ब्रेटन वुड्स व्यवस्था व उसके संस्थानों – विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष – के 75 वर्ष :

साम्राज्यवादी नव-बस्तीवादी वर्चस्व एवं लूट के संस्थान

जुलाई 1944 में जब द्वितीय विश्व युद्ध तेज़ी से जारी था तो संयुक्त राज्य अमरीका ने न्यू हेम्पशायर के ब्रेटन वुड्स स्की रिसोर्ट में 44 देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया। ये देश विश्व युद्ध में उसके मित्र राष्ट्र थे।

इस गोष्ठी का अधिकृत उद्देश्य था युद्ध-पश्चात आर्थिक व्यवस्था के मूलभूत लक्षण निश्चित करना। यह घोषणा की गई थी कि यह गोष्ठी विश्व की अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने तथा दो विश्व युद्धों के बीच के हालात को फिर कभी होने से रोकने, उसके लिए आवश्यक व्यवस्था की रूपरेखा पेश करेगी।

दो विश्व युद्धों के बीच के काल में साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच निरंतर झगड़े और तीव्र आर्थिक संकट देखे गए थे। खास तौर से 1930 के दशक में बहुत ही ज्यादा बेरोज़गारी, अत्यंत महंगाई, व्यापार की रुकावटें, विनिमय दर में उतार-चढ़ाव, सोने का अभाव तथा आर्थिक गतिविधि में 60 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी।

साम्राज्यवादी खेमे में उस आर्थिक संकट की बिलकुल विपरीत हालत सोवियत संघ में थी, जहां 1917 में श्रमजीवी क्रांति के पश्चात निरंतर सामाजिक विकास हो रहा था। 1930 के मध्य तक सोवियत संघ विश्व के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप उभर कर आगे आ गया था और वहां रोज़गार तथा जीवन स्तर में तेज़ी से वृद्धि हुई थी।

1940 के दशक के मध्य तक द्वितीय विश्व युद्ध ने ब्रिटेन और फ्रांस जैसी बस्तीवादी शक्तियों को काफी कमज़ोर कर दिया था। बस्तीवादी शासन से पीड़ित देशों में उभरते मुक्ति संघर्ष तथा मज़दूर वर्ग की हड़तालें बस्तीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को ख़तरा पैदा कर रहीं थीं। समाजवादी सोवियत संघ के नेतृत्व में विश्व व्यापी फासीवाद-विरोधी युद्ध की विजय के बाद, सोवियत संघ की ख्याति चरम सीमा पर थी। नई-नई आज़ादी प्राप्त किये अनेक देश सोवियत संघ के नेतृत्व वाले समाजवादी खेमे में जुड़ने या उसके मित्र राष्ट्र बनने के इच्छुक थे।

इन परिस्थितियों ने आंग्ल-अमरीकी साम्राज्यवादियों को एक साथ आकर एक नवीन व्यवस्था व संस्थाएं स्थापित करने के लिए मजबूर कर दिया, जिससे नव-बस्तीवादी साम्राज्यवादी प्रणाली को जीवित रखा जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि नई-नई आज़ादी प्राप्त देश साम्राज्यवादी चंगुल से बाहर न निकल पाएं।

ब्रेटन वुड्स गोष्ठी के पूर्व अनेक वर्षों तक अमरीकी और बर्तानवी साम्राज्यवादियों के बीच गुप्त समझौता वार्तायें होती रहीं। उन्होंने 1940 से ही एक नवीन विश्व स्तरीय मुद्रा प्रणाली बनाने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया था।

इस गोष्ठी में यह भी स्पष्ट हुआ कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अमरीका का पलड़ा अब ग्रेट-ब्रिटेन से ज्यादा भारी हो गया है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले ही कमज़ोर हुए ग्रेट-ब्रिटेन द्वारा अत्याधिक युद्ध खर्च ने उसे दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज़दार बना दिया था और दिवालिया होने की परिस्थिति में पहुंचा दिया था। उसकी अर्थव्यवस्था घुटने टेक रही थी और दुनियाभर में उभरे मुक्ति आंदोलनों ने उसके बस्तीवादी साम्राज्य के अंत का बिगुल बजा दिया था।

संयुक्त राज्य अमरीका साम्राज्यवादी खेमे के निर्विवादित नेता के रूप में उभरा। सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय कर्ज़दाता बनने के कारण दुनिया की दो-तिहाई आरक्षित स्वर्ण निधि उसके पास थी तथा वैश्विक औद्योगिक उत्पादन का आधा भाग उसके नियंत्रण में था। अधिकांश यूरोपीय देशों की तुलना में युद्ध में उसकी बहुत कम जनहानि और आधारभूत संरचना का विध्वंस हुआ था। जब ब्रेटन वुड्स गोष्ठी चल रही थी तो ठीक उसी समय अमरीका के प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए अमरीकी सेना के कमांडरों ने जापान के हिरोशिमा व नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराने की बेहद क्रूर योजना बनाई थी।

