100 दिन के एक्शन प्लान के विरोध में रेल मज़दूरों की मीटिंग : रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मीलपत्थर

2 अगस्त, 2019 को भारी वर्षा के बीच, भारतीय रेल के 100 दिन के एक्शन प्लान का विरोध करने के लिए विभिन्न एसोसिएशनों से जुड़े रेल मज़दूरों ने मध्य मुंबई के एक हॉल में सभा की।

मीटिंग का आयोजन ऑल इंडिया गाड्र्स कौंसिल (ए.आई.जी.सी.), ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.), ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (ए.आई.एस.एम.ए.), ऑल इंडिया रेलवे ट्रैक मेन्टेनर्स यूनियन (ए.आई.आर.टी.यू.), ऑल इंडिया ट्रेन कंट्रोलर्स एसोसिएशन (ए.आई.टी.सी.ए.), इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ आर्गेनाइजेशन (आई.आर.टी.सी.एस.ओ.), रेल मज़दूर यूनियन (आर.एम.यू.), कामगार एकता कमेटी (के.ई.सी.) तथा लोक राज संगठन (एल.आर.एस.) के संयुक्त मंच ने किया था।

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ए.आई.जी.सी. के मंडल सचिव, का. ए.के. श्रीवास्तव ने अपने स्वागत भाषण में आशा व्यक्त की कि रेलवे के सभी श्रेणी-आधारित रेलवे एसोसिएशनों की एकता बनाने का अथक परिश्रम, सरकार की मज़दूर-विरोधी एवं लोक-विरोधी नीतियों का विरोध करने के लिए, रेल मज़दूरों की एकता बनाने की नींव स्थापित करेगा।

के.ई.सी. की तरफ से का. मैथ्यू ने बताया कि 100 दिन के एक्शन प्लान की घोषणा होने के तुरंत बाद, देशभर में रेल मज़दूर, उसके विरोध में सड़कों पर उतर आए। इस विरोध ने रेल मंत्री पीयूष गोयल को 10 जुलाई को संसद में यह ऐलान करने के लिए मजबूर कर दिया कि, “भारतीय रेल का निजीकरण करने की कोई योजना नहीं है और भारतीय रेल का कभी निजीकरण नहीं किया जायेगा।” का. मैथ्यू ने फिर विस्तार में समझाया कि कैसे 1992 से ही कदम-ब-कदम भारतीय रेल का निजीकरण किया जा रहा है। हालांकि हर बार एक अलग नाम देकर ऐसा किया गया और कहा गया कि रेलवे का निजीकरण नहीं किया जा रहा है। यह साफ है कि प्रधानमंत्री से लेकर सभी सरकारी प्रवक्ता झूठ बोल रहे हैं कि भारतीय रेल का कभी निजीकरण नहीं किया जायेगा। सच तो यह है कि भारतीय रेल का चोरी-छिपे 20 वर्षों से आउटसोर्सिंग, निगमीकरण (कॉर्पोरेटाईजेशन), निजी सार्वजानिक सांझेदारी (पी.पी.पी.), प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश (एफ़.डी.आई.) के रूप में निजीकरण किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पुनः निर्वाचित होने के पश्चात राजग सरकार भारतीय रेल के निजीकरण को और तेज़ करने के लिए 100 दिन के एक्शन प्लान को लागू कर रही है।

ए.आई.एल.आर.एस.ए. के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष, का. बी.एन. भारद्वाज ने सरकार के चोरी-छिपे निजीकरण किये जाने के अनेक उदाहरण दिए। 30 वर्ष पूर्व भारतीय रेल में स्टाफ की संख्या 24 लाख थी। जो अब घट कर 13.5 लाख हो गई है। सरकार उसे 10 लाख तक घटाना चाहती है। यह तब किया जा रहा है, जब रेलगाड़ियों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।

