वेनेजुएला में संकट के लिए कौन और क्या जिम्मेदार है?

साम्राज्यवादी यह तर्क देते हैं कि वेनेजुएला के मौजूदा संकट के लिए समाजवाद और मादुरो की गैरजनतान्त्रिक सरकार ज़िम्मेदार है। लेकिन यह सरासर झूठ और फरेब है, क्योंकि यह साफ़ नज़र आता है कि असली समस्या अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा वेनेजुएला के मसलों में दखलंदाज़ी है। यह केवल अभी की बात नहीं है, बल्कि कई दशकों से ऐसा चलता आ रहा है और साम्राज्यवादियों की दखलंदाज़ी बारबार वेनेजुएला को संकट की कगार पर खड़ा कर देती है।

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वेनेजुएला में अमरीकी दखलंदाजी के खिलाफ़ दुनिया भर में हुए प्रदर्शन् (वेंकूवर, कनाडा और वाशिंगटन, यू.एस.ए.)

20वीं सदी में जबसे वेनेजुएला में तेल की खोज की गयी थी, उसी समय से ये क़ीमती संसाधन पश्चिमी साम्राज्यवादियों के अधीन रहे हैं, जिनका सरगना अमरीका है। 1970 के दश  में वेनेजुएला के तेल क्षेत्र का राष्ट्रीकरण किया गया लेकिन इसके बावजूद अमरीका द्वारा बैठाई गयी कठपुतली सरकार की हुकूमत में इसे अमरीका को सस्ते दामों पर बेचा जाता रहा। इसके चलते वेनेजुएला को अपने आर्थिक विकास के लिए पूरी तरह से इस संसाधन पर निर्भर बना दिया गया और उपभोग की तमाम अन्य वस्तुओं का आयात किया जाने लगा। इस प्रक्रिया के चलते वेनेजुएला में 1980 और 1990 में बड़ा संकट खड़ा हो गया जिसका नतीजा विशाल जनआंदलनों के रूप में सामने आया।

इन विशाल लोकप्रिय जनआंदोलनों की लहर पर 1998 में ह्यूगो शावेज़ सत्ता में चुनकर आये। शावेज़ की सरकार ने वेनेजुएला के तेल के बाज़ार का विस्तार किया और उसमें विविधता लाये, जो कि अब तक पूरी तरह से अमरीका पर निर्भर था। शावेज़ सरकार के इस क़दम से अमरीका तिलमिला उठा। इसके अलावा शावेज़ सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था में भी विविधता लाने और उसका विस्तार करने की ओर क़दम उठाये और कृषि और उत्पादन क्षेत्र का विकास किया। इससे पहले वह खाद्य और उपभोग की अन्य वस्तुओं के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर था। वेनेजुएला के इतिहास में पहली बार तेल से हुई कमाई को मेहनतकश लोगों के लिए आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर निवेश किया जाने लगा।

वेनेजुएला सरकार की आज़ादी और उसके द्वारा ली गयी पहल से अमरीकी साम्राज्यवादी बेहद गुस्सा हुए। उन्होंने सऊदी अरब जैसे अपने पिट्ठू देशों के साथ सांठगांठ करते हुए 2014 से कच्चे तेल के उत्पादन को बढ़ा दिया, जिससे तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट आ गई। इसका प्रतिकूल असर न केवल वेनेजुएला पर बल्कि अन्य तेलउत्पादक देशों पर भी हुआ, जो कि अमरीका के निशाने पर थे, जैसे कि रूस और ईरान। इसके बाद अमरीका ने वेनेजुएला पर आर्थिक प्रतिबंधों की जंग छेड़ दी, जिसकी शुरुआत ओबामा ने की थी।

 us-hands-off-venezuelaइन आर्थिक प्रतिबंधों के चलते वेनेजुएला को अरबों डालर का नुकसान हुआ और खाद्य वस्तुओं और दवाइयों, जैसी आवश्यक वस्तुओं का आयात करने में भारी दिक्कत का सामना करना पड़ा। अमरीका ने वेनेजुएला में जनरल मोटर्स (जी.एम.) जैसी अमरीकी कंपनियों को मनमाने ढंग से बंद कर दिया और सैकड़ों मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया। पहले ह्यूगो शावेज़ और उसके बाद निकोलस मादुरो की सरकार ने इस संकट से बाहर निकलने और अमरीका द्वारा थोपे गए पेट्रोडालर मानक से बाहर निकलने के लिए ख़ास तौर से चीन के साथ करीबी आर्थिक संबंध बनाने की कोशिश की। वेनेजुएला के इन प्रयासों के चलते ट्रम्प की अगुवाई में अमरीकी साम्राज्यवाद ने वेनेजुएला पर आर्थिक प्रतिबंधों को और अधिक कड़ा करने का फैसला किया। ब्रिटेन जैसे अपने सहयोगीदेशों के साथ मिलकर अमरीका ने गैरकानूनी तरीके से इन देशों के पास जमा वेनेजुएला के सोने के भण्डार पर रोक लगा दी। इस सोने के भंडार का इस्तेमाल करके तेल की बिक्री से होने वाली आमदनी में हुई गिरावट की भरपाई की जा सकती थी और इस संकट से बाहर निकला जा सकता था।

