पूंजीवाद का गहराता संकट

विश्व और हिन्दोस्तान के स्तर पर पूंजीवाद गहरे संकट में है। इस कारण सभी मुख्य अंतर्विरोध और तीव्र हो रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक नेताओं द्वारा बार-बार किये जा रहे दावों के बावजूद कि अर्थव्यवस्था का पुनरुत्थान नजदीक है, उत्पादक गतिविधियों ने अभी वह ज़ोर नहीं पकड़ा है जो 2008 के संकट से पूर्व था

विश्व और हिन्दोस्तान के स्तर पर पूंजीवाद गहरे संकट में है। इस कारण सभी मुख्य अंतर्विरोध और तीव्र हो रहे हैं।

विश्व भर में संकट

विभिन्न राजनीतिक नेताओं द्वारा बार-बार किये जा रहे दावों के बावजूद कि अर्थव्यवस्था का पुनरुत्थान नजदीक है, उत्पादक गतिविधियों ने अभी वह ज़ोर नहीं पकड़ा है जो 2008 के संकट से पूर्व था। यूरोप और उत्तरी अमरीका के अधिकांश पूंजीवादी देशों में उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। चीन और हिन्दोस्तान में उत्पादन की गति काफी कम हो गई है। हाल के वर्षों में इन दोनों देशों में लाखों लोगों ने अपनी नौकरियां खोई हैं।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की वृद्धि दर पिछले दस वर्षों के सबसे कम स्तर तक गिर गई है। हाल के वर्षों में अमरीका द्वारा लिये गये एक-तरफा क़दमों के कारण वृद्धि दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अमरीका अनेक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों से बाहर आ गया है और उसने ईरान, रूस, तुर्की और चीन आदि पर प्रतिबंध लगाये हैं।

वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था में संकट कुछ दिन पहले और भी गंभीर हो गया, जब दुनिया में कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले दूसरे सबसे बड़े देश सऊदी अरब ने अचानक कच्चे तेल का भाव 30 प्रतिशत घटा दिया। रूस, अमरीका और सऊदी अरब के बीच तेल के उत्पादन की मात्रा और भाव को लेकर चल रहे विवाद के कारण उसने यह क़दम उठाया। वर्ष 2009 के बाद 2020 में पहली बार तेल की मांग घटने की आशंका है।

वैश्विक पूंजी का प्रवाह कम हो गया है। प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश घटकर 2018 में 1300 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष 1500 अरब डॉलर था। यह तीन वर्षों से लगातार गिरता जा रहा है।

आर्थिक गिरावट मुख्यतः महनतकशों की क्रय शक्ति घटने का परिणाम है। यह गिरावट अमरीका द्वारा लगाये गए प्रतिबंधों और सीमा शुल्क के युद्ध के अलावा, अत्याधिक सट्टेबाज़ी और हाल ही में कोरोना वायरस के झटके के कारण और भी गंभीर हो गई है।

सभी सरकारों द्वारा लिया गया कुल कर्ज़ 2018 में विश्व के सकल घरेलू उत्पाद के 230 प्रतिशत के सबसे उच्च स्तर तक बढ़ गया। जनवरी 2020 में विश्व बैंक ने एक नये वैश्विक कर्ज़ संकट की चेतावनी दी।

मानवीय श्रम द्वारा उत्पादित अतिरिक्त मूल्य का बहुत छोटा अंश उत्पादन के लिए निवेश किया जा रहा है। जो लोग अरबों डॉलर के मुनाफ़े से अपनी जेबें भर रहे हैं वे उसे उत्पादन में नहीं लगा रहे हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं है कि उत्पादन के लिए निवेश से वे अधिकतम मुनाफे़ कमा पाएंगे। दुनिया के सबसे अमीर लोग अपनी विशाल पूंजी विभिन्न प्रकार की संपत्तियों को सट्टेबाज़ी और युद्धों के खर्चों तथा हथियारों के उत्पादन में लगा रहे हैं।

इस परजीवी व्यवस्था का पूरा पर्दाफाश हो गया है।

पूंजीवाद अपने चरम स्तर साम्राज्यवाद पर उत्पादक शक्तियों को विशाल मात्रा में नष्ट कर रहा है। वह मानवीय उत्पादक शक्तियों और भौतिक उत्पादन के साधनों, दोनों को नष्ट कर रहा है। नई नौकरियांे की तुलना में अधिक संख्या में मौजूदा नौकरियां नष्ट हो रही हैं। बाज़ार में खपत की कमी के कारण मशीनें बंद पड़ी हैं। इजारेदार पूंजीपति उत्पादन में निवेश करने की तुलना में शेयर बाज़ार, रियेल स्टेट बाज़ार, वस्तु और मुद्रा बाज़ार में जुआ खेलकर लाभ कमाना अधिक फ़ायदेमंद पा रहे हैं।