ए.आई.एस.एम.ए. के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष, का. आर.के. मीणा ने कहा कि निजीकरण केवल रेल मज़दूरों के लिए ही नहीं, बल्कि यात्रियों के लिए भी हानिकारक है। भाड़े दर बढ़ेंगे क्योंकि पूंजीपति सेवा के लिए नहीं बल्कि मुनाफे़ के लिए लिए काम करेंगे। इसमें कोई भी शक नहीं है कि दुर्घटनाएं बढ़ेंगी। यात्रियों को दी जाने वाली अनेक सुविधाएं व रियायतें ख़त्म कर दी जायेंगी। यात्रियों को सचेत करना आवश्यक है ताकि रेलवे मज़दूरों की आवाज़ और बुलंद हो।

ए.आई.आर.टी.यू. के राष्ट्रीय प्रवक्ता, का. अवनीश कुमार ने व्यक्त किया कि निजीकरण भारतीय समाज के लिए धीमा ज़हर है, जिस वजह से समाज में अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब। जो भी पार्टी सत्ता में आई है, भाजपा हो या कांग्रेस पार्टी हो, सभी ने एक जैसी नीतियां अपनाई हैं। निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष केवल रेल मज़दूरों का संघर्ष नहीं है; वह देश के सभी लोगों का संघर्ष है।

आर.एम.यू. के महासचिव का. सुभाष म्हल्गी ने कहा कि कोई भी सरकार क्यों न हो, निजीकरण जारी रहता है क्योंकि बड़ी शक्तियां ऐसा चाहती हैं। केंद्र में सभी राजनीतिक पार्टियों ने राज किया है और सभी ने एक जैसी नीतियां लागू की हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय रेल की 7 उत्पादन इकाइयों ने निगमीकरण किए जाने का कड़ा विरोध किया है और हमें उनका समर्थन करना चाहिए।

लोक राज संगठन की पॉवरपॉइंट प्रस्तुति में दिखाया गया कि वर्तमान व्यवस्था में रेल निजीकरण से सबसे ज्यादा मज़दूर और यात्री प्रभावित होते हैं। उन पर सीधा असर पड़ता है। निजीकरण के फैसले लेते वक्त सरकार इनसे कभी विचार-विमर्श नहीं करती है। मज़दूरों और यात्रियों की एकता बनाना फ़ौरन ज़रूरी है। यह एक्शन प्लान मज़दूरों और यात्रियों के हितों के खि़लाफ़ है। प्लान में यात्री भाड़े दर पर सब्सिडी समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया है। बताया जाता है कि 800 करोड़ यात्रियों के लिए वार्षिक सब्सिडी 30,000 करोड़ रुपये है। सरकार कहती है कि इस “बोझ” को वह बर्दाश्त करने में असमर्थ है। परन्तु यही सरकार कुछ सैकड़ों पूंजीपतियों द्वारा लिए गए 2.5 लाख करोड़ रुपये के बैंक कर्ज़े केवल पिछले एक वर्ष में ही माफ करने में समर्थ है! यही सरकार हर साल 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक टैक्स रियायतें पूंजीपतियों को देने में समर्थ है! सब्सिडी समाप्त करने का असली उद्देश्य, यात्री भाड़ा बढ़ाकर पूंजीपतियों के लिए यात्री गाड़ियों को सौंपना है। साथ ही, माल भाड़ा को कम करना है, जो पूंजीपतियों की लम्बे समय से मांग रही है।

रेलवे के निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष, 1991 से ज़ोर-शोर से लागू की गई आर्थिक नीति – उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिए भूमंडलीकरण की नीति – के विरोध संघर्ष का एक भाग है। मज़दूरों तथा उपभोक्ताओं के एकजुट संघर्ष से निजीकरण का अवश्य ही सफलतापूर्वक विरोध किया जा सकता है। वक्ता ने लोक राज संगठन द्वारा अन्य संगठनों के साथ मिलकर, मुंबई के समीप, कलवा में बिजली वितरण के निजीकरण के विरोध के सफल संघर्ष का उदाहरण दिया।

