लंदन में हिन्दोस्तानी हाई कमीशन पर हजारों का विरोध प्रदर्शन

15 अगस्त, 2019 को लंदन, में भारतीय हाई कमीशन के सामने पूरे ब्रिटेन में बसे कश्मीरियों ने हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा जम्मू और कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे़ को ख़त्म किये जाने के फैसले का विरोध किया। यह विरोध प्रदर्शन इतना विशाल था कि उस इलाके का ट्रैफिक पूरी तरह ठप्प हो गया था। महिलाओं और बच्चों समेत सभी उम्र के लोगों ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया। कई लोगों ने अपने काम से छुट्टी लेकर इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया और कश्मीर में जनजीवन को पूरी तरह से ठप्प किये जाने के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की। प्रदर्शनकारियों ने, “हमें चाहिए, आज़ादी”, “हिन्देास्तानी सेना वापस जाओ” जैसे नारे लगाये।

ग़दर इंटरनेशनल और इंडियन वर्कर्स एसोसिएशन ने कश्मीरियों के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करने के लिए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। ग़दर इंटरनेशनल द्वारा छापा गया पर्चा सैकड़ों की संख्या में लोगों के बीच बांटा गया।

यहां हम उस पर्चें को पुनः प्रकाशित कर रहे हैं।

कश्मीर को हिन्दोस्तान का केंद्र शासित प्रदेश बनाने से कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी

5 अगस्त को, भाजपा की नेतृत्व वाली सरकार ने जम्मू और कश्मीर राज्य की विशेष स्थिति को समाप्त कर दिया और इसे केंद्र द्वारा सीधे शासित होने के लिए दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया। इस फैसले के अनुसार जम्मू और कश्मीर का अपना विधानमंडल होगा जबकि लद्दाख का कोई विधानमंडल नहीं होगा। हिन्दोस्तानी संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को रद्द कर दिया गया, जिसके तहत कश्मीर विधायिका को राज्य के स्थाई निवासियों की स्थिति के बारे में फैसला करने का प्रावधान था। इस प्रावधान के अनुसार केवल कश्मीर के स्थाई निवासी ही कश्मीर में अचल संपत्ति के मालिक हो सकते थे।

संविधान में इस बदलाव की घोषणा करने से पहले कश्मीर के सैकड़ों नेताओं को गिरफ्तार या नज़रबंद कर दिया गया, जिनमें ऐसी पार्टियों के नेता भी शामिल हैं जो हिन्दोस्तान परस्त थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया कि कश्मीर के विशेष दर्जे़ को ख़त्म करने से कश्मीरियों को फायदा होगा। उनका दावा है कि इससे कश्मीर में रोज़गार पैदा होगा और बाकी देशवासियों को मिलने वाले लाभ अब कश्मीरियों को भी मिलेंगे।

आज़ादी के समय, बर्तानवी बस्तीवादियों ने हिन्दोस्तान को दो देशों हिन्दोस्तान और पाकिस्तान में बांटा और रियासतों को यह अधिकार दिया कि वे या तो हिन्दोस्तान या फिर पाकिस्तान के साथ जुड़ें या फिर आज़ाद बनी रहें।

लेकिन एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवादियों की कश्मीर को लेकर कुछ और ही योजनायें थीं। वे इस रणनैतिक तौर से महत्वपूर्ण क्षेत्र पर अपना नियंत्रण चाहते थे ताकि वे साम्यवाद के प्रसार के ख़िलाफ़ इसका इस्तेमाल कर सकें, क्योंकि पूर्व-औपनिवेशिक देशों के लोगों के बीच सोवियत संघ के लिए बहुत सम्मान था, जिसने फासीवाद के खि़लाफ़ युद्ध का नेतृत्व किया था और उसे हराया था। ये लोग या तो सोवियत संघ से जुड़ना चाहते थे या फिर उनके दोस्त बनना चाहते थे। लेकिन साम्राज्यवादी नहीं चाहते थे कि ये देश समाजवादी खेमे से जुड़ें। इस वजह से वे कश्मीर में अपने सैनिक अड्डे बनाना चाहते थे ताकि वे वहां से सोवियत संघ और चीन के मुख्य औद्योगिक केंद्रों को निशाना बना सकें।

