आर्थिक सर्वेक्षण 2019 : “नया हिन्दोस्तान” बनाने की आड़ में इजारेदार पूंजीपतियों की सेवा

केंद्रीय बजट से दो दिन पहले, 3 जुलाई को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया। यह सर्वेक्षण हर साल केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किया जाता है। इस वर्ष का सर्वेक्षण दस्तावेज़ पिछले कई वर्षों के मुकाबले काफी महत्वाकांक्षी और आडंबरपूर्ण है। भाजपा सरकार के दोबारा बड़े बहुमत के साथ चुने जाने के ठीक बाद पेश किया गया यह आर्थिक सर्वेक्षण तथाकथित तौर पर एक “सुनहरे नए भारत” की रूपरेखा पेश करने का दावा करता है।

यह आर्थिक सर्वेक्षण वर्ष 2024-25 तक हिन्दोस्तान के सकल घरेलू उत्पाद को 5 खरब अमरीकी डॉलर (350 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचाने का लक्ष्य रखता है, जिससे हिन्दोस्तान चीन और अमरीका के बाद, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा, जबकि इस समय वह सातवें नंबर पर है।

सर्वेक्षण दस्तावेज़ का गहराई से विश्लेषण करने से पता चलता है कि इसमें कुछ नया नहीं है, और जो कुछ दावा किया जा रहा है, उसे हासिल करने के लिए विदेशी बाज़ारों में निर्यात के लिए उत्पादन को और अधिक तेजी से बढ़ाया जायेगा, बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी निवेश किया जायेगा, हिन्दोस्तानी श्रम का और अधिक तेज़ी से शोषण किया जायेगा और दुनिया के बाज़ारों में हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों की हिस्सेदारी को बढ़ाने के लिए क़दम उठाये जायेंगे। इसका मक़सद हिन्दोस्तान के लोगों के जीवन स्तर को ऊंचे स्तर तक उठाना नहीं है। इसका मक़सद है टाटा, अंबानी, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपति घरानों के हाथों में पूंजी के संचय को उच्चतम स्तर पर पहुंचाना।

दस्तावेज़ के पहले अध्याय “शिफ्टिंग गियर्स – प्राइवेट इन्वेस्टमेंट एज़ द ड्राईवर ऑफ ग्रोथ, एक्सपोर्ट, जॉब्स, एंड डिमांड” (गियर बदलना – संवर्धन, निर्यात, रोज़गार और मांग को बढ़ाने के लिए निजी पूंजी निवेश प्रमुख चालक शक्ति) में आने वाले पांच वर्षों में प्रति वर्ष 8 प्रतिशत आर्थिक संवर्धन का दृश्य पेश किया गया है। हिन्दोस्तान के लिए यह दृश्य तेज़ी से निर्यात-उन्मुख पूंजीवादी संवर्धन का दृश्य है, जैसे कि चीन ने पिछले कई दशकों से लेकर 2008 तक हासिल किया था और कई अन्य पूर्वी-एशियाई देशों ने 1997 में आर्थिक संकट फूट पड़ने से पहले तक हासिल किया था।

“गियर बदलने” का अर्थ यह नहीं कि अर्थव्यवस्था की दिशा को बदला जा रहा है। इसका अर्थ है हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा हिन्दोस्तान के श्रम के अधिकतम शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट की रफ्तार को और तेज़ करना। इसका एक ही लक्ष्य है – इजारेदार पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफ़े सुनिश्चित करना। जिस तथाकथित बदलाव की वकालत की जा रही है उसका मतलब है उत्पादन में तेज़ी से बढ़ोतरी पूरी तरह से निर्यात और निवेश को बढ़ावा देने के आधार पर की जाएगी, न कि घरेलू उपभोग की मांग को पूरा करने के लिए।

किसी भी आर्थिक व्यवस्था की दिशा उसकी उत्पादन प्रक्रिया के पीछे प्रमुख लक्ष्य और प्रेरणा से निर्धारित होती है। किस वस्तु या सेवा का उत्पादन किया जाये और कितने पैमाने पर किया जाये, यह किन लोगों के हितों के आधार पर किया जाये? जिन देशों में पूंजीवादी व्यवस्था मौजूद है, किस वस्तु का और कितने पैमाने पर उत्पादन किया जाये, कौन से बाज़ार के लिए किया जाये, यह सारे फैसले उत्पादन के साधनों के मालिक पूंजीपति करते हैं। इन फैसलों के पीछे प्रमुख लक्ष्य अधिकतम निजी मुनाफ़े कमाना होता है।

