कामरेड लेनिन के जन्मदिन की 149वीं सालगिरह : कामरेड लेनिन के विचार और संघर्षशील भावनाएं अमर रहें!

22 अप्रैल को व्लादिमीर इलिच लेनिन के जन्मदिन की 149वीं सालगिरह है। लेनिन 20वीं सदी में सामाजिक क्रांति के प्रमुख सिद्धान्तकार तथा अमली नेता थे।

दुनिया की अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे एक संकट से अगले संकट की ओर लडखड़ाती जा रही है और चारों तरफ तबाही फैलाती जा रही है, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि वर्तमान के वास्तविक घटनाक्रम को समझने के लिए, लेनिन के विचार अनिवार्य हैं। साम्राज्यवाद, पूंजीवाद के उच्चतम पड़ाव, के बारे में लेनिन का विश्लेषण विश्व पूंजीवाद के वर्तमान संकट को समझने के लिए आज भी हमारा अचूक मार्गदर्शक है।

vladimir-leninसारी दुनिया में लोग तथाकथित गणराज्यों में सरमायदारी लोकतंत्र के विभिन्न रूपों से तंग आ चुके हैं। लोग अपने उन तथाकथित प्रतिनिधियों से संतुष्ट नहीं हैं, जो विशाल धनबल के समर्थन के साथ चुनाव जीतकर आते हैं।

अपनी प्रसिद्ध रचना राज्य और क्रांति में कामरेड लेनिन ने राज्य के बारे में माक्र्सवादी निष्कर्षों की फिर से पुष्टि की। उन्होंने इस सच्चाई का खुलासा किया कि राजशाही से लेकर आधुनिक गणराज्य तक, पूंजीवादी समाजों में विभिन्न प्रकार के शासन सब वास्तव में सरमायदार वर्ग की हुक्मशाही हैं। वे सब मुट्ठीभर शोषकों की हुकूमत के अलग-अलग रूप हैं।

लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने 1917 की महान अक्तूबर समाजवादी क्रांति का नेतृत्व किया था। अक्तूबर क्रांति दुनिया के उत्पीड़ित लोगों के सामने एक अमली प्रदर्शन था कि पूंजीवादी शोषकों की हुकूमत को ख़त्म किया जा सकता है। अक्तूबर क्रांति ने दिखा दिया कि मेहनतकश लोग खुद अपने प्रयासों से, श्रमिकों का राज ला सकते हैं।

लेनिन ने वैज्ञानिक समाजवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत का प्रयोग करके, 20वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों की ठोस हालतों का विश्लेषण किया। उन्होंने दुनिया के स्तर पर अचानक हुए परिवर्तनों का मूल्यांकन किया। पूंजीवादी स्पर्धा उस समय इजारेदार पूंजीवादी स्पर्धा के पड़ाव तक पहुंच गयी थी। पूंजीवादी व्यवस्था एक अप्रत्याशित हद तक परजीवी पड़ाव पर पहुंच गयी थी। वित्तपूंजी का अल्पतन्त्र सर्व-शक्तिमान और सर्वव्यापी हो गया था और समाज की हर उत्पादक व स्वस्थ वस्तु को नष्ट कर रहा था।

लेनिन ने समझाया कि सारी दुनिया कुछ साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी ताक़तों के बीच में बंट गयी है। हरेक साम्राज्यवादी ताक़त दुनिया को फिर से बांट कर ही अपने प्रभाव क्षेत्र को विस्तृत कर सकती है।

लेनिन ने साम्राज्यवाद को एक ऐसा पड़ाव बताया, जिसमें पूंजीवाद के अंतर्विरोध हल होने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। उन्होंने पूर्वानुमान किया कि अंतर-साम्राज्यवादी झगड़े समाज को बार-बार तबाहकारी जंग की ओर धकेलते रहेंगे। जंग में उतरने वाले राज्य चाहे कोई भी औचित्य पेश करें, परन्तु साम्राज्यवादी जंग के पीछे हमेशा ही सबसे धनवान शोषकों और लुटेरों के आपस बीच दुनिया को फिर से बांटने का प्रयास होता है। शांति तभी कायम और सुरक्षित हो सकती है जब श्रमजीवी वर्ग सभी पीड़ितों को लामबंध करके, अपने हाथों में राज्य सत्ता लेता है, साम्राज्यवादी श्रृंखला से अलग हो जाता है और पूंजीवाद से समाजवाद तक परिवर्तन को कामयाब करता है।

