ।

इन कंपनियों के मज़दूर काम की अत्याधिक शोषक परिस्थतियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं।

मज़दूर एकता लहर के संवाददाता से बातचीत के दौरान यामाहा एम्प्लाइज यूनियन के महासचिव कामरेड उदयकुमार ने बताया कि यामाहा कंपनी के स्थायी मज़दूरों ने अपनी खुद की यूनियन बनाने के अधिकार की हिफ़ाज़त में अनिष्चितकालीन हड़ताल की थी। मज़दूरों द्वारा खुद की यूनियन बनाने के प्रयास में प्रबंधन ने दो मज़दूर कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया था। ये मज़दूर अपनी नौकरी की बहाली के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

Royal Enfield

वर्किंग पीपल ट्रेड यूनियन कौंसिल के उपाध्यक्ष कामरेड संपत ने रॉयल एनफील्ड फैक्ट्री में काम की हालतों के बारे में विस्तार से बताया। रॉयल एनफील्ड की ओरगडम फैक्ट्री 6 वर्ष पहले शुरू की गयी है और इसमें 750 स्थायी मज़दूर, 3000 अप्रेंटिस और 2000 ठेका मज़दूर काम कर रहे हैं। इसी कंपनी की वल्लम स्थित फैक्ट्री में 140 स्थायी मज़दूर और 3000 अप्रेंटिस या ठेका मज़दूर काम कर रहे हैं। मई 2018 को इन मज़दूरों ने अपनी खुद की यूनियन बनाई। इस यूनियन के लिए ठेका मज़दूरों और अप्रेंटिसों के बीच समर्थन को देखते हुए प्रबंधन ने सितम्बर में 120 अप्रेंटिस मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया ताकि बाकी अप्रेंटिसों और ठेका मज़दूरों में दहशत फैलाई जा सके। प्रबंधन के इस क़दम के ख़िलाफ़ 24 सितम्बर, 2018 को मज़दूरों ने हड़ताल कर दी।

कामरेड संपत ने बताया कि रॉयल एनफील्ड और यामाहा कंपनी के मज़दूर अपना संघर्ष हर क़दम पर मिलकर चला रहे हैं। इन दोनों कंपनियों के नौजवान मज़दूर संघर्ष के लिए आगे आये हैं। उन्होंने बताया कि ख़ास तौर से रॉयल एनफील्ड कंपनी के सभी मज़दूर – स्थायी, अप्रेंटिस और ठेका मज़दूर, एकजुट होकर संघर्ष चला रहे हैं। ये मज़दूर निर्धारित अवधि का रोज़गार (फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट) और नीम स्कीम (एन.ई.ई.एम.) के ख़िलाफ़ भी संघर्ष चला रहे हैं।

रॉयल एनफील्ड एम्प्लाइज यूनियन ओरगडम के महासचिव कामरेड सेल्वा कुमार ने बताया कि सरकार का रवैया पूरी तरह से मज़दूर-विरोधी है। “श्रम विभाग, सरकार और पुलिस सभी अलग-अलग तरीक़ों से मज़दूरों के संघर्ष को कुचलने के कोशिश कर रहे हैं। मज़दूरों ने हड़ताल इसलिए की क्योंकि ये कंपनियां मज़दूरों के कानूनी अधिकारों को मानने से इंकार कर रही हैं। और दरअसल सरकार को इसके लिए पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। सवाल तो यह है कि सरकार इन पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है, जो कानून का उल्लंघन कर रहे हैं?”

इन 50 दिनों के संघर्ष के दौरान इन दोनों फैक्ट्रियों के मज़दूरों के साथ-साथ उनके परिजन भी कई कार्यक्रमों में शामिल हुए और उन्होंने मज़दूरों की जायज़ मांगों का समर्थन किया। इसके चलते श्रम विभाग मज़दूरों की जायज़ मांगों को मानने के लिए मजबूर हो गया लेकिन उसे भी मानना पड़ा कि वह पूंजीपतियों को मज़दूरों की मांगें पूरी करने के लिये बाध्य करने में असहाय है।

