मारुति-सुजुकी : सरासर अन्यायपूर्ण फैसले की दूसरी सालगिरह

10 मार्च, 2019 को मानेसर के मारुति-सुजुकी के मज़दूरों के खि़लाफ़ सुनाये गए अन्यायपूर्ण फैसले की दूसरी सालगिरह थी। दो वर्ष पहले 10 मार्च, 2017 को गुड़गांव के सत्र अदालत ने मारुति-सुजुकी के मानेसर प्लांट के 13 मज़दूरों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। ये सारे मज़दूर मारुति-सुजुकी वर्कर्स यूनियन के अगुवा नेता थे। मारुति-सुजुकी वर्कर्स यूनियन ठेका व्यवस्था के खि़लाफ़, काम की बर्बर हालतों के खि़लाफ़ और अपनी यूनियन बनाने के अधिकार की हिफ़ाज़त में संघर्ष को अगुवाई दे रही थी। 117 मज़दूरों को मुकदमे के बाद बरी कर दिया गया, लेकिन उस समय तक वे गुड़गांव की सेंट्रल जेल में जुलाई 2012 से तीन साल काट चुके थे।

कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह से बेबुनियाद था। मज़दूरों पर मानव संसाधन प्रबंधक की हत्या का आरोप लगाया गया था, जबकि पूरा प्लांट निजी सुरक्षा एजेंसी के हाथों में दे दिया गया था। ऐसा शक किया जा रहा है कि इसी निजी सुरक्षा एजेंसी ने मज़दूरों को फंसाने के लिए हिंसा भड़काई होगी। हिंसा में मज़दूरों का हाथ होने का कोई सबूत नहीं था। हरियाणा सरकार ने मज़दूर यूनियन को ख़त्म करने के लिए मारुति-सुजुकी के साथ सांठ-गांठ की।

सरमायदारों के इस तरह के सरासर मज़दूर-विरोधी हमले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं।

नीमराना राजस्थान में डाईकिन ए.सी. फैक्ट्री के मज़दूरों के साथ किया गया बर्ताव इसी तरह का एक और उदाहरण है, जिसमें 18 मज़दूरों को 8-9 जनवरी के देश-व्यापी बंद के बाद गिरफ़्तार किया गया था और आज भी उनको जेल में बंद करके रखा गया है। ये मज़दूर ठेका प्रथा के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे थे। इस हमले में डाईकिन ए.सी. मज़दूर यूनियन के अध्यक्ष को जेल में डाला गया है। इसी तरह से तमिलनाडु के कोयम्बटूर में प्रिकोल प्राइवेट लिमिटेड, ऑटो कंपनी के दो मज़दूरों को 2015 में आजीवन कारावास की सज़ा दी गयी थी और नोएडा के ग्रेजियानो ट्रांसमिशन के चार मज़दूरों को अगस्त 2017 में आजीवन कारावास के सज़ा दी गयी थी।

सरकार चाहे कांग्रेस पार्टी की हो या भाजपा की, पूंजीपतियों की सरकार का लक्ष्य हिदोस्तान को “इज़ ऑफ बिजनेस” (व्यापार करने में आसानी) के सूचकांक में ऊपर ले जाना है, ताकि अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी हिन्दोस्तान को पूंजीनिवेश के लिए एक “सुरक्षित बाज़ार” समझे। दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां मज़दूर यूनियन के गठन और पंजीकरण को रोकने और ठेका मज़दूरी को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही हैं। जहां कहीं मज़दूर अपने संघर्ष को तेज़ करते हैं वहां उनके संघर्ष को तोड़ने के लिए कंपनियों के प्रबंधन और सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, फिर इसके लिए उन्हें हिंसा ही क्यों न आयोजित करनी पड़े। उसके बाद वे हिंसा का आरोप मज़दूरों के सिर पर डालते हैं और कोर्ट कचहरी से मज़दूर यूनियनों के कार्यकर्ता और नेताओं के खि़लाफ़ सबसे कड़े आदेश दिलवाते हैं।

लेकिन पूंजीपतियों की इन सभी कार्यवाहियों के बावजूद मज़दूर वर्ग का हौसला टूटा नहीं है। मारुति, प्रिकोल और अन्य सभी मामलों में मज़दूरों ने जेल में बंद अपने साथियों के परिवारों की सामूहिक तौर से मदद की है। मारुति के मानेसर प्लांट के मज़दूर लगातार जेल में बंद अपने मज़दूर साथियों को वित्तीय सहायता दे रहे हैं, मानसिक और नैतिक समर्थन देकर उनकी मदद कर रहे हैं।

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