हिन्दोस्तानी आर्थिक संकट

अपने देश में हाल के वर्षों में उत्पादन की वृद्धि दर कम होती जा रही है। गिरावट इस हद तक पहुंच गई है कि औद्योगिक वृद्धि दर नकारात्मक हो गई है। दिसम्बर 2019 में औद्योगिक उत्पादन पिछले वर्ष से कम था। विनिर्माण उद्योग की क्षमता उपयोग दर 2008 के बाद से अब सबसे निम्नतम स्तर तक गिर गई है।

औद्योगिक उत्पादन इसलिए कम हुआ है, क्योंकि जो उत्पादन किया जा रहा है उसे खरीदने की क्षमता लोगों के पास नहीं है। वर्षों से मज़दूरों, किसानों, दस्तकारों और छोटे दुकानदारों का जो शोषण किया गया है और उन्हें लूटा गया है, उसके कारण उनके पास आवश्यक क्रय शक्ति नहीं है।

यह पूंजीवादी अति-उत्पादन का संकट है – अर्थात, एक ऐसा संकट जो केवल पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पैदा होता है, जहां उत्पादन संबंध उत्पादन के साधनों की निजी मलिकी और मज़दूरों के शोषण पर आधारित हैं, जहां मज़दूरों के पास अपनी श्रम शक्ति के अलावा बेचने के लिये और कुछ नहीं है।

देश में उपभोग की वस्तुओं और सेवाओं की मांग कम होने के साथ-साथ, उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए पूंजी निवेश की मांग में भी कमी आई है। हाल के वर्षों में पूंजीवादी मुनाफे़ की दर घट गई है। साथ ही नये पूंजी निवेश का स्तर भी गिर गया है। हिन्दोस्तानी औद्योगिक वस्तुओं के निर्यात के संवर्धन की दर भी घट गई है।

आर्थिक संकट के शुरुआती लक्षण बैंकों के “न चुकाये गये कर्जों” के रूप में उभरकर कर आये। हाल में यह समस्या साल दर साल बढ़ती ही गई है। केन्द्रीय राज्य ने इन विशाल कर्ज़ों का बोझ लोगों की पीठ पर लादने के लिए अनेक क़दम उठाए हैं। बैंकों के “पुनः पूंजीकरण” के नाम पर इन कर्ज़ों को माफ़ करने के लिए केंद्रीय बजट से विशाल पूंजी खर्च की गई है।

न चुकाये गये कर्ज़ों और घोटालों के कारण अनेक सार्वजानिक और निजी बैंकों में जमा लोगों की बचत ख़तरे में पड़ गई है। सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करके देश का चैथा सबसे बड़ा निजी बैंक, यस बैंक को डूबने से बचाने के लिए स्टेट बैंक को उसका अधिग्रहण करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसके पहले संकट में फंसे अनेक सार्वजनिक बैंकों को डूबने से बचाने के लिए उनका विलय किया गया है।

2014-18 के दौरान भाजपा सरकार कुछ इजारेदार पूंजीपतियों के लिये अधिकतम मुनाफे़ कमाने के मौके सुनिश्चित करने में सफल हुई। 2016 की नोटबंदी से डिजिटल भुगतान सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनियों ने मोटा मुनाफ़ा कमाया। जी.एस.टी. को लागू करने से उन कंपनियों के मुनाफ़ों में बढ़ोतरी हुई जो पूरे देश में माल बेचते हैं। इन दोनों क़दमों से स्थानीय और प्रादेशिक बाज़ारों में व्यापार करने वाली छोटी और मध्यम स्तर की बहुत सारी कम्पनियां नष्ट हो गयीं।

नौकरीपेशा मज़दूरों का जीवन स्तर बद से बदतर हो गया है। उनके वेतन आसमान छूती महंगाई के अनुसार नहीं बढ़े हैं। नवम्बर 2019 तक प्राप्त श्रम ब्यूरो के अधिकृत आंकड़े दिखाते हैं कि कृषि मज़दूरों के वास्तविक वेतन पिछले वर्ष की तुलना में 1.8 प्रतिशत कम हो गए हैं जबकि गैर कृषि मज़दूरों के 2.1 प्रतिशत गिर गए हैं।

रोज़गार में बढ़त या गिरावट के कोई भी अधिकृत आंकड़े जारी नहीं किये जा रहे हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इन्डियन इकॉनोमी (सी.एम.आई.ई.) द्वारा संकलित और प्रकाशित किए गए अनाधिकृत आंकड़े पुष्टि करते हैं कि नई नौकरियों के पैदा होने की संख्या के मुक़ाबले नौकरियों के नष्ट होने की संख्या ज्यादा है।