फरवरी 1917 में रूस में जार की सत्ता के तख्तापलट के बाद, लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध रचना एप्रिल थीसिस में लिखा था कि “श्रमजीवी वर्ग की वर्ग चेतना और संगठन में कमी के कारण”, उस क्रांति के बाद राज्य सत्ता सरमायादार वर्ग के हाथों में गयी। भूमि, शांति और रोटी समेत क्रांति के सभी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए यह आवश्यक था कि राज्य सत्ता श्रमजीवी वर्ग के हाथों में आये, जो सभी मेहनतकश और पीड़ित तबकों के साथ गठबंधन में हो।

लेनिन के समय बहुत सारे तथाकथित मार्क्सवादी पंडित हुआ करते थे, जो लेनिन का मजाक उड़ाते थे जब लेनिन कहते थे कि रूस के मज़दूर और किसान देश के हुक्मरान बनने के काबिल हैं। लेनिन ने बड़ी बहादुरी के साथ उन सबका विरोध किया। वे अपने सैद्धांतिक निष्कर्षों पर डटे रहे और सभी रूसी कम्युनिस्टों का नेतृत्व करते हुए, मेहनतकशों को यह विश्वास दिला पाये कि उन्हें अपने हाथों में राज्य सत्ता लेनी होगी, कि मेहनतकश लोग अपने हाथ में राज्य सत्ता लेने के क़ाबिल हैं।

लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने क्रांतिकारी जनसमुदाय की पैदाइश, मज़दूर प्रतिनिधियों की सोवियतों को और विकसित किया। सोवियत वे साधन बन गये जिनके ज़रिये क्रांतिकारी मज़दूर, सैनिक और किसान सामूहिक फैसले लेने में और अपना सांझा कार्यक्रम तय करने में सक्रियता से हिस्सा ले सकते थे।

लेनिन ने संसदीय व्यवस्था को सोवियत व्यवस्था की तुलना में बहुत ही पिछड़ा बताया। जार की राजशाही को गिराकर जिस नए राज्य की स्थापना की जाने वाली थी, उसके सार और रूप पर उन्होंने विस्तारपूर्वक बताया। वह श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही होनी चाहिए, न कि सरमायदार वर्ग की। वह संसदीय गणराज्य नहीं, बल्कि सोवियत गणराज्य होना चाहिए। इन निष्कर्षों का निचोड़ उन्होंने इस नारे में दिया: “सोवियतों को पूरी ताक़त!”

लेनिनवादी सोच से मार्गदर्शित होकर अगर हम आज की हालतों का विश्लेषण करते हैं, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमारी कोई भी ज्वलंत समस्या तब तक नहीं हल हो सकती जब तक वर्तमान संसदीय गणराज्य बरकरार रहता है। सुप्रीम कोर्ट समेत इस गणराज्य के सबसे सम्मानित संस्थान आज पूरी तरह बदनाम हो चुके हैं। “लोकतंत्र बचाओ” का नारा, जो कई पूंजीवादी पार्टियां दे रही हैं, उससे लोगों को धोखे में नहीं आना चाहिए।

वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह बदनाम हो गयी है, पूरी तरह सड़ गयी है। उसे बचाना नहीं है। उसकी जगह पर एक नयी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए। रूस में सोवियत लोकतंत्र उस नयी व्यवस्था के रूप में उभर कर आयी थी, जिसमें श्रमजीवी वर्ग और उसकी पार्टी की अगुवाई में, जनसमुदाय के हाथ में राज्य सत्ता थी।

