पश्चिम बंगाल और पूरे देश में डॉक्टरों की हड़ताल

पश्चिम बंगाल और देश के अनेक भागों के अस्पतालों में डॉक्टरों ने 12-17 जून के दौरान हड़ताल की। डॉक्टर काम के दौरान बढ़ती असुरक्षा का विरोध कर रहे थे।

11 जून को कोलकाता के एन.आर.एस. मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक 75 वर्षिय बुर्जुग की दिल के दौरे से मौत हो गयी थी। मरीज के परिजनों ने डॉक्टरों की जमकर पिटाई कर दी, जिसमें 2 जूनियन डॉक्टर बुरी तरह घायल हो गये थे। 12 जून से पूरे कोलकाता शहर के सभी सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों ने हड़ताल शुरू कर दी।

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हड़ताली डॉक्टर एन.आर.एस. अस्पताल में उन पर हुए हमले का विरोध कर रहे थे और फिर से अपनी लम्बित मांग को उठा रहे थे, कि सरकार और अस्पताल के अधिकारी डॉक्टरों को काम पर पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करे। हड़ताली डॉक्टरों ने देश के सभी डॉक्टर संगठनों से अपील की कि संघर्ष के समर्थन में आगे आयें।

कोलकाता के डॉक्टरों की हड़ताल के आह्वान को देश भर में तुरंत, विस्तृत समर्थन मिला। कोलकाता के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के 400 डॉक्टरों ने इस्तीफा दे दिया।

ख़बरों के अनुसार, दिल्ली में एम्स, मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग अस्पताल के रेज़िडेंट डॉक्टरों ने 14 जून को हड़ताल की। दिल्ली और कोलकाता के सभी सरकारी अस्पतालों तथा कई प्राइवेट अस्पतालों और क्लीनिकों में रेज़िडेंट डॉक्टरों के संगठनों ने धरने और प्रदर्शन किये। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तामिलनाडु, पंजाब तथा अनेक राज्यों में डॉक्टरों के धरनों और प्रदर्शनों की ख़बरें आयीं। दिल्ली के एम.सी.डी. अस्पतालों के डॉक्टरों ने 15 जून को हड़ताल की।

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन, दिल्ली मेडिकल एसोसियेशन और देश के कई अन्य डॉक्टर एसोसियेशनों ने 14 जून को हड़ताल का आह्वान किया। 17 जून को पूरे देश में हड़ताल की गई। देशभर के डॉक्टरों ने बड़ी संख्या में हड़ताल में भाग लिया।

हड़ताल के दौरान, डॉक्टरों ने लोगों और मीडिया को समझाया कि सरकारी अस्पतालों में किन मुश्किल हालतों में उन्हें काम करना पड़ता है। डॉक्टरों की संख्या बहुत कम होती है, जबकि ओपीडी और एमरजेंसी सेवाओं में प्रतिदिन हजारों-हजारों मरीजों का इलाज करना पड़ता है। अक्सर डॉक्टरों को लगातार 10-12 घंटे और लगातार शिफ्टों में काम करना पड़ता है। अस्पतालों में बैड, ऑपरेशन थियेटर, आॅक्सीजन सिलेंडर, आवश्यक दवाओं, मशीनों और सेवाओं की भारी कमी है, जिससे डॉक्टरों के काम पर बहुत असर पड़ता है। किसी मरीज का इलाज करने वाले डॉक्टर को इलाज कामयाब ना होने या मरीज की मौत होने पर, खुद ही उसके परिजनों को सूचित करना पड़ता है। इन परिस्थितियों में डॉक्टर तरह-तरह के गाली-गलौज और शारीरिक हमलों का शिकार बन जाते हैं। उन्हें खुद अपनी देखभाल करनी पड़ती है क्योंकि अस्पताल अधिकारी या पुलिस उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते निजीकरण के चलते, सरकारी अस्पतालों के प्रति पूरी लापरवाही की जा रही है और उन्हें क्रमशः बर्बाद किया जा रहा है, जिसकी वजह से वहां के काम करने वाले डॉक्टरों की काम की हालतें बिगड़ती जा रही हैं। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवा की बड़ी-बड़ी इजारेदार कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे निजी अस्पताल देश के हर कोने में पनप रहे हैं, मरीजों को खूब लूट रहे हैं और समाज के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती है।

जबकि टीवी मीडिया ने कई जगहों पर हड़ताल के कारण मरीजों की मुश्किलों को दर्शाया, तो जिन हालातों ने डॉक्टरों को हड़ताल पर जाने को मजबूर किया था, उन पर कोई चर्चा नहीं हुई।

हालांकि हड़ताल के दौरान ओ.पी.डी. सेवाएं बंद रहीं और नये मरीजों का पंजीकरण बंद रहा, परन्तु डॉक्टरों ने विरोध करते हुये भी, साथ-साथ समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को कई तरीकों से दर्शाया। एम्स के डॉक्टरों ने विरोध जताते हुये, सिर पर खून से रंगीं हुई पट्टियां बांधकर और हेलमेट पहनकर, ओ.पी.डी. में मरीजों का इलाज किया। हड़ताल से पहले पंजीकृत या एडमिट हुये मरीजों का डॉक्टरों ने शिफ्ट में काम करके इलाज किया। कोलकाता के कुछ अस्पतालों में डॉक्टरों ने अपना विरोध प्रकट करते हुये, ओ.पी.डी. में बिना कोई फीस लिये मरीजों को देखा।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हड़ताली डॉक्टरों को धमकाते हुये आदेश दिया था कि 13 जून की दोपहर तक ड्यूटी पर वापस आयें। जब डॉक्टरों ने उस आदेश का पालन नहीं किया और हड़ताल जारी रखकर यह मांग करते रहे कि सरकार उन्हें पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करे, तब मुख्यमंत्री हड़ताली डॉक्टरों से बातचीत करने को राज़ी हुईं। जब मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों के प्रतिनिधियों को ड्यूटी पर सुरक्षा दिलाने का आश्वासन दिया और उनकी सभी लम्बित मांगों पर ध्यान देने का आश्वासन दिया, तब 18 जून को हड़ताल समाप्त हुई।

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