देशभर के करोड़ों मज़दूर, किसान और अन्य मेहनतकश लोग विशाल विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हुए मांग करते आये हैं कि उनकी बढ़ती भौतिक ज़रूरतों को पूरा किया जाना चाहिए। यदि उनकी इन बढ़ती भौतिक ज़रूरतों को पूरा करना अर्थव्यवस्था की दिशा की चालक शक्ति बन जाती है तो पौष्टिक आहार, कपडे़, घर निर्माण के लिए ज़रूरी सामग्री, हर घर के लिए बिजली और इन्टरनेट, इत्यादि मुहैया करने के लिए भारी मांग पैदा हो जाएगी। इन सारी वस्तुओं और सेवाओं की मांग को पूरा करने के साथ-साथ अच्छे दर्ज़े की शिक्षा और सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए रोज़गार में भारी बढ़ोतरी होगी।

आर्थिक सर्वेक्षण का यह तर्क है कि घरेलू खपत की मांग के आधार पर आर्थिक संवर्धन नहीं चलाया जा सकता और कई दशकों से ज्यादा समय तक तेज़ और स्थायी संवर्धन तभी संभव होगा जब निर्यात की मांग को आर्थिक संवर्धन का प्रमुख चालक बनाया जायेगा। इस बात से यह साफ हो जाता है कि तेज़ गति से संवर्धन का मक़सद हमारे देश के लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना नहीं है। इसका मक़सद है विदेश के बाज़ारों में जो कुछ मुनाफ़े पर बेचा जा सकता है उसका उत्पादन करके, हिन्दोस्तान में निवेश करने वाले हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपति घरानों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में पूंजी का संचयन करना।

आर्थिक सर्वेक्षण का यह तर्क है कि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते तेज़ी से संवर्धन के लिए सबसे बढ़िया रास्ता है कि हम सस्ते दाम पर उत्पादन की जाने वाली ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं की आपूर्ति के लिए चीन की जगह लें। आर्थिक सर्वेक्षण का कहना है:

“जबकि यह हक़ीक़त है कि विश्व व्यापार में कुछ खलल पड़ रहा है, लेकिन विश्व निर्यात में हिन्दोस्तान की हिस्सेदारी इतनी कम है कि हमें इसे बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि मौजूदा विश्व व्यापार में खलल के हालात हिन्दोस्तान के लिए विश्व आपूर्ति की कड़ी (सप्लाई चेन) में प्रवेश करने का एक अच्छा मौका प्रदान करते हैं।” (परिच्छेद 1.30)

इस “मौजूदा खलल” का जिक्र अमरीका द्वारा चीन पर सीमा शुल्क को लेकर चलाई जा रही जंग के चलते विश्व व्यापार पर हो रहे नकारात्मक असर के संदर्भ में किया गया है। चीन के हलके विनिर्माण उद्योग में उत्पादन की जा रही कई वस्तुएं, जिनकी अमरीकी बाज़ार में बाढ़ सी आई थी, अब आयात शुल्क के चलते थोड़ी महंगी हो गयी है। आर्थिक सर्वेक्षण इसे हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के लिए एक सुनहरे मौके की तरह पेश कर रहा है, और बताता है कि अमरीका द्वारा लगाये जा रहे चीन-लक्षित शुल्क का फायदा उठाकर हिन्दोस्तानी पूंजीपति अमरीकी बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण द्वारा पेश की गयी रूपरेखा यह साफ दिखाती है कि बड़े पूंजीपति अपने खुदगर्ज़ और तंग साम्राज्यवादी मंसूबे पूरे करने के लिए हमारे देश को एक बेहद ख़तरनाक और जोखिम भरे रास्ते पर घसीट रहे हंै।

यह रास्ता बेहद जोखिम भरा है। इसकी पहली वजह यह है कि आज का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 10 या 20 वर्ष पहले जैसा नहीं रहा, जब चीन और अन्य एशियाई देशों ने तेज़ गति का निर्यात-उन्मुख पूंजीवादी संवर्धन हासिल किया था। इसके विपरीत, 2008-09 की महामंदी के बाद से विश्व व्यापार या तो ठहर गया है या कुछ-कुछ वर्षों के अंतराल के बाद सिकुड़ता जा रहा है। इसके अलावा, हिन्दोस्तान चीन के अनुभव को दोहरा नहीं पायेगा, क्योंकि हिन्दोस्तान में मज़दूरों की जीने की हालत बेहद दयनीय है, वेतन इतने कम हैं कि बड़ी मुश्किल से गुज़ारा होता है, निरक्षरता का स्तर बहुत गिरा हुआ है और देशभर में परिवहन और अन्य आधारभूत सुविधाएं बेहद बुरी हालत में हैं।