प्रस्तुति के पश्चात्, मंच श्रोतागणों के लिए खोल दिया गया। सभी वक्ता सहमत थे कि निजीकरण यात्रियों के हितों के भी खि़लाफ़ है अतः हमें इसके ख़राब परिणामों से उन्हें अवगत कराना चाहिए और उन्हें हमारे संघर्ष का भाग बनाना चाहिए। परिवारों तथा महिलाओं का सहभाग हमारे संघर्ष को और भी सशक्त बनाएगा। हमें अन्य क्षेत्रों के मज़दूरों से भी मिलना चाहिये और रेल के निजीकरण के विरोध का समर्थन करने की गुजारिश करनी चाहिए और उनके संघर्षों का भी समर्थन करना चाहिए।

वक्ताओं ने ध्यान दिलाया कि रेलवे के निजीकरण की वजह से ज्यादा से ज्यादा अकुशल ठेका मज़दूरों के उपयोग से, दोनों, यात्रियों तथा मज़दूरों की सुरक्षा को ख़तरा पैदा होता है। सुरक्षित, मुनासिब दाम पर यात्री रेल सेवा प्रदान करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। यदि सरकार यह मौलिक ज़िम्मेदारी निभाने के क़ाबिल नहीं है तो उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है! समाज के लिए रेलवे एक मूलभूत सेवा है। इसे मुनाफ़े के नज़रिये से नहीं देखा जा सकता। निजीकरण की नीति का अनुकरण इजारेदार पूंजीवादी घरानों के फ़ायदे के लिए किया जा रहा है, जो अपने देश के असली शासक हैं। इसीलिए सत्ताधारी वर्ग की सब पार्टियों ने निजीकरण का समर्थन किया है। इस पूंजीवादी राज को बदलना ही स्थायी हल है।

मीटिंग ने सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव को पारित किया :

क)    रेलमंत्री द्वारा घोषित 100 दिन के एक्शन प्लान में मौजूदा यात्री ट्रेनों के निजीकरण, भारतीय रेल की 7 उत्पादन इकाइयों के निगमीकरण तथा यात्री भाड़े में बढ़ोतरी करने के प्रस्तावों का हम विरोध करते हैं। हम विभिन्न रूप से तब तक आंदोलन करते रहेंगे, जब तक इन प्रस्तावों को वापस नहीं लिया जाता है।

ख)    हम देशभर के सभी रेल मज़दूरों से आह्वान करते हैं कि इस आंदोलन में जुड़ें और इस प्लान के खि़लाफ़ एकजुट विरोध का निर्माण करें।

ग)     हम अन्य सभी क्षेत्रों के मज़दूरों से आह्वान करते हैं कि वे रेल मज़दूरों के निजीकरण की नीति के विरोध संघर्ष में जुड़ें, जिस नीति को हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फ़ायदे के लिए चलाया जा रहा है।

घ)     निजीकरण और प्रस्तावित 100 दिनों का एक्शन प्लान यात्रियों के हितों के भी खि़लाफ़ हैं। हम यात्रियों से आह्वान करते हैं कि वे रेल मज़दूरों के इस संघर्ष में जुड़ें और सस्ती, सुरक्षित तथा आरामदायक रेल सेवा के लिए और रेल मज़दूरों के मानवीय कार्य परिस्थिति के लिए, रेल सेवा में सुधार की एकजुट होकर मांग करें।

अपनी समापन टिप्पणी में, का. मैथ्यू ने सभी को याद दिलाया कि 1974 में नेशनल फेडरेशन ऑफ इन्डियन रेलवेमेन (एन.एफ.आई.आर.) तथा ऑल इंडिया रेलवेमेन फेडरेशन (ए.आई.आर.एफ.) सहित सभी यूनियनें नेशनल कॉर्डिनेशन कमिटी ऑफ रेलवेमेन स्ट्रगल के झंडे तले एक साथ आई थी। वह हड़ताल ऐतिहासिक बन गई थी। रेलवे के निजीकरण के हमले को हराने के लिए रेल मज़दूरों की एक बार फिर वैसी ही एकता बनाने की आवश्यकता है।

