अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अफ़गानिस्तान से सभी सैनिकों को वापस बुलाने के समझौते पर हस्ताक्षर किए:

कब्ज़ाकारी सेना के ख़िलाफ़ अफ़गानिस्तान के लोगों के बहादुर संघर्ष को सलाम

29 फरवरी को, अमरीकी सरकार और तालिबान के प्रतिनिधियों ने क़तर के दोहा में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। तालिबान अफ़गानी लोगों के उन संगठनों में से एक है जो अपने देश पर अमरीकी साम्राज्यवादी कब्जे़ के ख़िलाफ़ लगभग दो दशकों से लड़ता आ रहा है। इस समझौते के अनुसार, अमरीका ने सार्वजनिक तौर पर यह वादा किया है कि वह अपनी सारी सेना अफ़गानिस्तान से हटा लेगा और यह काम अगले 14 महीनों में पूरा कर दिया जायेगा। उन्होंने आपस में ’हिंसा को कम करने’ और कैदियों की अदला-बदली पर भी सहमति व्यक्त की है। अफ़गानिस्तान के भविष्य को निर्धारित करने के लिए तालिबान ने अफ़गानिस्तान के भीतर सभी लोगों से बातचीत में भाग लेने की सहमती भी व्यक्त की है।

अफ़गानिस्तान पर हमला करने और उसकी संप्रभुता को क्रूरता से कुचलने के 19 साल बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा है। यह अफ़गान लोगों द्वारा तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी आज़ादी को पुनः स्थापित करने के कभी न मिटने वाले संघर्ष का नतीजा है। यह अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनकी विशाल फ़ौजी ताक़त के गाल पर एक थप्पड़ है जिसने अपने से छोटे देश और उसके लोगों पर कब्ज़ा किया था और तबाही मचाई थी।

19 वर्षों के दौरान अफ़गानिस्तान पर किया गया आक्रमण और कब्ज़ा अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा अब तक का सबसे लंबा युद्ध है। यह हमला इस बहाने से शुरू किया गया था कि जिन लोगों ने 11 सितंबर, 2001 को न्यूयॉर्क पर आतंकवादी हमले किए थे, वे अफ़गानिस्तान में छुपकर बैठे थे। हालांकि, यह शीत युद्ध समाप्त होने के बाद की अवधि में मध्य एशिया के रणनैतिक और संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा मजबूत करने की अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा रची एक बड़ी योजना का हिस्सा था। ब्रिटेन और अन्य साम्राज्यवादी नाटो देशों के गठबंधन के समर्थन के साथ, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अफ़गानिस्तान पर लगातार बमबारी करते हुए उसे तबाह कर दिया। तालिबान की तत्कालीन सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद अपनी कठपुतली सरकार को स्थापित किया। यह कब्ज़ा मानव इतिहास में सबसे बर्बर हमला था, जिसमें लाखों पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे गए, उन्हें यातनाएं दी गईं और लाखों लोग देश छोड़कर भागने पर मजबूर हुए।

कब्ज़े की शुरुआत से, अफ़गानिस्तान के लोगों ने कभी घुटने नहीं टेके और बड़ी बहादुरी के साथ लड़ते रहे। साम्राज्यवादी सेना, डटकर मुक़ाबला करती अफ़गानी सेना को जड़ से उखाड़ फेंकने में असमर्थ थी, जिसको लोगों का समर्थन प्राप्त था। 3.7 करोड़ लोगों के इस देश में अमरीका अधिक से अधिक सैनिकों को तब तक भेजता रहा था, जब तक कि उनकी संख्या लगभग 1 लाख तक नहीं पहुंच गई। पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट हो गया था कि अफ़गानिस्तान में साम्राज्यवादी युद्ध हार चुके हैं। विशाल विदेशी सैन्य ताक़तों के समर्थन के बावजूद देश के 40 प्रतिशत से कम हिस्से पर कठपुतली सरकार और उनकी सेनाओं का कब्ज़ा था।

पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट हो गया था कि विभिन्न अमरीकी सरकारें युद्ध के मैदान से बाहर निकलने की ऐसी कोशिशें करती रही हैं, जिनसे अमरीकी साम्राज्यवाद की कम से कम नुकसान और बदनामी हो। 29 फरवरी को दोहा में किया गया समझौता यह दिखाता है कि वास्तव में अफ़गानिस्तान के लोगों ने अमरीकी साम्राज्यवाद को बुरी तरह से हराया है।