1990 के दशक से शुरू होकर 2008 तक हिन्दोस्तान में पूंजीवादी वृद्धि तेज़ होती गई। ऑटोमोबाइल, टेलीकॉम, आईटी, बी.पी.ओ. सहित तेज़ी से बढ़ते अनेक क्षेत्रों में लाखों नई नौकरियां पैदा हुईं। हाल के वर्षों में इन्हीं क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मज़दूरों को नौकरियों से निकाला गया है।

बड़ी संख्या में नौकरियों के नष्ट होने और वास्तविक वेतन में गिरावट होने के कारण वेतन-भोगी परिवारों की औद्योगिक वस्तुओं को खरीदने की क्षमता कम हो गई है। इस वजह से मज़दूर वर्ग द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की खपत की कुल मात्रा घट गई है। हाल के महीनों में खाद्य पर्दार्थों की महंगाई ने मेहनतकश परिवारों की वस्तुओं को खरीदने की क्षमता को और भी कम कर दिया है।

किसान जो आबादी के लिए खाद्य पर्दार्थों का उत्पादन करते हैं उन्हें पूंजीवाद और बड़े पूंजीपतियों के तथाकथित सुधार कार्यक्रम ने बर्बाद कर दिया है। उनकी कुल आमदनी कम हो गई है। कृषि व्यापार के भूमंडलीकरण और कृषि वस्तुओं की आपूर्ति तथा उत्पादों की खरीदी में निजी इजारेदार कंपनियों की बढ़ती भूमिका के कारण किसानों को बहुत असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है। हिन्दोस्तानी और विदेशी निजी व्यापार कंपनियों के फ़ायदे के लिए राज्य ने खाद्यान्नों की ख़रीदी में अपना हिस्सा घटा दिया है।

बाज़ार में कृषि उत्पादों का खरीदी मूल्य, उत्पादन खर्च से भी नीचे गिर जाने के कारण करोड़ों किसान बर्बाद हो गये हैं या असहनीय कर्ज़ में डूब में गये हैं। जो किसान बैंकों के कर्ज़ों को वापस नहीं कर पाते हैं उन्हें अपनी ज़मीन खोने का ख़तरा बना रहता है।

हिन्दोस्तानी पूंजीवाद कृषि समस्या को हल करने और समाज को ग़रीबी और संकट से बाहर निकालने में असफल हो गया है। शासक वर्ग अर्थव्यवस्था को बहुत गहरे अति-उत्पादन के संकट में गिरने से नहीं रोक पा रहा है। इसके अलावा कि, वह उत्पादक शक्तियों को तब तक नष्ट होने दे जब तक कि हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के लिए देश में पुनः उत्पादन के लिये निवेश करना लाभदायक न हो जाए, शासक वर्ग के पास इस संकट का कोई हल नहीं है।

हिन्दोस्तानी इजारेदार घराने चीन के साथ होड़ में, और अमरीका के साथ रणनैतिक गठबंधन की मदद से, विदेशों में अपने बाज़ार और प्रभुत्व का दायरा फैलाने के लिए उतावले हैं। वे बेतहाशा ऐसे क्षेत्रों को खोज रहे हैं जहां पूंजी निवेश कर सकें और अधिकतम मुनाफे़ कमाने के प्रति आश्वस्त हों। एक क्षेत्र जिसमें वे पूंजी निवेश करने के लिये उत्सुक हैं, वह है हथियार और गोलाबारूद का उत्पादन।

इजारेदार पूंजीपतियों को इस बात की कोई परवाह नहीं होती है कि हथियार उत्पादन भौतिक दौलत में कोई वृद्धि नहीं करता है और न ही बहुसंख्य लोगों की खुशहाली को बढ़ाता है। उनको इसकी कोई चिंता नहीं है कि फौजीकरण परोपजीविता के स्तर को और बढ़ाएगा। टाटा, अम्बानी, बिरला और अन्य इजारेदार घरानों को केवल यह परवाह है कि फौजीकरण के द्वारा जल्द से जल्द औद्योगिक मांग को बढ़ाना सम्भव होगा। यह जनता पर बोझ बढ़ाकर पूंजीवादी लाभ को बढ़ा सकता है। अधिकतम मुनाफ़ों की लालच से प्रेरित हिन्दोस्तानी पूंजीवादी इजारेदार घराने अमरीका और अन्य देशों के हथियारों से जुड़े इजारेदारों के साथ सहयोग कर रहे हैं। वे हिन्दोस्तानी फौजी-औद्योगिक संकुल विकसित करना चाहते हैं।

