बजट-पूर्व परामर्श

2019-20 इस वित्तीय वर्ष का संपूर्ण और अंतिम बजट 5 जुलाई को देश की नयी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया जायेगा। लोक सभा के चुनाव की घोषणा होने से कुछ ही दिन पहले, पिछली सरकार के कार्यकारी वित्त मंत्री पियूष गोयल ने 31 जनवरी, 2019 को अंतरिम बजट पेश किया था। जब भी लोक सभा के चुनाव होते हैं तो यह एक आम तरीका रहा है, कि नयी सरकार जुलाई के महीने में संपूर्ण और अंतिम बजट पेश करती है।

जून महीने के मध्य से शुरू करते हुए वित्त मंत्री बड़े पूंजीपतियों और बड़े बैंकों के विभिन्न समूहों के साथ विचार-विमर्श करने के लिए लगातार परामर्श गोष्ठियों की अध्यक्षता कर रही है। इन गोष्ठियों में पूंजीपतियों के प्रतिनिधि अपनी कई मांगें पेश करते हैं।

बड़े बैंकों के प्रतिनिधि यह चाहते हैं कि सरकार राष्ट्रीय बचत पत्र, पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी छोटी बचत की योजनाओं पर मिलने वाली ब्याज दर को कम करें। उनका तर्क यह है कि चूँकि इन छोटी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज की दर 8 प्रतिशत से 8.5 प्रतिशत के बीच है और उन पर टैक्स नहीं लगता है, इसलिए लोग मियादी बचत (फिक्स्ड डिपाजिट) में पैसा जमा नहीं कर रहे है, क्योंकि वहां पर ब्याज दर 7 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत के बीच मिलती है और उस पर टैक्स भी लगता है। दूसरे शब्दों में पूंजीपति साहूकार संस्थाएं यह चाहती हैं कि सरकार लोगों को अपने पैसे बैंकों में रखने को मजबूर करें ताकि लोगों के जमा धन को पूंजीपति कंपनियों को उधार देने के लिए उपलब्ध किया जा सके।

ऑटोमोबाइल कंपनियों के प्रतिनिधियों ने सरकार के सामने यह मांग रखी कि 15 वर्ष से अधिक पुराने वाहनों पर प्रतिबंध लगाया जायें, ताकि लोग अपने पुराने वाहनों की जगह नए वाहन खरीदने को मजबूर हो जाये। ऐसा कानून पहले से ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) दिल्ली में लागू है। वह चाहते हैं कि पेट्रोल और डीजल वाहनों के उत्पादन से निकलकर इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर जाने के लिए उनको “रियायत” दी जाये।

इजारेदार पूंजीपति घरानों के कई प्रतिनिधियों ने सरकार से आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी करने की मांग की है, ताकि निजी क्षेत्र में लगातार चल रही मंदी से हो रहे नुकसान की कुछ भरपाई की जा सके। उनका तर्क यह है कि अर्थव्यवस्था की धीमी हो रही गति को बढ़ने के लिए यह बेहद ज़रूरी है और इसके लिए सरकार को चाहे अंतरिम बजट में दिए गए आंकड़ों से अधिक कर्ज़ा ही क्यों न लेना पड़े।

पूंजीपति समूहों के प्रतिनिधियों ने सरकार के सामने जो भी मांगें रखी हैं उनका मकसद है पूंजीपतियों का मुनाफ़ा बढ़ाना और इसकी कीमत मेहनतकश लोगों से वसूली जाएगी और समाज के आम हित को दांव पर लगाया जायेगा।

एक गोष्ठी मज़दूर यूनियन के प्रतिनिधियों के साथ भी आयोजित की गयी। इस गोष्ठी की अध्यक्षता करने के लिए वित्त मंत्री ने अपने सहायक मंत्री को भेजा। मज़दूर यूनियन के प्रतिनिधियों ने अपनी मांगे दोहराते हुए न्यूनतम वेतन और समग्र बेरोजगारी बीमा स्कीम को पूरी ताक़त के साथ लागू करने की मांग रखी। लेकिन मज़दूरों की इन सारी मांगों को सरकार अनसुना करती आई है।

इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि मई के अंत में वित्त मंत्रालय ने सभी अन्य केंद्रीय मंत्रालयों को एक आदेश जारी किया और इस बात को स्पष्ट किया कि “2019-20 के अंतरिम बजट में आवंटित की गयी राशि में कोई बदलाव नहीं किया जायेगा”। इस आदेश में बताया गया कि यदि किसी मंत्रालय को अतिरिक्त राशि की जरूरत है तो उस मंत्रालय को इसके लिए मजबूत तर्क देना होगा। इस आदेश का यही अर्थ निकाला जा सकता है कि सरकार जो कुछ “जन हित” योजनाओं की घोषणा की है जैसे किसानों के लिए “वेतन हस्तांतरण योजना” और अनौपचारिक क्षेत्र से रिटायर होने वाले मज़दूरों के लिए पेंशन योजना, इसके अलावा मज़दूरों को सरकार से किसी अतिरिक्त आवंटन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इससे यह साफ हो जाता है कि मज़दूरों और किसानों द्वारा बढ़ते पैमाने पर सार्वजनिक खरीदी और सार्वजनिक आवंटन की मांग पर सरकार कोई ध्यान नहीं देने जा रही है और न ही सरकार एक समग्र बेरोज़गारी बीमा पर कोई ध्यान देगी। मज़दूरों और किसानों की ये मांगे पूरी नहीं की जाएगी।

पूंजीपतियों और मज़दूर यूनियन के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श आयोजित करके सरकार यह दिखावा करना चाहती है कि वह समाज के सभी वर्गों का ख्याल रख रही है। यह गलत धारणा है। शोषकों और शोषितों के बीच कभी भी बराबरी नहीं हो सकती। इजारेदार पूंजीपति घराने हुक्मरान पूंजीपति वर्ग की अगुवाई करते है। यह पूंजीपति घराने चुनाव जीतने के लिये सबसे अधिक धन देते हैं। जो भी सरकार चुन कर आती है वह इन इजारेदार पूंजीपति घरानों की मांगों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध होती है। मोदी की अगुवाई में भाजपा की सरकार भी इसका अपवाद नहीं है। यह सरकार मज़दूरों और किसानों की जायज़ और लंबे अरसे से उठाई जा रही मांगों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है।

बजट-पूर्व परामर्श गोष्ठियों का असली मकसद हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को वित्त मंत्री और मंत्रालय के अधिकारियों के सामने अपनी सबसे महत्वपूर्ण मांगों को औपचारिक ढंग से पेश करने का एक तरीका है, जो बजट बनाने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं। इसके अलावा,मत्रियों और रसूखदार इजारेदार पूंजीपतियों के बीच अनौपचारिक परामर्श तो पर्दे के पीछे हर समय चलते ही रहते हैं।

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