अफ़गानिस्तान पर किया गया आक्रमण और कब्ज़ा अमरीकी साम्राज्यवादियों के ख़तरनाक ’आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध’ का एक अहम हिस्सा था। अफ़गानिस्तान पर कब्जे़ के बाद, साम्राज्यवादी देशों और उनके सहयोगियों ने इराक, लिबिया, सिरिया और यमन पर हमला किया और ईरान पर जबरदस्त दबाव डाला। इस अभियान के तहत यह कोशिश की गई कि उन सभी मुस्लिम देशों, लोगों और संगठनों को ‘आतंकवादी’ और ’उग्रवादी’ करार दिया जा सके, जो अमरीकी साम्राज्यवाद के भू-राजनीतिक लक्ष्य के साथ सहमत नहीं थे और उन्हें ख़त्म किया जा सके। बड़े पैमाने पर गलत प्रचार के माध्यम से उन्हें सबसे पिछड़े तत्वों के रूप में दिखाया गया जो शांति और मानव प्रगति के दुश्मन हैं। हर एक बस्तीवादी ताक़त द्वारा दिए गए तर्क का इस्तेमाल करते हुए, अफ़गानिस्तान पर अमरीकी कब्जे़ के खि़लाफ़ बहादुरी से लड़ने वालों को दानव के रूप में पेश किया गया, जबकि विदेशी ताक़तों को व्यवस्था, सभ्यता और अफ़गानी लोगों की प्रगति के दूत के रूप में पेश किया गया।

दोहा समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद, दुनियाभर के पूंजीवादी मीडिया और राजनीतिक पंडितों में ऐसे कई लोग हैं, जो इस बात का अफ़सोस कर रहे हैं कि अमरीका के अफ़गानिस्तान से बाहर निकल जाने के बाद अफ़गानिस्तान में पहले से ज़्यादा अस्थिरता और अंदरूनी लड़ाई का महौल पैदा होगा। यह भी एक तरह की बस्तीवादी मानसिकता है जो यह तर्क देती है कि केवल विदेशी ताक़तें ही कब्ज़ा किए गए देशों में शांति और स्थिरता सुनिश्चित कर सकती हैं, और उनके चले जाने से अराजकता का माहौल पैदा हो जायेगा। यही बात तब भी कही गई थी जब ब्रिटिश शासकों को हिन्दोस्तानियों के संघर्ष के चलते भारत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हमें ऐसी झूठी भविष्यवाणियों को ठुकराना चाहिए जो इस क्षेत्र में निरंतर साम्राज्यवादी उपस्थिति को बनाए रखने का एक बहाना है।

साथ ही, अफ़गानिस्तान के लोगों के लिए संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है और उन्हें आगे के कई ख़तरों के प्रति सतर्क रहने की ज़रूरत है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करना इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अमरीकी साम्राज्यवादी अफ़गानिस्तान और इस क्षेत्र में अलग-अलग तरीकों से अपनी पकड़ बनाए रखने या वापस कब्ज़ा करने की कोशिश नहीं करेंगे। अमरीकी साम्राज्यवाद मानव इतिहास की सबसे ख़तरनाक और लुटेरी ताक़त है, और ज़मीन पर सैनिक तैनात करना तो बस एक तरीका है जिससे वह दुनिया भर के लोगों पर अपना हुकूमत जमाने की कोशिश करता है।

न केवल अमरीकी राज्य, बल्कि हिन्दोस्तानी राज्य सहित कई अन्य राज्य भी अफ़गानिस्तान में अपने हितों को कैसे आगे बढ़ाएं, इस लक्ष्य के लिए अलग-अलग तरीके से कोशिशें कर रहे हैं, जैसा कि वे पिछले कई सालों से करते आये हंै। इसके अलावा, यह बात भी सच है कि अफ़गानिस्तान में कब्जे़ के दौरान, साम्राज्यवादियों और उनके सहयोगियों ने अपनी साज़िशों के ज़रिये अफ़गानिस्तान में अलग-अलग तबकों के बीच अविश्वास पैदा करके बंटवारे के बीज बोए हैं।

अब यह अफ़गानिस्तान के लोगों पर निर्भर करता है कि वे इस क्रूर, खूनी और लंबे कब्ज़े के बाद, किस तरह से अपनी कड़ी मेहनत से हासिल की गयी आज़ादी की हर विदेशी दखलंदाज़ी से हिफ़ाज़त करते हैं और अपने महान देश को शांति और समृद्धि के रास्ते पर आगे ले जाते हैं।

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