बर्तानवी साम्राज्यवादी चाहते थे कि अमरीका उनके युद्ध के खर्चे की भरपाई करे तथा अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकाले। परन्तु अमरीकी साम्राज्यवादियों के अलग इरादे थे। उन्हें तो अपने मित्र देशों की कमज़ोर हालत का फायदा उठाने का और अपनी मुद्रा का आधिपत्य स्थापित करने का यह स्वर्ण अवसर लगा।

अमरीकी प्रतिनिधिमंडल के नेता अर्थशास्त्री हैरी डेक्सटर व्हाईट ने अमरीकी साम्राज्यवादियों की योजना पेश की जिसे गोष्ठी के अंत में पारित किया गया। “व्हाईट प्लान” के अनुसार अमरीकी डॉलर विश्व की वित्तीय व्यवस्था का एकमात्र केंद्र होगा। सभी मुद्राओं की विनिमय दर अमरीकी डॉलर के साथ संबंधित होगी। इसके बदले में सोने के साथ डॉलर का विनिमय सम्बन्ध 35 डॉलर प्रति आउंस निर्धारित रहेगा। अमरीकी डॉलर का सोने के साथ सम्बन्ध वह मापदंड बन गया जिसके आधार पर बाकी सब मुद्राओं का डॉलर के साथ संबंध निर्धारित हो गया। इसे ब्रेटन वुड्स व्यवस्था के नाम से जाना गया।

योजना में दो अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों, विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, स्थापित करने की अमरीका की मांगें जोड़ दी गईं। पूंजीवादी खेमे में वित्तीय स्थिरता स्थापित करने की ज़िम्मेदारी अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने हाथ में ले ली। विश्व बैंक ने आधारभूत संरचना में पूंजीनिवेश के लिए सस्ती दर पर लम्बी अवधि के ऋण प्रदान करने की भूमिका अपना ली, जिससे दुनियाभर में विशाल अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों के लिए आकर्षक बाज़ार बनाये जा सकें। प्रारंभ में ये ऋण यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए दिए गए थे। बाद में विश्व बैंक का कार्यक्रम एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमरीका के नई-नई आज़ादी प्राप्त ग़रीब देशों के विकास के लिए धन प्रदान करने की दिशा में बढ़ गया। ये संस्थान तय करते थे कि “स्थिरता” का क्या अर्थ है। यदि कोई देश अपना ऋण चुकाने में असफल रहा या आयात के लिए उसे ऋण लेने की ज़रूरत पड़ी तो ये संस्थाएं हस्तक्षेप करती थीं। भुगतान संतुलन की समस्या से जूझ रहे देशों को सूदखोरी दरों पर ऋण देकर वे इन देशों को ऋण जाल में फंसा देते थे।

अमरीकी साम्राज्यवादी ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिससे उन्हें कच्चे माल पर अधिकार और वस्तुओं के विश्व बाज़ार पर कब्ज़ा करना संभव होगा। इसके लिए यह आवश्यक था कि पुरानी बहुप्रचलित मुद्रा, बर्तानवी पाउंड को डॉलर में बदल दिया जाए। लंदन का स्थान वॉल स्ट्रीट ने ले लिया और इस तरह अमरीका को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं विश्व वित्त का केंद्र बिंदु बना दिया गया। बर्तानवी साम्राज्यवाद ने अपना दोयम दर्ज़ा स्वीकार लिया तथा आंग्ल-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने मिल कर नवीन व्यवस्था के अंतर्गत दुनिया पर कब्ज़ा करने का काम अपने हाथों में ले लिया।

अमरीकी डॉलर के आधार पर सभी विनिमय दरों को निर्धारित करके अमरीकी साम्राज्यवाद ने सभी भाग लेने वाले देशों को अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए अपनी-अपनी मुद्रा नीति पर नियंत्रण करने के अधिकार से वंचित कर दिया। यह अमरीका द्वारा विश्व के दूसरे देशों की संप्रभुता पर एक खूंखार हमला था।

