मुंबई शहर की ढांचागत व्यवस्था की नज़रंदाज़ी की निंदा करें!

14 मार्च को एक और फुट ब्रिज (पैदल पुल) के गिरने के दर्दनाक हादसे ने मुंबई में लोगों को हिलाकर रख दिया। सेंट्रल रेलवे के मुख्यालय छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के नजदीक एक बेहद व्यस्त रास्ते पर बना एक फुट ब्रिज गिर गया। यह हादसा शाम को बेहद भीड़-भाड़ वाले समय में हुआ और 6 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। पिछले 18 महीने में यह तीसरा हादसा है जिनमें अभी तक 30 लोगों की जानें जा चुकी हैं।

Mumbai bridge collapse​हादसे के तुरंत बाद अधिकारियों द्वारा एक दूसरे पर आरोप लगाने का खेल शुरू हो गया। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बी.एम.सी.) ने दावा किया कि इस पुल की ज़िम्मेदारी भारतीय रेल की है, क्योंकि भारतीय रेल ही इसकी मालिक है। भारतीय रेल ने अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते बी.एम.सी. को इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है, क्योंकि पुल के रखरखाव और मरम्मत की ज़िम्मेदारी बी.एम.सी. की है। जैसे कि हमेशा होता है महाराष्ट्र सरकार और भारतीय रेल ने अपनी-अपनी जांच समितियों का गठन किया है, जो इस बात का पता लगाएंगी कि इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है। ऐसी जांच समितियों का गठन करने का केवल एक ही मकसद है – लोगों के गुस्से को ठंडा करना! शायद ही कभी ऐसा हुआ है कि ऐसी जांच समितियों द्वारा निकाले गए तथ्यों पर या उसके द्वारा दिए गए सुझावों पर कोई कार्यवाही की गयी हो।

दरअसल, न तो बी.एम.सी. को और न ही भारतीय रेल को लोगों के जान-माल की कोई चिंता है। यह पुल केवल 30 वर्ष पुराना था और पिछले ही वर्ष इसकी “ऑडिट” की गयी थी जिसमें इसको “सुरक्षित” घोषित किया गया था। जुलाई 2018 में अंधेरी रेलवे स्टेशन के पास ऐसा ही एक हादसा हुआ था जिसमें पुल गिरने से 2 लोगों को जानें गयी थीं। उस समय यदि कोई ट्रेन पुल के नीचे से गुजर रही होती, तो एक भयंकर हादसा होता जिसमें सैकड़ों लोगों की जानें जा सकती थीं। उस समय भी ऐसा ही आरोप-प्रत्यारोप का खेल देखने को मिला था।

बी.एम.सी. देश की सबसे अमीर महानगर पालिकाओं में से एक है और इसके पास बैंकों में 60,000 करोड़ रुपयों का फिक्स्ड डिपाजिट है। लेकिन शहर के टूटते हुए पुलों की मरम्मत करने और उनका रखरखाव करने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। 293 पुलों की स्थिति के बारे में बी.एम.सी. द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट के मुताबिक 18 पुल बेहद खस्ता हालत में हैं, जिनको तोड़कर नए पुल बनाने की सख्त ज़रूरत है। इनमें 8 फुट ओवर ब्रिज (पैदल पार पुल) भी शामिल हैं। मुंबई के पुलों के रखरखाव और मरम्मत की स्थिति यह दिखाती है कि बी.एम.सी. को मुंबई के लोगों की जान की कोई भी परवाह नहीं है।

भारतीय रेल भी मुंबई के लोगों की जान के प्रति उतनी ही गैर-ज़िम्मेदार है। सितम्बर 2017 में एलफिंस्टन स्टेशन पर बने पैदल पार पुल पर भगदड़ मच गयी जिसमें 23 लोगों की मौत हुई। यह हादसा भी पुल के रखरखाव और मरम्मत के प्रति अधिकारियों के गैर-ज़िम्मेदाराना रवैये को साफ दर्शाता है। लोकल ट्रेन से गिरकर या रेलवे लाइन पार करते हुए हर रोज़ औसतन 10 लोगों की मौत हो जाती है। लेकिन भारतीय रेल इसकी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। फिर वह चाहे ढांचागत व्यवस्था का अभाव हो या बढ़ती आबादी के साथ ट्रेनों की कमी, दोनों ही मामले में भारतीय रेल अपनी ज़िम्मेदारी को मानने से इंकार कर रही है।

लोगों के जान-माल के प्रति ऐसे गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार की कठोर शब्दों में निंदा की जानी चाहिए और इन हादसों के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों को सज़ा दी जानी चाहिए। हमें पर्याप्त मात्रा में ढांचागत सुविधा दिलाने के लिए और हमारी जान और माल के नुकसान के लिए हमें अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को भी जवाबदेह बनाना होगा, क्योंकि ये लोग ही हमारे नाम पर अलग-अलग संस्थाओं में बैठकर नीतियां बनाते हैं और अहम फैसले लेते हैं।

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