पेंशन में कटौती के खि़लाफ़ फ्रांस में आम हड़ताल

पूरे फ्रांस में आम हड़ताल चल रही है। हड़ताल के पहले दिन 5 दिसंबर को 8,00,000 मज़दूरों ने पेरिस की सड़कों पर जुलूस निकाला। 5-11 दिसंबर के बीच सभी स्कूल बंद रहे और और सार्वजनिक यातायात ठप्प रहा।

यह हड़ताल देश की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन द्वारा सरकार द्वारा प्रस्तावित “पेंशन सुधार” योजना के खि़लाफ़ बुलाई गयी थी। फ्रांस में पेंशन व्यवस्था में सुधार के नाम पर मज़दूरों के बरसों के संघर्ष से हासिल अधिकारों पर हमले किये जा रहे हैं। राष्ट्रपति मैक्रॉन की अगुवाई में सरकार पूंजीपति वर्ग को यह साबित करना चाहती है कि वह पिछली सरकार से बेहतर तरीके से उनकी सेवा कर सकती है। इससे पहले की सरकार ने भी पांच वर्ष पहले इसी “पेंशन सुधार” को लागू करने की कोशिश की थी लेकिन मज़दूर यूनियनों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध के चलते उसे अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा था।

फ्रांस में कई पेंशन योजनायें चल रही हैं, और अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों के लिए विशिष्ट नियम लागू हैं। जबकि सरकारी कर्मचारी 62 की उम्र में सेवानिवृत्त होते हैं, रेलवे के मज़दूरों की सेवानिवृत्ति की उम्र इससे कम है। उदाहरण के लिए ट्रेन ड्राईवर की रिटायरमेंट उम्र 50 वर्ष है। बरसों के संघर्ष के बाद रेलवे मज़दूरों ने रिटायरमेंट के तुरंत बाद मासिक पेंशन का अधिकार हासिल किया था। फ्रांस की सरकार द्वारा प्रस्तावित “सर्वव्यापी पेंशन” योजना इस अधिकार को छीन लेगी। यह एक उदाहरण है कि इस तरह से पेंशन व्यवस्था को सरल और सर्वव्यापी बनाने के नाम पर मज़दूरों के अधिकारों पर हमला किया जा रहा है।

French workers country-wide strikeप्रस्तावित नयी पेंशन योजना एक समान नियम पर आधारित होगी जहां एक मज़दूर को पूरी पेंशन केवल 64 वर्ष की उम्र होने के बाद ही मिलेगी।

फ्रांस की सरकार द्वारा किये जा रहे तथाकथित पेंशन सुधार के पीछे असली मक़सद केवल इसको सरल बनाना नहीं है। इसका असली मक़सद पेंशन निधि को सबसे बड़े इजारेदार वित्तीय पूंजीपतियों के लिए मुनाफे़दार व्यवसाय में तब्दील करना है। इसका असली मक़सद मज़दूरों के लिए सेवानिवृत्ति सुविधा के लिए जमा की गयी रकम को पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफ़े का स्रोत बनाना है।

मज़दूरों की सेवानिवृत्ति निधि को “बाज़ार के जोखिम” के हवाले करने का किस तरह से तबाहकारी नतीजा हो सकता है, इसका पर्दाफाश 2008-09 में हुए वैश्विक आर्थिक संकट में हो चुका है। इस संकट के चलते अमरीका और यूरोप के लाखों करोड़ों मज़दूरों ने अपनी मेहनत की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खो दिया था।

फ्रांस में चल रही इस आम हड़ताल में तमाम क्षेत्रों के मज़दूरों की व्यापक हिस्सेदारी, वर्ग संघर्ष के तीखे होने की निशानी है। इससे यह साफ़ नज़र आ रहा है कि मज़दूर वर्ग अपने लंबे संघर्ष से जीते हुए अधिकारों को त्यागने और इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने लिए लाये गए तथाकथित सुधारों को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

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