स्टरलाइट फायरिंग के एक साल बाद भी लोगों को न्याय का इंतजार

तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर प्लांट के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारियों पर पुलिस फायरिंग की पहली बरसी मई 22 को मनाई गई। पिछले साल इस फायरिंग में 13 लोग मारे गए थे, कई घायल हुए और सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। पुलिस फायरिंग के पीड़ितों के परिवार, प्रदर्शनकारी जिन्होंने स्टरलाइट प्लांट को बंद करने की मांग की और प्लांट के आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग बेहद नाराज़ और गुस्से में हैं क्योंकि उन्हें आज तक न्याय नहीं मिला है।

March on Sterlite firingपिछले साल 100 दिनों से ज्यादा तक, करीब 20,000 लोगों ने साथ आकर हिन्दोस्तान के सबसे बड़े तांबा उत्पादकों में से एक, स्टरलाइट कॉपर प्लांट के विस्तार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। कंपनी का नियंत्रण लंदन स्थित धातुओं और खनन कंपनी वेदांत रिसोर्सेज की बहु-स्वामित्व वाली कंपनी वेदांता लिमिटेड द्वारा किया जाता है। इसने अपने वर्तमान के 400,000 मीट्रिक टन वार्षिक तांबे के उत्पादन को बढ़ाने के लिए स्मेल्टर्स की क्षमता को दोगुना करने की योजना बनाई थी। इससे तुतुकोड़ी के लोगों में आक्रोश फैल गया। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्मेल्टरों ने उनकी हवा और पानी को दूषित कर दिया है, जिससे लोगों को सांस संबंधी बीमारियों से लेकर कैंसर तक कई तरह की बीमारियां हो रही थी। (बॉक्स देखें)

22 मई, 2018 को, जब कुछ प्रदर्शनकारी जिला कलेक्टर के कार्यालय के बाहर पहुंचे, तब एक बिना वर्दी वाले अफसर ने उन पर गोलियां बरसाईं। इस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हुई। यह घटना पर्यावरण के लिए किये जाने वाले आंदोलन में से एक थी, जिसका जवाब हिन्दोस्तानी राज्य ने बहुत ही हिंसक तरीके से दिया।

मानव अधिकारों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बताया कि स्टरलाइट प्लांट ने कई मायने में कानून का उल्लंघन किया था और यह भी घोषणा की थी कि जब तक तुतुकोड़ी का पर्यावरण अपनी असली गुणवत्ता वापस नहीं पा लेता, तब तक प्रदूषण करने वाले कारखाने को चालू रखने का सवाल ही नहीं उठता। अन्य लोगों ने बताया कि कंपनी द्वारा अपने अपराध के लिए दंड का भुगतान या राज्य हिंसा के पीड़ितों के लिए राज्य द्वारा मुआवजे़ का भुगतान उन्हें निर्दोष नहीं साबित करता है और नियामक एजेंसियों और अधिकारियों को इस बात को स्वीकारना होगा।

मदुरई स्थित एक मानवाधिकार संगठन ‘पीपुल्स वॉच’ ने मई में एक रिपोर्ट, ‘ए ईयर आफ्टर तुतुकोड़ी बन्र्ड’ जारी की। इस रिपोर्ट में उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विफलता की निंदा की। उन्होंने बताया की किस तरह फायरिंग के पीड़ितों को “पर्याप्त मुआवजे़ दिया गया है” कहते हुए आयोग ने अपनी कर्यवाई बंद कर दी। उन्होंने यह बात उजागर की कि राज्य की न्याय देने की परिभाषा अब इतने निचले स्तर पर आ गई है कि वह पीड़ितों के घरवालों को मुआवज़ा और नौकरी देकर उसे न्याय बताता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी भी पीड़ित के परिवार को हादसे से लगे धक्के से बाहर आने के लिए कोई मदद प्रदान नहीं की गई थी और दी गई ज्यादातर नौकरियां भी एक थलियारी (ग्राम सहायक) की थीं, जो कि उन लोगों की योग्यता को देखते हुए उनके लिए उचित नहीं थी।

मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने पिछले साल जुलाई में जिला प्रशासन को लोगों की हत्या के लिए दोषी ठहराते हुए एक जांच रिपोर्ट जारी की थी।

लोगों की मांग रही है कि पर फायरिंग के लिए जिम्मेदार उच्चतम स्तर के लोगों को दंडित किया जाना चाहिए। फायरिंग के पीड़ितों और घायल हुए लोगों के परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाना चाहिए और आर्थिक रूप से पुनर्वासित किया जाना चाहिए। मज़दूर और अन्य लोग, जो तांबे के स्मेल्टर पर निर्भर हैं, उनके परिवार प्लांट बंद होने की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। लोगों की मांग है कि उन्हें लाभ या आय के किसी भी नुकसान के बिना, आजीविका के वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध कराए जाने चाहिए। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों का उत्पीड़न तुरंत बंद होना चाहिए। पर्यावरण और भूजल संसाधनों को उनकी मूल गुणवत्ता की स्थिति में वापस लाने के प्रयास किये जाने चाहिए।

हिन्दोस्तानी राज्य को अपने लोगों की कोई चिंता नहीं है। इसने मुनाफे की भूख वाले एकाधिकार द्वारा भूमि, नदियों, भूजल और लोगों के अन्य संसाधनों के बेलगाम शोषण का बचाव हमेशा किया है। तूतीकोरिन में प्रभावित लोगों को न्याय से वंचित करके एक बार फिर साबित किया है कि राज्य की एजेंसियां जैसे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, लाइसेंसिंग प्राधिकरण, न्यायपालिका और पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनैतिक पार्टियां को लोगों की कोई परवाह नहीं है। वे “नियामक” तथा “रक्षक” होने का दावा करते हैं लेकिन काम केवल एकाधिकारियों के हित के लिए करते हैं। लोग इन एजेंसियों पर भरोसा नहीं कर सकते।

स्टरलाइट का अपराधपूर्ण इतिहास

तुतुकोड़ी में स्टरलाइट का तांबा स्मेल्टर 1994 में शुरू होने से ही विवादों में रहा है। पर्यावरण रक्षकों ने इसका विरोध किया क्योंकि स्मेल्टर पर्यावरण संवेदनशील मन्नार खाड़ी के करीब (14 कि.मी.) था। जबकि पर्यावरण कानून के हिसाब से यह दूरी कम से कम 25 कि.मी. की होनी चाहिए।

नवंबर 1998 में, मद्रास उच्च न्यायलय द्वारा निर्वाचित नेशनल इनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) ने एक रिपोर्ट पेष की। उस रिपोर्ट में पाया गया कि प्लांट से गैस लीक होने से स्थानीय निवासियों को कई बीमारी हुई थी। प्लांट से निकलने वाले रसायन में आर्सेनिक, सीसा और सैलेनियम जैसे खतरनाक रसायन होते है और भूजल को बहुत दूषित करते हैं। इसके बाद प्लांट को कुछ समय के लिए ही बंद किया गया था। अगले साल सरकार ने इसे अपने उत्पादन को प्रति वर्ष 70,000 टन तक दुगना करने की अनुमति दी।

2008 में तिरूनेलवली मेडिकल कॉलेज के एक अध्ययन में बाहर आया कि कैसे एक प्लांट के पास भूजल में लोहे की मात्रा अनुमानित स्तरों से 17 से 20 गुना अधिक थी। इसके परिणामस्वरूप जोड़ो और पेट में दर्द हो सकता है। कारखाने के आस-पास सांस संबंधी रोग 13.9 प्रतिशत अधिक थे। अस्थमा संबंधी ब्रोंकाइटिस के मामले 2.8 प्रतिषत पर थे जो राज्य के औसत 1.29 प्रतिशत से अधिक था। सितंबर 2010 में, उच्च न्यायालय ने पर्यावरण मानदंडो के उल्लंघन के लिए प्लांट बंद करने का आदेश दिया। इस फैसले को उच्चतम न्यायालय ने रोक दिया था। अप्रैल 2013 में, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्देष को पलट दिया और कंपनी पर हरित मानदंडो के उल्लंघन के लिए 100 करोड़ का जुर्माना लगाया। 1997 से 2013 के बीच लगभग 27 औद्योगिक दुर्घटनाएं और गैस रिसाव कंपनी ने देखे।

फरवरी 2018 में, लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शनों का नया दौर तब शुरू हुआ जब कंपनी ने अपनी उत्पादन क्षमता को दुगना करना चाहा। तब पुलिस की फायरिंग के बाद प्लांट को बंद किया गया।

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