अपना प्रभुत्व जमाने के अमरीकी साम्राज्यवाद के आक्रमक प्रयासों के कारण अमरीका-चीन सीमा शुल्क विवाद घमासान

पिछले वर्ष जून, 2018 में जब अमरीका ने चीन पर, चीन से आयात की हुई वस्तुओं पर अधिक आयात-कर लगाना शुरू किया तब से अमरीका और चीन के बीच सीमा शुल्क को लेकर लड़ाई जारी है। सितम्बर 2018 से अमरीका ने चीन से आयात की जाने वाली कई वस्तुओं पर (जिनकी अनुमानित लागत लगभग 25 हज़ार करोड़ डालर है) 10 प्रतिशत आयात कर थोप दिया है। इसके जवाब में चीन ने अमरीका से आयात की जाने वाली वस्तुओं पर, जिनमें कृषि पदार्थ और मोटर कार शामिल हैं, आयात कर लगाने की घोषणा की है। इन वस्तुओं की सूची में सोयाबीन, बिजली से चलने वाली मोटर कार, विभिन्न प्रकार के मांसाहारी भोजन की सामग्री भी शामिल थी। दिसंबर 2018 में दोनो देशों के बीच एक प्रकार की अस्थाई विराम संधि हुई। लेकिन मई 2019 में अमरीका ने चीन से आयात की जाने वाली वस्तुओं पर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाने का ऐलान किया। चीन ने भी इसका जवाब दिया और अमरीका से आयात की जाने वाली वस्तुओं (जिसकी लागत 6000 करोड़ डालर है) पर 1 जून से आयात कर लगाने की घोषणा की।

इस सीमा शुल्क को लेकर की जाने वाली लड़ाई से अमरीका और चीन के बीच में व्यापार के अलावा, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी इसका असर पड़ा है। अमरीकी कम्पनियों और उनकी प्रतिद्वंदी कम्पनियां जिनका केंद्र चीन, रूस और यूरोप में है, के बीच अंतर्विरोध बहुत ही तीव्र हो गया है। कृषि, मोटर कार के उत्पादन, कच्चा तेल और गैस, स्टील, एल्यूमीनियम, हवाई जहाज और युद्ध सामग्री के उत्पादन से संबंधित मुद्दों पर विवाद जारी है।

चूंकि अमरीका का टेक्नोलॉजी (आई.टी.) क्षेत्र में जो दबदबा है उसको चीन ने चुनौती दी है, इसलिए अमरीका और चीन के बीच में विवाद और भी गंभीर हो गया है। अमरीका ने चीनी कंपनी हुवावे और उसके उत्पादों को अमरीका में बैन कर दिया है। कारण यह बताया जा रहा है कि हुवावे, अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ख़तरा है। यहां तक कि, अमरीका ने उन सभी अमरीकी कंपनियों को, जिनका हुवावे के साथ व्यावसायिक सहयोग था, उनको भी कड़ी चेतावनी दी है कि यदि उन्होंने हुवावे के साथ अपने संबंधों को तुरंत नहीं तोड़ा तो उनके ऊपर कड़ी पेनल्टी लगाई जाएगी। दुनिया के कई देश और कई कंपनियां अमरीका के इस रवैये का विरोध कर रहे हैं क्योंकि ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप के कई देशों में तथा अमरीकी कंपनियों में हुवावे के उत्पादों और उसकी टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।

अमरीका और चीन के बीच में चल रहा सीमा शुल्क युद्ध, विश्व स्तर पर, व्यापार में एक रुकावट, एक तनाव, एक बड़ा ख़तरा बन गया है। इन परिस्थितियों में, ओसाका में हो रहे जी-20 देशों के सम्मेलन के दौरान, दोनों देशों को 29 जून को समझौते के लिए बात करनी पड़ी। लेकिन दोनों देश बातचीत के बाद केवल इस नतीजे पर पहुंचे कि बातचीत जारी रखनी चाहिए और स्थिति को और बिगड़ने से बचाना होगा। लेकिन इस समझौते के एक हफ्ते के अन्दर ही, चीन ने ऐलान कर दिया है कि वह तब तक बातचीत नहीं करेगा जब तक अमरीका उसकी वस्तुओं पर लगाये गए सभी आयात कर वापस नहीं लेता।

अमरीकी सरकार ने सीमा शुल्क को अधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जायज़ ठहराया है। पिछले साल जून में, अमरीका ने चीन के ख़िलाफ़ टेक्नोलॉजी चुराने और अनुचित व्यापार के तरीकों को अपनाने का आरोप लगाया। अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐलान किया कि चूंकि विष्व व्यापार संगठन (डब्लू.टी.ओ.), चीन के अनुचित व्यापार संबंधों और तरीकों को रोकने में विफल रहा है, इसलिए अमरीका को, इस तरह का एकतरफा कदम लेने को मजबूर होना पड़ा और आयात-शुल्कों को लगाना पड़ा।

राष्ट्रपति ट्रम्प इस बात का भी दावा करते हैं कि ये कदम अमरीका के व्यापार घाटे को कम करेंगे और इनसे अमरीका में लोगों को नौकरी मिलेगी। यह सब झूठे दावे हैं – अमरीकी मज़दूर वर्ग और अमरीकी लोगों को गुमराह करने के हथकंडे हैं। इस सीमा शुल्क के मुद्दे को लेकर चल रहे विवाद का असली मकसद है चीन को टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ने से, और विश्व स्तर पर अमरीका के बढ़ते प्रभुत्व को चीन द्वारा चुनौती देने से रोकना।

अमरीकी साम्राज्यवादी, बढ़ते अमरीकी व्यापार घाटे के लिए, चीन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। वास्तव में, अमरीका के बढ़ते हुए व्यापार घाटे का कारण है, अमरीका की व्यापार उदारीकरण की नीति, जिसका अमरीका खुद पिछले 25 वर्षों से समर्थन करता आया है।

1990 के दशक से, दुनिया की सभी साम्राज्यवादी शक्तियां, अमरीका के नेतृत्व में, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के सभी सदस्यों को अपने देशों में आयात शुल्क कम करने को बाध्य करते आये हैं।

पूंजी और उत्पादक वस्तुओं के किसी भी देश में बिना किसी रुकावट के आयात का, “मुक्त बाज़ार” की नीति कह कर, विश्व स्तर पर प्रचार किया गया और इस नीति को सबके फायदे के लिए बताया गया।

1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) की स्थापना, दुनिया के सभी देशों के बाज़ारों को साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा लूटने के लिए खोलने के अनवरत प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम था।

पिछले दो दशकों का इतिहास गवाह है कि विश्व व्यापार में वृद्धि से आम लोगों का भला नहीं हुआ है। बल्कि इससे सभी देशों में मज़दूर वर्ग का शोषण और भी तीव्र हुआ है। दुनिया के अधिकांश देशों में लोगों को अपनी रोज़ी-रोटी और नौकरी से वंचित होना पड़ा है। विश्व व्यापार में वृद्धि ने सभी देशों में रहने वाले लोगों के बीच में असमानता और विभिन्न देशों के बीच में असमानता को और भी बढ़ावा दिया है। दुनिया में एक के बाद एक आर्थिक संकट ने आम लोगों को तबाह किया है।

पिछले दो दशकों में पूंजी और उत्पादन उस ओर गया है जहां पर श्रम और कच्चा माल सस्ते दामों पर उपलब्ध है या जहां पर पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन आसानी से किया जा सकता है।

पूंजी के निर्यात से, अमरीका और अन्य उन्नत पूंजीवादी देशों में, निर्माण क्षेत्र में नौकरियों का नुकसान हुआ है। इसका ही नतीजा है चीन का एक बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति बनकर उभरना और हिन्दोस्तान में पूंजीवादी व्यवस्था का तेज़ी से विकास। इसका ही एक और भी परिणाम है – अमरीका में व्यापार घाटे में तेज़ी से वृद्धि क्योंकि अमरीका में उत्पादक वस्तुओं का आयात उनके निर्यात से कहीं ज्यादा है और इसलिए व्यापार घाटे में लगातार वृद्धि हुई है।

व्यापार घाटे को कम करने के नाम पर, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने आयात शुल्क बढ़ाने की नीति को, उन सभी देशों पर, जिनके साथ उनके व्यापार के सम्बन्ध हैं, एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है और दुनिया पर अपने प्रभुत्व को बरकरार रखने की कोशिश जारी रखी है। उन्होंने इसी नीति को चीन को कमज़ोर करने के लिए भी इस्तेमाल किया है क्योंकि चीन का दुनिया में बढ़ता प्रभुत्व, अमरीका के लिए एक चुनौती है और अमरीका हर संभव प्रयत्न करेगा जिससे चीन को कमज़ोर किया जा सके। यही कारण है कि अमरीका और चीन के बीच में सीमा शुल्क के मुद्दे पर घमासान युद्ध चल रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *