आई.एल. एंड एफ.एस. संकट से मज़दूरों व सैनिकों की बचत को ख़तरा

हमारे देश के सबसे बड़े गैर-बैंक वित्तीय संस्थानों में से एक इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज़ (आई.एल. एंड एफ.एस.) है। आई.एल. एंड एफ.एस. का आर्थिक संकट लाखों मज़दूरों और सैनिकों की सेवानिवृत्ति निधि पर भारी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

हमारे देश के सबसे बड़े गैरबैंक वित्तीय संस्थानों में से एक इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज़ (आई.एल. एंड एफ.एस.) है। आई.एल. एंड एफ.एस. का आर्थिक संकट लाखों मज़दूरों और सैनिकों की सेवानिवृत्ति निधि पर भारी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

आई.एल. एंड एफ.एस. एक ऐसी कंपनी है जिसका मुख्य व्यवसाय, विभिन्न बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्तीय मदद प्रदान करने के लिए, पेंशन फंड और भविष्य निधि सहित विभिन्न स्रोतों से पैसे जुटाना है। इस पर भारतीय जीवन बीमा निगम (एल.आई.सी.), आबू धाबी निवेश प्राधिकरण (.डी.आई..) और जापान स्थित ओरिक्स समूह के नेतृत्व के साथ कई अन्य वित्तीय संस्थानों की संयुक्त मालिकी है। सितंबर 2018 से शुरू होकर, इसने बड़े पैमाने पर अपने बकाया ऋणों की भरपाई करने में चूक करना शुरू कर दिया है जिसकी क़ीमत 94,000 करोड़ रुपये से अधिक है।

ऋण की भरपाई से चूकने के बाद, आई.एल. एंड एफ.एस. को एक नई राज्यनियुक्त प्रबंधन टीम के तहत लाया गया है। एक बचाव अभियान लागू किया जा रहा है, जिसमें कंपनियों के इस समूह के बकाया ऋण का एक बड़ा हिस्सा माफ़ करने की योजना शामिल है।

भविष्य निधि और पेंशन फंड ट्रस्टों ने मिलकर, आई.एल. एंड एफ.एस. समूह के बान्ड्स में, हजारों करोड़ रुपयों का निवेश किया है। इन बांडों को क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा कम जोखिमके रूप में प्रचारित किया गया था, जिससे पेंशन और भविष्य निधि के प्रबंधकों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। संकट और सरकार के बचाव के उपायों के बाद, कम जोखिम के रूप में प्रचारित किया गया यह तमाशा, अचानक अत्यधिक जोखिम भरा हो गया है।

वाणिज्यिक बैंकों से आई.एल. और एफ.एस. द्वारा लिए गए ऋण आम तौर पर उत्पादक संपत्तियों की सुरक्षा के खिलाफ़ होते हैं। हालांकि, अगर हम इस कंपनी के बान्ड की बात करें, जो पेंशन और भविष्य निधि के पास हैं, तब ये मामला उल्टा है। वे सारे बांड असुरक्षितदेनदारियां हैं। असुरक्षित बांड रखने वालों के लिए नुकसान का जोखिम बहुत अधिक है।

अब तक, 50 से अधिक निधि कंपनियां जो 14 लाख से अधिक कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति लाभों का प्रबंधन करती हैं, उन्होंने आई.एल. एंड एफ.एस. के बांड में निवेश किया है। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों जैसे एम.एम.टी.सी., इंडियन ऑयल, सिडको, हुडको, आई.डी.बी.आई., एस.बी.आई. और गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के राज्य बिजली बोर्ड के मज़दूर शामिल हैं। यहां तक कि उसमें सेना के कई सैनिकों की सेवानिवृत्ति निधि भी शामिल करते हैं।

लाखों मज़दूरों और सैनिकों की मेहनत से की गई बचत अब डूबने के ख़तरे में है। कई मज़दूर संघों और महासंघों ने आई.एल. एंड एफ.एस. से अपने बकाया की वसूली के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज़ की है।

किसी भी समाज में उधार लेने और उधार देने वाले संस्थान एक आवश्यक तत्व हैं जिनकी वस्तुगत ज़रूरतों की चीजें बाज़ार में खरीदी या बेची जाती हैं। इस समय पूंजीवादी देशों के साथ समस्या यह है कि अपने स्वयं के मुनाफ़े को अधिकतम करने के मक़सद से संचालित वित्तीय संस्थान विशाल पैमाने पर पहुंच गए हैं। वे लोगों की बचत से जुआ खेलते हैं। जब वे अपने ऋण की भरपाई करने में असमर्थ होते हैं, तो सरकार ऐसे संस्थानों के बचाव के लिए उस संकट का बोझ लोगों की पीठ पर लाद देती है। उन लोगों पर जो अपनी बचत की राशि इन कंपनियों के पास जमा करते हैं।

समाज की सेवा करने वाले संस्थान बतौर काम करने के बजाय, बैंक और गैरबैंक वित्तीय संस्थान दोनों ही मज़दूरों को लूटने के लिए एक साधन के रूप में काम कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *