केन्द्रीय बजट 2019-20 : “नया हिन्दोस्तान” बनाने की आड़ में इजारेदार पूंजीपतियों की अमीरी बढ़ायी

संसद में 2019-20 के पूर्ण और अंतिम बजट को पेश करते हुए, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दावा किया कि उनकी सरकार एक “उज्ज्वल और स्थिर नया हिन्दोस्तान” बनाने पर वचनबद्ध है। परन्तु उनके बजट भाषण में जिन नीतिगत परिवर्तनों और कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया गया, उनका असली उद्देश्य है हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करना।

वित्त मंत्री ने “इंडिया इंक”, यानी टाटा, बिरला, अम्बानी और देश के अन्य इजारेदार पूंजीवादी घरानों को ‘राष्ट्र के धन और रोज़गार के निर्माता’ बताकर, उनकी खूब सराहना की। उन्होंने तेज़ी से बढ़ते निर्यात बाज़ार के लिए उत्पादन में हिन्दोस्तान और विदेशी पूंजीपतियों के निवेश से प्रेरित, तेज़ गति से आर्थिक संवर्धन की छवि पेश की।

Expenditure on Selected Items_Hindi

बजट में केन्द्र सरकार की संपत्तियों के निजीकरण का अब तक का सबसे ऊंचा लक्ष्य, 1,00,000 करोड़, निर्धारित किया गया है। मज़दूर यूनियनों, कम्युनिस्ट पार्टियों और दूसरे चिंतित नागरिकों के विरोध के बावजूद, एयर इंडिया का निजीकरण फिर से एजेंडा पर रखा गया है। अनेक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की रणनैतिक बिक्री की जायेगी। नीति आयोग ने बजट से पहले ही, रणनैतिक बिक्री के लिए 34 सार्वजनिक क्षेत्र कंपनियों की सूची बना रखी है। भारतीय रेल, जिसका निजीकरण अब तक चुपके से किया जा रहा था, आने वाले दिनों में और खुलेआम तरीके से किया जायेगा। 100 दिन की योजना के तहत, दो रेल रूटों का संचालन निजी कंपनियों को सौंपा जायेगा। सड़क, रेलवे और मेट्रो ट्रेन सेवा, इन तीन क्षेत्रों में मुख्यतः निजी-सार्वजनिक सांझेदारी (पी.पी.पी.) नमूने से पूंजीनिवेश किया जायेगा।

अमरीकी और अन्य विदेशी इजारेदार पूंजीपति हिन्दोस्तान के बाज़ार में अपना हिस्सा बढ़ाना चाहते हैं और हिन्दोस्तानी संपत्तियों पर अपनी मालिकी का हिस्सा भी बढ़ाना चाहते हैं। बीमा और एयरलाइन कंपनियों में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक करने का प्रस्ताव किया गया है। अब तक विदेशी एकल ब्रांड खुदरा कंपनियों को अपनी 30 प्रतिशत सामग्रियां हिन्दोस्तानी स्रोतों से खरीदनी पड़ती थी। इसमें अब छूट दी जायेगी। लिस्टेड हिन्दोस्तानी कंपनियों में शेयरों की सार्वजनिक मालिकी के न्यूनतम अनुपात को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत करने की योजना बताई जा रही है, ताकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सट्टेबाज निवेश करने के लिए ज्यादा पूंजी उपलब्ध कराया जा सके। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की सीमा को 24 प्रतिशत से बढ़ाकर, उस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा के बराबर कर दिया गया है।

“समानता” के नाम से, वित्त मंत्री ने प्रति वर्ष 2 करोड़ रुपए की निजी आमदनी वालों के आय कर पर अतिरिक्त शुल्क (सरचार्ज) घोषित किया है। इस क़दम से एक साल में प्राप्त होने वाला अतिरिक्त राजस्व लगभग 2700 करोड़ रुपए है। परन्तु पेट्रोल, डीजल और दूसरी चीजों पर अतिरिक्त अप्रत्यक्ष करों के ज़रिये जो 25,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व वसूलने की उम्मीद की जा रही है, वह आय कर पर सरचार्ज से मिलने वाले राजस्व का कई गुना है। समानता लाना तो दूर, वर्तमान टैक्स व्यवस्था के चलते, अमीर पूंजीपतियों से कम अदायगी की जायेगी और ग़रीब मेहनतकशों से कहीं ज्यादा।

बीते वर्षों की तरह, इस बार भी केंद्र सरकार के टैक्स से प्राप्त राजस्व का आधे से ज्यादा हिस्सा दो चीजों पर खर्च किया जायेगा जिनसे समाज को कोई लाभ नहीं है – वित्त संस्थानों को ब्याज भुगतान (6.6 लाख करोड़ रुपए) और रक्षा पर खर्च (4.3 लाख करोड़ रुपए)।

बड़े गर्व के साथ इस फैसले की घोषणा की गयी कि भारत सरकार राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए, पहली बार अमरीकी डालरों में दीर्घकालीन बांड जारी करेगी। इस तरह विदेश से उधार लेने पर ब्याज दर कुछ कम होता है लेकिन मुद्रा संबंधित ख़तरा ज्यादा है। अगर रुपए का विनिमय दर घट जाता है तो उस उधार को चुकाने का बोझ तेज़ी से बढ़ सकता है। इसका यह मतलब है कि आने वाले दिनों में जन संसाधनों का और भी बड़ा हिस्सा विदेशी कर्ज़ों को चुकाने पर खर्च किया जा सकता है।

बैंकों के कर्ज़ों को न चुकाने वाले पूंजीपतियों की कर्ज़माफ़ी के लिए, बैंकों के पुनः पूंजीकरण के नाम पर, 70,000 करोड़ रुपए निर्धारित किये गए हैं। बीते दो वर्षों में भारी मात्रा में कर्ज़माफ़ी करने के कारण, बैंकों के पुनः पूंजीकरण पर जनता के 2,06,000 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके हैं। 2018-19 में 1,97,000 करोड़ रुपए के बैंक के कर्जे़ को माफ़ कर दिया गया। 2017-18 में 1,25,000 करोड़ रुपए के बैंक कर्जे़ को माफ़ किया गया। यह जनता के धन पर एक और भारी बोझ है, जिससे उत्पादक ताक़तों या लोगों के जीवन स्तर में कोई उन्नति नहीं होगी।

बजट का मुख्य लक्ष्य और उससे एक दिन पहले पेश किये गए आर्थिक सर्वेक्षण का मुख्य लक्ष्य अगले पांच वर्षों में 5 अरब डालर (350 लाख करोड़ रुपए) सकल घरेलू उत्पाद हासिल करना है। यानी, वर्तमान राष्ट्रीय आमदनी को दुगुना करने की बात की जा रही है। हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति हमारे मज़दूरों और किसानों का अधिक से अधिक शोषण करके अपने मुनाफ़ों को कई गुना बढ़ाना चाहते हैं। 2017-18 में ग्रामीण हिन्दोस्तान में असली वेतन बढ़ने के बजाय घट गए थे। 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी कर देने का वादा खोखला है। सबका विकास का वादा भी खोखला है।

“नया हिन्दोस्तान” के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार की पूंजी केन्द्रित नीति में कोई बदलाव नहीं है। आर्थिक संवर्धन का यह मतलब होगा कि कुछ चंद हाथों में खूब सारी दौलत संकेंद्रित होगी और बाकी लोग ग़रीबी, बेरोज़गारी और दुःख-दर्द झेलते रहेंगे। हमारे मेहतकश, जो देश की दौलत के असली निर्माता हैं, अपने श्रम के फल से वंचित रह जायेंगे।

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