इन सभी घटनाओं से हम साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि अमरीकी साम्राज्यवाद ने अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वेनेजुएला को संकट की ओर धकेला है और इस संकट के लिए शावेज़ और मादुरो की सरकार के तहत वेनेजुएला का समाजवादबिल्कुल भी ज़िम्मेदार नहीं है, जैसे कि साम्राज्यवादी प्रचार हमें बताने की कोशिश कर रहा है।

लैटिन अमरीका में अमरीकी साम्राज्यवाद की दखलंदाज़ी का इतिहास बारबार दोहराया गया है!

साम्राज्यवादी दिनरात यह प्रचार करते रहते हैं कि वे वेनेजुएला में केवल मानवीयआधार पर हस्तक्षेप कर रहे हैं, क्योंकि मादुरो की सरकार गैरजनतान्त्रिकहै। लेकिन उनका यह दावा सरासर झूठा साबित होता है, क्योंकि यदि हम ज़रा इतिहास में झांककर देखेंगे तो पता चलेगा कि अमरीकी साम्राज्यवाद ने बारबार मध्य और लातिन अमरीका में सैनिकी और अन्य तरीके से दखलंदाज़ी करने की कोशिश की है, ताकि वह अपनी पसंद की फ़ासीवादी और साम्राज्यवादपरस्त सत्ता को क़ायम कर सके और उसे बढ़ावा दे सके।

