दिवाला और दिवालियापन कोड से जनता के धन की लूट को वैधता

दिवाला और दिवालियापन कोड (आई.बी.सी.), को संसद द्वरा पारित किये हुये तीन वर्ष गुजरे हैं। इसे राजग सरकार का सबसे बड़ा आर्थिक ’सुधार’ घोषित किया गया था। इससे विश्व बैंक के व्यवसाय करने में सहूलियत के सूचकांक में हिन्दोस्तान के स्थान को ऊपर ले जाने में काफी सहायता मिली। यह दावा किया गया था कि इससे हिन्दोस्तानी बैंकों के न चुकाये गये कर्ज़ (एन.पी.ए.), की समस्या को हल करने तथा बकाया कर्ज़ को वसूलने में मदद मिलेगी। 30 माह पहले जब इस नवीन कानून के अंतर्गत पहला केस दर्ज़ किया गया तब से अब तक का अनुभव दिखाता है कि आई.बी.सी. ने बैंकों में जमा सार्वजनिक धन की लूट को वैध बना दिया है। अब बड़े-बड़े एन.पी.ए. को कोर्ट के एक आदेश के तहत बैंकों द्वारा माफ़ किया जा रहा है।

जब एक कंपनी समय पर ब्याज का भुगतान या कर्ज़ वापस या आपूर्तिकारों को पैसा नहीं दे पाती है, तब उसे दिवालियापन कोर्ट को ले जाया सकता है। एक बार दिवालियापन कोर्ट अर्जी मंजूर कर लेता है तो कंपनी का प्रबंधन समाधान विशेषज्ञ के हाथ में चला जाता है। समाधान विशेषज्ञ कंपनी को बेचने के लिए खरीदारों से बोली लगाने के लिए अनुरोध करता है। यदि बोली उधारदाताओं को मंजूर होती है तो दिवालियापन कोर्ट सफल बोली लगाने वाले को कंपनी बेचने का आदेश दे देता है। यदि 180 दिनों (और उसके साथ 90 दिन की मोहलत) के अंदर कोई मंजूर करने लायक बोली नहीं आती है तो दिवालियापन कोर्ट कंपनी को बंद करने का आदेश देता है। तब कंपनी की संपत्ति को बेच दिया जाता है और उससे प्राप्त धन को उधारदाताओं के बीच बांट दिया जाता है।

आई.बी.सी. के तहत 31 मार्च, 2019 तक कुल 1,858 चूकने वाली कंपनियों के मामले पंजीकृत किये गए हैं। इन में से 94 कंपनियों के मामलों में मिली बोली स्वीकारी गई तथा कंपनी की मालिकी को हस्तांतरित कर दिया गया। परन्तु, कोर्ट के आदेश के अंतर्गत स्वीकारी गई बोली के कारण बैंकों को इन कंपनियों के बकाया कर्ज़ का बहुत बड़ा भाग माफ़ करना पड़ा है। जहां इन कंपनियों को बचने से बैंकों को 75,000 करोड़ रुपये मिले, वहां 100,000 करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ी को आई.बी.सी. ने वैधता दे दी।

इनके अलाव कोर्ट ने 378 कंपनियों को जिनका बकाया कर्ज़ 2,57,462 करोड़ रुपये था बंद करने का आदेश दिया। इन कंपनियों की संपत्ति को बेच कर उनके बकाया कर्ज़ का केवल 7 प्रतिशत धन मिलने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि और 2,39,000 करोड़ रुपये का बकाया कर्ज़ माफ़ करना पड़ेगा।

अतः आई.बी.सी. के 3 वर्षों के दौरान बैंक कोर्ट के आदेश के अनुसार करीबन 3,40,000 करोड़ रुपये माफ़ कर देंगे। आई.बी.सी. द्वारा अगस्त 2017 में सर्व प्रथम मामले में लिए गए निर्णय के कारण बकाया कर्ज़ का 94 प्रतिशत माफ़ करना पड़ा था। इस एक ऑटो सहायक कंपनी, सिनार्जिज-दूरे ऑटोमोटिव के मामले में उधारदाताओं को 972 करोड़ रुपये के कुल बकाया कर्ज़ में से केवल 54 करोड़ रुपये मिले!

आई.बी.सी. के तहत बेची गई अधिकांश कंपनियों के मामलों में, खरीदार मूल्यवान संपत्तियां बहुत सस्ते भाव में खरीद सके हैं। 2017 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने कुल बकाया 3.45 लाख करोड़ रुपये कर्ज़ के 12 बड़े एन.पी.ए. के मामलों को आई.बी.सी. को समाधान के लिए भेजा। इनमें से अभी तक 5 मामलों में निर्णय लिया गया है – एक को बंद करने का (लैंको इन्फ्रास्ट्रक्चर जिसका बकाया कर्ज़ 17,000 करोड़ रुपये था) और शेष 4 को बेचने का (भूषण स्टील जिसे टाटा स्टील ने 35,200 करोड़ रुपये में खरीदा जबकि बकाया कर्ज़ 56,000 करोड़ रुपये था। इलेक्ट्रोस्टील जिसे वेदांता ने 5320 करोड़ रुपये में खरीदा जबकि बकाया कर्ज़ 13,000 करोड़ रुपये था। मोनेट इस्पात जिसे जे.एस.डब्ल्यू स्टील ने 2,875 करोड़ रुपये में खरीदा जबकि बकाया कर्ज़ 11,000 करोड़ रुपये था। आम्टेक ऑटो जिसे लिबर्टी हाउस ने 4,400 करोड़ रुपये में खरीदा जबकि बकाया कर्ज़ 12,000 करोड़ रुपये था)। इन चार कंपनियों के मामलों में 35 से 70 प्रतिशत बकाया कर्ज़ माफ़ करना पड़ा। इन पांच कंपनियों के मामलों में ही दिवालियापन कोर्ट के निर्णय के कारण बैंकों को करीबन 60,000 करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ करने पड़े!

आई.बी.सी. के तीन वर्षों के काम ने साफ दिखा दिया है कि यह बैंकों द्वारा बड़े कर्ज़ों की माफ़ी को वैधता देने का तथा बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा मूल्यवान उत्पादनकारी संपत्तियों को सस्ते भाव में खरीदने का साधन है। आई.बी.सी. ने बैंकों में जमा मज़दूरों और मेहनतकशों की बचत की बड़ी लूट को वैधता प्रदान कर दी है।

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