चूंकि पाकिस्तान का बस्तीवादियों के साथ क़रीबी रिश्ता था, उन्होंने उत्तर पश्चिम सीमा से आदिवासी लोगों को संगठित करके कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए हमला किया। कश्मीर में अपना राज खोने के डर से, महाराजा हरी सिंह ने हिन्दोस्तान के साथ आंशिक परिग्रहण का समझौता किया। इस तरह से कश्मीर दो हिस्सों में बांट दिया गया था, एक पाकिस्तान के कब्जे़ में और दूसरा हिन्दोस्तान के।

उस समय से लेकर आज तक, साम्राज्यवादियों ने हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को एक-दूसरे से ख़िलाफ़ बनाए रखा है। हाल ही में अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तान को अपने गुट में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे वे एशिया के साथ-साथ दुनिया पर अपना दबदबा क़ायम करने की अपनी रणनीति के तहत चीन को घेर सकेंगे। हिन्दोस्तानी पूंजीपति अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ हाथ मिलाकर दक्षिण एशिया में खुद एक साम्राज्यवादी ताक़त बनना चाहते हैं। हिन्दोस्तानी सरकार की इस चाल के पीछे भी शायद अमरीकी साम्राज्यवादियों का समर्थन हो सकता है ताकि हिन्दोस्तान ईरान के ख़िलाफ़ उनका साथ दे।

हिन्दोस्तान के पूंजीवादी राज्य ने कश्मीरियों सहित देश के सभी लोगों की हमेशा अवहेलना की है। हिन्दोस्तान के पूंजीपतियों का यह राज्य हमेशा हिन्दोस्तान के प्राकृतिक संसाधनों और विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोगों की सम्पत्ति को ठीक उसी तरह से लूटता आया है जिस तरह आज़ादी से पहले बर्तानवी बस्तीवादी शासक किया करते थे।

हिन्दोस्तानी राज्य यह दावा करते नहीं थकता कि किस तरह हिन्दोस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है या एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। असलियत में यह सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों का राज्य है। यह राज्य कश्मीरियों के साथ-साथ उन तमाम लोगों पर बर्बर हमले करता है जो अपने अधिकारों की मांग करते हैं और उसके लिए संघर्ष करते हैं। अपने राष्ट्रीय और मानवीय अधिकारों के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों को जेलों में बंद किया गया है।

यह राज्य केवल सबसे बड़े पूंजीपतियों का एजेंडा लागू करता है और हिन्दोस्तान के सभी राज्यों के मज़दूरों के शोषण और ज़मीन की लूट को आसान बनाता है। इसीलिए उसने बर्तानवी राज्य द्वारा बनाये गए जन-विरोधी कानूनों को अभी तक बरकरार रखा है और मज़दूर वर्ग, किसानों और हिन्दोस्तान की सभी राष्ट्रीयताओं के लोगों का दमन करने के लिए उससे भी भयानक काले कानून बनाये हैं। कश्मीर के विशेष दर्जे़ को ख़त्म करने के पीछे भी यही मक़सद है कि किस तरह से पूंजीपतियों के लिए कश्मीर के संसाधनों की लूट आसान बन जाए।

हिन्दोस्तान द्वारा विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा, आई.टी., कृषि आदि के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति करने के बावजूद आज करोड़ों लोग भयंकर ग़रीबी में जी रहे हैं और बेहद सम्मानहीन और दयनीय जीवन जीने के लिए मजबूर हैं।

कथनी से अधिक करनी बोलती है। जहां तक हिन्दोस्तान के मज़दूरों का सवाल है, भाजपा सहित पूंजीपतियों की सभी सरकारों ने हमेशा ऐसे वायदे किये हैं जिन्हें निभाने का उनका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने ग़रीबी ख़त्म करने का, किसानों की आय को दुगना करने का, रोज़गार बढ़ाने का वायदा किया, लेकिन हमेशा से सिर्फ पूंजीपतियों की जायदाद को बढ़ाने का ही काम किया है।

कश्मीरी लोगों के साथ-साथ हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के सभी लोगों की सभी समस्याओं का एक ही समाधान है – एक ऐसी नई व्यवस्था का निर्माण करना, जिसमें लोग फैसले ले सकें और अर्थव्यवस्था की दिशा लोगों के कल्याण की ओर हो। यह एक ऐसा हिन्दोस्तानी संघ होगा जहां विभिन्न राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के लोग स्वेच्छा से जुड़ेंगे। और जहां सभी घटकों के अधिकारों का सम्मान किया जाएगा और समाज की संपत्ति का उपयोग समाज की भौतिक और सांस्कृतिक स्तर को बढ़ाने के लिए किया जाएगा।

इंडियन वर्कर्स एसोसिएशन और ग़दर इंटरनेशनल

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