यह मीटिंग भारतीय रेल के निजीकरण के विरोध में रेल मज़दूरों के संकल्प का एक और प्रतीक है। भारतीय रेल का निर्माण लोगों के धन और लाखों मज़दूरों के श्रम से किया गया है। लोगों के 6,00,000 करोड़ रुपये से अधिक धन से उसका निर्माण किया गया है। इस वर्ष में ही 70-80 हज़ार करोड़ रुपये लोगों का धन उसमें लगाया जा रहा है। सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी पूंजीपति केे निजी मुनाफे़ के लिए भारतीय रेल या उसके किसी हिस्से को बेच दे।

अब यह स्पष्ट हो गया है कि सभी मुनाफ़ादायक कार्यों को हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों को सौंपना और भारतीय रेल को सभी नुकसानदायक कार्यों को करने पर मजबूर करना – एक के बाद एक आने वाली सरकारों का यही उद्देश्य रहा है।

रेलवे के निजीकरण को और तेज़ी से करने की योजना नयी पुनः निर्वाचित सरकार के सभी क्षेत्रों में निजीकरण के बड़े हमले का एक भाग है। वर्तमान वित्त वर्ष के लिए अब तक का सबसे अधिक 1 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा विनिवेश का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नीति आयोग ने 46 से भी अधिक सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण करने या उन्हें बंद करने के लिए सूची बनाई है जिसमें से अनेक को पूरी तरह से बेचने का इरादा है।

निजीकरण न केवल उस क्षेत्र के मज़दूरों के हितों के ख़िलाफ़ है बल्कि वह समाज के आम हितों के खि़लाफ़ है। वह लाखों-लाखों ग़रीब लोगों को परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, जल आपूर्ति जैसी ज़रूरी सेवाओं से वंचित करता है। अच्छी गुणवत्ता की पर्याप्त मात्रा में सस्ती दर पर इन मूलभूत सेवाओं को प्रदान कराना प्रत्येक सरकार की ज़िम्मेदारी है। ऐसी सेवाओं की आपूर्ति से मुनाफ़ा कमाना उसका उद्देश्य नहीं हो सकता।

निजीकरण के अभियान को हिन्दोस्तानी तथा विदेशी इजारेदारियों के कहने पर आगे बढ़ाया जा रहा है, जो लोगों के धन से निर्मित सार्वजानिक क्षेत्र की संपत्ति को कौड़ी के भाव में खरीदना चाहते हैं। पूंजीवाद के चरित्र के कारण बार-बार होने वाले संकटों से बाहर निकलने के लिए वे मुनाफ़ा कमाने के नए अवसर खोज रहे हैं।

अतः भारतीय रेल के निजीकरण के विरोध में संघर्ष इजारेदार घरानों के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग के खि़लाफ़ संघर्ष है। इस मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी कार्यक्रम को हराने के लिए सभी रेल मज़दूरों तथा सम्पूर्ण मज़दूर वर्ग की लड़ाकू एकता को और मजबूत करने की आवश्यकता है। एकजुट मज़दूर वर्ग को निजीकरण के हमले को तुरंत रोकने की मांग करनी होगी। उन्हें यह भी मांग करनी होगी कि राज्य समाज में सभी की सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काम करे, न कि केवल चंद पूंजीवादी शोषकों के सुख के लिए। यह मांग तभी प्राप्त होगी, जब किसानों के साथ मिलकर मज़दूर वर्ग अपने देश के वास्तविक शासक बनने के लिए संघर्ष करेंगे।

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