  • 1823 में जारी की गयी मोनरो डॉक्ट्रिन (मोनरो सिद्धांत) के तहत संयुक्त राज्य अमरीका खुद को पूरे अमरीकी महाद्वीप का हवलदार बनने का अधिकार देता है। उस समय से अमरीकी साम्राज्यवाद बारबार मध्य और लातिन अमरीका के कई देशों के आतंरिक मामलों में दखलंदाज़ी करता आया है।
  • 1846 में अमरीका ने मेक्सिको पर हमला किया। युद्ध के बाद जो शांतिसमझौता किया गया उसके तहत अमरीका ने मेक्सिको की आधे से अधिक ज़मीन जबरदस्ती अपने कब्ज़े में कर ली।
  • 1903 में अमरीका ने पनामा को कोलंबिया से अलग कर दिया ताकि उस इलाके में वह अपना दबदबा क़ायम कर सके। उस समय पनामा नहर पर काम चल रहा था जो कि प्रशांत और अटलांटिक सागर के बीच जलमार्ग को जोड़ती है।
  • 1903 में स्पेनिशअमरीकी युद्ध के बाद अमरीका ने क्यूबा पर अपना पूरा वर्चस्व जमा लिया। आगे चलकर उसने ग्वानटानामोबै पर अपना नौसैनिक अड्डा बनाया।
  • 1914 में अमरीका ने एक बार फिर मेक्सिको की क्रांति को रोकने के लिए मेक्सिको में सैनिकी दखलंदाज़ी की।
  • अमरीकी साम्राज्यवाद ने प्रत्यक्ष रूप से दक्षिण अमरीका के देशों में ऐसी सरकारों और सत्ता को क़ायम किया जो अमरीका के रास्ते पर चलेंगी, और अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों और उसकी संप्रभुता को कौड़ियों के दाम बेचेंगी। अपनी कई सरकारों और राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में अमरीकी राज्य ने लातिन अमरीका में सबसे फासीवादी हुक्मशाहों की सत्ता क़ायम की और उनका समर्थन किया। जब कभी लोगों ने एक ऐसी सरकार को चुना जो अमरीकी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ उनके हितों की रक्षा करेगी, तो अमरीकी साम्राज्यवाद ने तमाम खुले और ख़ुफ़िया तरीकों से ऐसी सत्ता और सरकार का तख़्तापलट आयोजित करने की कोशिश की।
  • 1954 में अमरीकी साम्राज्यवाद ने सी.आई.. समर्थित साजिश के तहत ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति जकोबो अर्बेंज़ का तख्तापलट कर दिया।
  • 1961 में अमरीका द्वारा राष्ट्रपति कैनेडी के कार्यकाल के दौरान बे ऑफ़ पिग्स पर कुख्यात हमला किया गया जिसका मकसद क्यूबा के फिदेल कास्त्रो का तख्तापलट करना था। लेकिन उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही। फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में क्रांति को अगुवाई दी थी, जिससे उस देश पर अमरीकी साम्राज्यवाद का दबदबा ख़त्म हुआ था। लेकिन इसके दशकों बाद भी अमरीकी साम्राज्यवाद फिदेल कास्त्रो का तख़्तापलट करने और उनकी हत्या करने की असफल कोशिश करता रहा।
  • 1964 में अमरीका ने ब्राज़ील में तख़्तापलट किया जिसके पश्चात वहां पर एक सैनिक हुकूमत क़ायम की गयी, जो 1980 के दशक तक चलती रही।
  • 1965 में अमरीका ने डोमिनिकन गणराज्य पर हमला किया और उसपर कब्ज़ा जमाया।
  • 1973 में अमरीका ने चिली में साल्वाडोर आयेएन्डे की चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ सैनिक तख़्तापलट आयोजत किया। उसके बाद क़ायम की गयी पिनोशे की सैनिक सरकार दुनियाभर में अपनी बर्बरता और वाशिंगटन के हुक्म की गुलामी करने और उसकी नीतियों को लागू करने के लिए कुख्यात है।
  • 1980 के दशक में अमरीका ने निकारागुआ की सेंदिनिस्ता सरकार के ख़िलाफ़ कुख्यात कॉण्ट्रा युद्ध चलाया, जिसमें उसने कम्युनिस्टविरोधी ताक़तों का इस्तेमाल किया और उनको हथियार दिए। एल साल्वाडोर की सरकार के ख़िलाफ़ उठे जन आंदोलन को कुचलने में भी अमरीकी साम्राज्यवाद ने सरकार को समर्थन दिया।
  • 1983 में अमरीका ने कैरेबियाई द्वीप ग्रेनाडा पर हमला किया क्योंकि उसे शक था कि ग्रेनाडा क्यूबा के साथ करीबी रिश्ता बना रहा है।
  • 1989 में अमरीका ने पनामा पर हमला किया और खुद अपने ही एजेंट मनुएल नोरेगिया का तख़्तापलट कर दिया।
  • 1994 में अमरीका ने हैती में सत्ता परिवर्तन करके अपने पिट्ठू जोनबेरद्रान्ड अरिस्टीड को सत्ता में बैठाया और बाद में 2004 में उसका भी तख़्तापलट करने की साज़िश में शामिल रहा।
  • 2008 में अमरीका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ के तख़्तापलट को समर्थन दिया, लेकिन बाद में ह्यूगो शावेज़ के समर्थन में सड़कों पर उतरे लोगों के आंदोलन को देखते हुए उसे पीछे हटना पड़ा।
  • 2009 में अमरीका ने होंडुरास के राष्ट्रपति मेनुएल ज़ेलाया के सैनिक तख़्तापलट को समर्थन दिया।

इन सभी घटनाओं से यह साफ़ नज़र आता है कि पिछले 150 वर्षों से अमरीकी साम्राज्यवाद मध्य और दक्षिणी अमरीका के देशों की आज़ादी और जनतंत्र को कमजोर करने की सुनियोजित तरीके से कोशिश करता रहा है। ख़ास तौर से छोटे देशों पर कभी वह सीधे सैनिक दखलंदाज़ी करता है, तो कभी दूसरे हथकंडेअपनाता है जैसे कि हत्या करना, तख़्तापलट आयोजित करना और सतर्क समूह आयोजित करना जो सीधे उसकी निगरानी में काम करते हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद अक्सर प्रतिक्रियावादी और बिके हुए राजनेताओं को भी पालता है और उनको लोकप्रिय नेता के रूप में पेश करता है। साथ ही वह उन नेताओं के ख़िलाफ़ दुनियाभर में प्रचार करता है, जिसका वह तख़्तापलट करना चाहता है।

आज वेनेजुएला में अमरीका ठीक यही काम कर रहा है। लेकिन आज वेनेजुएला और दुनियाभर में लोग अधिक जागरुक हो गए हैं और अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगी देशों के चरित्र और उनकी साजिशों को बेहतर तरीके से समझते हैं। वह अपने देश की संप्रभुता, उसके संविधान पर आधारित जनतान्त्रिक व्यवस्था, खुद अपने विकास का रास्ता चुनने के अपने अधिकार की हिफ़ाज़त में बहादुरी से लड़ रहे हैं।

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