प्रस्तावित संगठनों में अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा थोपे गए वोटिंग अधिकारों का वितरण पूरी तरह से पक्षपाती था। विश्व बैंक में अमरीका को वीटो का अधिकार था। सदस्य देशों के साथ एक समान आचरण नहीं किया गया, न उन्हें अपनी जनसंख्या के आधार पर वोटिंग अधिकार दिए गए। हर सदस्य देश को उसके द्वारा धन योगदान के आधार पर वोटिंग अधिकार दिए गए। यह स्वीकारा गया कि आम तौर पर विश्व बैंक का मुख्याधिकारी अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जायेगा तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का मुख्याधिकारी सदैव यूरोपीय ही होगा। अपनी वित्तीय प्रधानता के आधार पर अमरीका ने सभी निर्णयों पर पूर्ण नियंत्रण करने की ताकत हथिया ली।

सोवियत संघ के प्रतिनिधियों ने प्रारम्भ में गोष्ठी में भाग लिया परन्तु बाद में निर्णायक समझौते की पुष्टि करने से मना कर दिया जब यह स्पष्ट हो गया कि ब्रेटन वुड्स व्यवस्था अमरीकी साम्राज्यवाद की सेवा में काम करेगी। इससे पहले ही, 1917 की महान अक्तूबर क्रांति के पश्चात सोवियत संघ ने साम्राज्यवादी व्यवस्था से नाता तोड़ लिया था, विश्व में मज़दूरों तथा किसानों का प्रथम राज्य स्थापित किया था और समाजवाद के निर्माण के मार्ग पर आगे बढ़ रहा था।

शीत युद्ध के पश्चात विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपना जहरीला जाल और भी फैला दिया। उन्होंने ऋण लेने वाले सभी देशों पर “वाशिंगटन सर्वसम्मति” के नाम से जाने वाले नीति सुधारों का नुस्खा थोपा। यह वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का बहुत घृणित नुस्खा था।

जब भी एक देश या एक क्षेत्र पूंजीवादी संकट का शिकार हुआ, इन संस्थानों ने गिद्ध की तरह उनके संकट का फायदा उठाया। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा आदेशित स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट प्रोग्रामों ने देशों को संप्रभुता त्यागने और अपनी सार्वजानिक सेवाओं का निजीकरण करने, साम्राज्यवादी प्रवेश के लिए अपने बाज़ार खोलने, विदेशी पूंजी के आगमन पर लगे अवरोधों को हटाने, घातक ब्याज दर लागू करने तथा सामाजिक खर्चे को कम करने के लिए मजबूर कर दिया।

80 और 90 के दशक में और आज तक अनेक अफ्रीकी और दक्षिण अमरीकी देश इन संस्थानों की नीतियों तथा कृतियों के शिकार हुये हैं। 90 के दशक के अंत में पूर्वी एशिया संकट के दौरान इस क्षेत्र के अनेक देशों को अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करने और अपने बाज़ारों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा इजारेदार कंपनियों के लिए खोलने को मजबूर किया गया था। 2008 के विश्व संकट के पश्चात ऋण जाल में फंसने के बाद पुर्तगाल, यूनान, इटली, आईसलैंड तथा स्पेन जैसे अनेक यूरोपीय देशों को अपने देश में पूर्णतः जन-विरोधी नीतियां लागू करने पर मजबूर किया गया था।

दुनियाभर में विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रस्तावित नीतियों को मज़दूरों, किसानों और बुद्धिजीवियों की घृणा और विरोध का सामना करना पड़ा है। इन संस्थानों के खि़लाफ़ संघर्ष और आंदोलन दुनियाभर में देशों की संप्रभुता की रक्षा के लिए किये गए संघर्षों का प्रमुख भाग रहे हैं।

पिछले 75 वर्षों ने एक तथ्य सिद्ध कर दिया है कि अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनके मित्र देशों ने ब्रेटन वुड्स व्यवस्था और संस्थानों को विश्व युद्ध पश्चात दुनिया के लोगों पर अपनी मनमानी थोपने के लिए स्थापित किया था। यह वह काल था जब पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था पर समाजवादी खेमे के तथा विश्वभर में मुक्ति आंदोलनों के फैलने का ख़तरा मंडरा रहा था। जहां भी ब्रेटन वुड्स संस्थाओं ने अपना जाल फैलाया, वहां मौत और विनाश ही हुआ। उन्होंने ऋणी देशों को साम्राज्यवादी व्यवस्था से बांधकर रखा। विश्वभर में वे सबसे घृणित संस्थाएं बन गई हैं। देशों को गुलाम बनाने के उनके प्रयासों के विरोध में विशाल आंदोलन हुए हैं। जबकि दुनियाभर के साम्राज्यवादी इन संस्थानों की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो विश्व का मज़दूर वर्ग और मेहनतकश लोग दिल से इन संस्थानों के अंत की आरजू कर रहे हैं।

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