इन दोनों कंपनियों के एकजुट संघर्ष के लिए पूरे तमिलनाडु से मज़दूरों का समर्थन मिला। थोझीलालार ओत्रुमई इयक्कम, एल.पी.एफ., सीटू, ए.आई.टी.यू.सी., एच.एम.एस., ए.आई.सी.सी.टी.यू., डब्ल्यू.पी.टी.यू.सी., डी.एम.डी.एस.पी., डी.डी.एस.एफ., एफ.आई.टी.ई., सहित कई और मज़दूर संगठनों ने मज़दूरों के संघर्ष का समर्थन किया। 16 अक्तूबर को तमिलनाडु की सभी मज़दूर यूनियनों ने इस मसले पर संयुक्त प्रदर्शन आयोजित किया था। मज़दूरों ने यामाहा के कई शोरूमों के सामने प्रदर्शन आयोजित किये।

सीटू की तमिलनाडु राज्य समिति के अध्यक्ष कामरेड सुंदरराजन ने बताया कि यामाहा कंपनी के प्रबंधन ने न केवल मज़दूरों द्वारा अपनी पसंद की यूनियन बनाने के उनके अधिकार का उल्लंघन किया है बल्कि उसने ठेका मज़दूर अधिनियम और अप्रेंटिस अधिनियम और अन्य कई कानूनों का उल्लंघन भी किया है। “तमिलनाडु की सरकार और उसका श्रम विभाग कानून का उल्लंघन करने वाले पूंजीपतियों का समर्थन करती है… सरमायदारी पार्टियां और राज्य के अधिकारी भी पूंजीपतियों के हित में काम कर रहे हैं। यह हड़ताल इस तथ्य को मज़दूरों के बीच स्पष्ट करने का काम कर रही है।”

ए.आई.टी.यू.सी. की तमिलनाडु राज्य समिति के महासचिव कामरेड टी.एम. मूर्ति ने इस संघर्ष की वजह से मज़दूरों की मानसिकता में हुए बदलाव के बारे में बताते हुए कहा कि “यह संघर्ष मज़दूरों के लिए अपने रोज़गार की हिफा़ज़त का संघर्ष है। निर्धारित अवधि का रोज़गार और नीम जैसे कानून मज़दूरों के स्थायी रोज़गार को ख़त्म करने के लिए बनाये गए हैं। ये कानून रॉयल एनफील्ड और यामाहा, इन दोनों कंपनियों में लागू किये गए हैं। इसलिए इन कानूनों के अमल का विरोध करने के लिए यह संघर्ष बहुत ज़रूरी है। अपनी पसंद की यूनियन बनाने के अधिकार की हिफ़ाज़त में उठ खड़े होने के लिए हम सभी को इन मज़दूरों की हिम्मत को बधाई देनी चाहिए। जब सारे पूंजीपति बड़ी अकड़ के साथ यह ऐलान कर रहे हैं कि उन्होंने मज़दूर यूनियनों को तहस-नहस कर दिया है, तो ऐसे वक़्त में यह संघर्ष चलाना हम सबके लिए बड़े गर्व की बात है और हम इसका स्वागत करते हैं।

हमें वर्ग चेतना के आधार पर राजनीति का निर्माण करना होगा। अपने सघर्ष को और अधिक व्यापक आधार पर खड़ा करने का यह सही मौका है। हमें सभी ट्रेड यूनियनों के बीच एकता बनानी होगी। अपने वर्ग की जीत के लिए सभी ट्रेड यूनियनों को एकजुट होकर लड़ना होगा।”

इस संघर्ष के दौरान रॉयल एनफील्ड और यामाहा के मज़दूरों ने इस औद्योगिक क्षेत्र के सभी मज़दूरों की एकता बनाने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगा दिया। उन्होंने सभी कंपनियों के मज़दूरों को समझाया कि उनका यह संघर्ष एक है, एक ही मकसद के लिए, एक ही वर्ग दुश्मन यानी पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ है। मज़दूरों के परिवारों ने भी इन संघर्षों में ज़ोर-शोर से हिस्सा लिया। मज़दूरों ने इस औद्योगिक क्षेत्र की तमाम यूनियनों की एक संयुक्त समिति का गठन किया जो फैक्ट्री स्तर पर काम करती है। उन सभी मज़दूरों ने पूरे ज़ोर-शोर के साथ इस संघर्ष में भाग लिया। उन्होंने मज़दूरों के सभी तबकों की मांगों को उठाया और श्रम अधिकारों पर हमलों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई।

देश भर में अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर लगातार सचेत तरीक़े से अपने वर्ग की एकता बना रहे हैं और अपनी पार्टी और यूनियन संबंधों से ऊपर उठकर, संघर्ष के हथियार बतौर, अपने संगठनों का निर्माण कर रहे हैं। ओरगडम के मज़दूरों का संघर्ष एक बार फिर इस बात की पुष्टि करता है।