हिन्दोस्तानी जनसमुदाय के सामने सबसे अहम काम है इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को ख़त्म करना। देश की दौलत के उत्पादकों, मज़दूर वर्ग और मेहनतकश किसानों, के हाथों में राज्य सत्ता होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तब अर्थव्यवस्था लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाई जायेगी, न कि पूंजीपतियों की लालच पूरी करने की दिशा में। तब हमारा समाज हर प्रकार के अत्याचार और गुलामी से मुक्त होगा। तब हिन्दोस्तान साम्राज्यवादी व्यवस्था से आज़ाद होगा।

वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था और उसकी चुनाव प्रक्रिया के ज़रिये, राज्य सत्ता श्रमजीवी वर्ग और उसके मित्रों के हाथों में नहीं आ सकती। मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को अपने वैकल्पिक सत्ता के तंत्रों को विकसित करना होगा, जैसा कि रूस में 100 साल पहले किया गया था। हमें एक उन्नत प्रकार के लोकतंत्र के लिए संघर्ष करना होगा, जिसमें हम मेहनतकश लोग फैसले ले सकेंगे, न सिर्फ वोट दे सकेंगे।

वर्तमान स्थिति में लेनिनवादी सिद्धांतों और कार्यनीतियों को लागू करने का मतलब है उन नए-नए प्रकार के संगठनों को विकसित करना, जिन्हें क्रांतिकारी जनसमुदाय ने इस सदी में जन्म दिया है।

औद्योगिक केन्द्रों में बन रही मज़दूर एकता समितियों को और विकसित करना होगा। गांवों में मज़दूर-किसान समितियों को बनाना और मजबूत करना होगा। अनेक शहरी और ग्रामीण रिहायशी इलाकों में लोगों को सत्ता में लाने के लिए बनायी गयी समितियों को और विकसित करना होगा। वर्तमान राज्य की जगह लेने वाले नए राज्य के अंकुर बतौर इन संगठनों को विकसित करना होगा।

वर्तमान संसदीय गणराज्य के बारे में सभी भ्रमों को ख़त्म करने के लिए हमें बड़े धैर्य के साथ लगातार काम करना होगा। हमें सरमायदारों की “कम बुरी” पार्टियों के बारे में सभी भ्रमों को ख़त्म करना होगा। हमें इस राज्य और इसके संविधान की “धर्मनिरपेक्ष बुनियाद” की हिफ़ाज़त करने की गलत धारणा का पर्दाफाश करना होगा, क्योंकि यह राज्य और इसका संविधान ऊपर से नीचे तक सांप्रदायिक और भ्रष्ट है।

हिन्दोस्तानी समाज को एक ऐसी क्रांति की ज़रूरत है जो पूंजीपति वर्ग की हुकूमत का तख्तापलट करेगी, सामंतवाद और उपनिवेशवाद के सारे अवशेषों को मिटायेगी, देश को विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था से मुक्त करेगी और एक आत्म-निर्भर समाजवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए रास्ता खोलेगी।

हमें एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की ज़रूरत है, जो देश के विभिन्न निवासियों का स्वेच्छापूर्ण संघ होगा, जिसमें संप्रभुता लोगों के हाथ में होगी, न कि संसद या मंत्रीमंडल में। हमें एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया की ज़रूरत है जिसमें सभी बालिगों को वास्तव में चुनने और चुने जाने का अधिकार होगा, निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने और वापस बुलाने तथा नीतियों, नियमों और कानूनों में तब्दीलियों का प्रस्ताव करने का अधिकार होगा।

आज की हालतों में यह ज़रूरी है कि सभी कम्युनिस्ट एक साथ मिलकर, मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के बीच, एकजुट संघर्ष करने और सामूहिक फैसले लेने के संगठनों को बनाने का काम करें। हमें एक हिरावल पार्टी में मज़दूर वर्ग के एकजुट नेतृत्व को स्थापित और मजबूत करना होगा।

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