दूसरी वजह यह है कि इस हक़ीक़त से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिन देशों ने पिछले दशकों में तेज़ गति से निर्यात-उन्मुख पूंजीवादी संवर्धन हासिल किया था आज वे देश बेहद गहरे संकट में हंै। इन देशों में सामाजिक विषमता बढ़ती जा रही है, समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच भीषण टकराव है और साथ ही साथ, देश के बाहर की हालतों का इन पर बहुत भारी प्रभाव है। इन देशों की अर्थव्यवस्था पर 2008-09 की वैश्विक मंदी का बुरा असर हिन्दोस्तान से भी अधिक हुआ। इस मंदी के चलते चीन में निर्यात की मांग में गिरावट आई, जिससे बड़े पैमाने पर मज़दूरों की नौकरियां गयीं और सामाजिक अशांति भड़क उठी। इसलिए हिन्दोस्तान में पूंजीवादी संवर्धन का जो संकट चल रहा है, उसका समाधान निर्यात-उन्मुख संवर्धन नहीं हो सकता।

आर्थिक सर्वेक्षण यह भी दिखावा करता है कि हमने पश्चिमी आर्थिक विचारधारा से नाता तोड़ दिया है। लेकिन इस दस्तावेज़ का पहला अध्याय पूरी तरह से साम्राज्यवादी सोच पर आधारित है जो यह कहती है कि पूंजीवादी होड़ की “जानवरों जैसी चेतना” को खुली छूट दी जानी चाहिए, जहां बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है और हर एक व्यक्ति को खुद अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण यह मानता है कि समाज में अर्थव्यवस्था को आयोजित करने के लिए यह सबसे बढ़िया सोच है।

पहले अध्याय का शुरुआती परिच्छेद ऐलान करता है कि :

“पिछले पांच वर्षों में हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा रहा है। अर्थव्यवस्था में संवर्धन और व्यापक आर्थिक स्थिरता के फायदे समाज के सबसे निचले तबके के लोगों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कई रास्ते खोले हैं।”

इसमें “नीचे टपकने वाले” बदनाम सिद्धांत को बढ़ावा दिया गया है, जिसके अनुसार यह माना जाता है कि अगर पूंजीपतियों की दौलत तेज़ी से बढ़ जाती है तो उसमें से थोड़ा कुछ नीचे टपक-टपक कर मेहनतकशों तक पहुंचेगा और मेहनतकशों को उसके लिये आभारी होना चाहिए।

यह कहना कि पिछले पांच वर्षों में पूंजीपतियों की संपत्ति टपक-टपक कर समाज के सबसे ग़रीब व्यक्ति तक पहुंची है, यह सरासर झूठ है। यदि पूंजीवादी संवर्धन से मज़दूरों और किसानों को वाकई में फ़ायदा होता है तो फिर हाल के वर्षों में विशाल विरोध प्रदर्शनों की बढ़ोतरी क्यों हुई है? आंकड़े यह दिखाते हैं कि पिछले पांच वर्षों में बढ़ती बेरोज़गारी, घटते वेतन और घटती कृषि आमदनी के अलावा, नोटबंदी और जी.एस.टी. के लागू किये जाने की वजह से मज़दूर और किसान कर्ज़ की खाई में और गहरे डूबते जा रहे हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण से यह साफ होता है कि भाजपा मौजूदा बदनाम पश्चिमी पूंजीवादी नुस्खों को “नयी और मूल सोच” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। आर्थिक सर्वेक्षण में जो रूपरेखा पेश की गयी है वह कुछ और नहीं बल्कि वही पुराना जन-विरोधी भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का कार्यक्रम है, जिसको और अधिक तेज़ी से लागू किया जा रहा है और जिसकी वकालत विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष करते हैं। यह रूपरेखा हिन्दोस्तानी बाज़ार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने, मज़दूरों के वेतन को और नीचे गिराने के लिए है, ताकि दुनियाभर के सबसे अमीर इजारेदार पूंजीपति हिन्दोस्तान में निवेश करें और दुनिया के बाज़ारों में बेचने के लिए हिन्दोस्तान में वस्तुओं का उत्पादन करें।

सरकार जिस रास्ते पर चल रही है उससे केवल चंद मुट्ठीभर शोषकों का फायदा होगा जिनकी अगुवाई इजारेदार पूंजीपति घराने करते हैं। इससे मज़दूरों और किसानों के लिए रोज़ी-रोटी की असुरक्षा और भी बढ़ जाएगी। साथ ही विदेशी पूंजी और विदेशी बाज़ारों पर हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था की निर्भरता और अधिक बढ़ जाएगी।

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