हिन्दोस्तानी सेना का आधुनिक हथियारों के साथ-साथ संगठनात्मक बदलाव करके आधुनिकीकरण किया जा रहा है। सेना के तीन अंगों को एक एकीकृत कमांड के अंतर्गत लाया गया है। युद्ध के तीन मुख्य मोर्चों पर लड़ने के लिए एकीकृत सेना का पुनर्गठन किया जा रहा है – (क) पाकिस्तान (ख) चीन तथा (ग) हिन्द-प्रशान्त महासागर। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र अफ्रीका के पूर्वी तट से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होते हुए ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट और दक्षिण चीनी सागर तक फैला हुआ है।

हिन्दोस्तान में तीव्र होते अंतर्विरोध

हिन्दोस्तानी समाज में शोषक और शोषित वर्गों के बीच और शोषकों के आपसी अंतर्विरोध बहुत तीव्र हो गए हैं।

पिछले दशक में पूंजीवादी आर्थिक हमलों के खि़लाफ़ मज़दूरों और किसानों का विरोध बढ़ता गया है।

मज़दूर वर्ग का एकजुट संघर्ष 2003 में चरम सीमा पर पहुंच गया था। जब भाकपा और माकपा ने “राष्ट्रीय सलाहकार कमेटी” में 2004-08 के दौरान कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ बैठकर, पूंजीवादी सुधार कार्यक्रम को तथाकथित रूप से “मानवीय चेहरा” देने में मदद की, उस समय संघर्ष को चोट पहुंची थी और वह धीमा हो गया था। उसके बाद मज़दूर वर्ग के ज्यादा से ज्यादा हिस्सों को समझ में आ गया कि उदारीकरण और निजीकरण के द्वारा भूमंडलीकरण का कार्यक्रम भूमि और श्रम का अधिकतम इजारेदारी पूंजीवादी शोषण और लूट का कार्यक्रम है। वे समझ गए हैं कि इस अमानवीय कार्यक्रम को मानवीय चेहरा देना संभव नहीं है।

भारतीय रेल, हवाई सेवा, टेलीकॉम, ऊर्जा, बैंकों, बीमा और अन्य बड़े उद्योगों तथा सेवाओं के मज़दूरों सहित मज़दूर वर्ग के अनेक बड़े दस्ते हाल के वर्षों में निजीकरण के खि़लाफ़ निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। रेल यात्री एसोसियेशन जैसे उपभोक्ता संगठन निजीकरण के खि़लाफ़ लड़ाई में मज़दूरों के साथ जुड़ गए हैं।

सरकारी विश्वविद्यालयों के शिक्षक और विद्यार्थी उच्च शिक्षा के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं। वे फीस बढ़ाने का विरोध कर रहे हैं। उच्च शिक्षा में विदेशी पूंजी के प्रवेश करने और हावी होने देने की नीति का विरोध कर रहे हैं। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर, नर्स और अन्य मज़दूर चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं।

मोटर वाहन क्षेत्र, मोबाइल और संचार क्षेत्र, रसायन और इंजीनियरिंग क्षेत्र के मज़दूर ठेके पर मज़दूरों को रखने की बढ़ती प्रथा के खि़लाफ़ लड़ रहे हैं। आईटी और मोटर वाहन क्षेत्रों सहित जिन क्षेत्रों में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई, उनके मज़दूर अपनी पसंद की यूनियन बनाने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आंगनवाड़ी मज़दूर और अन्य स्कीम वर्कर्स अपने को मज़दूर बतौर मान्यता दिये जाने के लिए लड़ रहे हैं।

200 से अधिक किसान संगठन एक झंडे तले संगठित होकर सार्वजानिक खरीदी नीति को लागू करने और बैंकों द्वारा दिए गए कृषि कर्ज़ों को माफ़ करने की मांग कर रहे हैं। 8 जनवरी, 2020 को आम हड़ताल का संयुक्त रूप से आह्वान करने वाली केन्द्रीय फेडरेशनों ने किसानों की इन मांगों को अपने मांगपत्र में शामिल किया था।

मज़दूरों और किसानों के अलावा अपने देश में कुछ विशेष क्षेत्रीय पूंजीपति हैं, जिनके हितों की बड़े इजारेदार घरानों के अजेंडे के साथ टक्कर है। वे करों और वित्तिय शक्तियों को केन्द्रीकृत किये जाने वाले क़दमों का विरोध कर रहे हैं, जैसे जी.एस.टी.।

पूंजीपतियों के बीच अंतर्विरोधों का तीव्र होना संसद, अफ़सरशाही, न्यायपालिका और इजारेदारों द्वारा नियंत्रित मीडिया जैसे पूंजीवादी शासन की विभिन्न संस्थाओं के बीच आपसी लड़ाई में देखा जा सकता है। ये संस्थायें कार्यकारिणी के आदेशों पर चलती नज़र आ रही हैं जिससे इनकी तथाकथित “स्वतंत्रता” का भ्रम चकनाचूर हो रहा।

हाल में इजारेदारी पूंजीवादी लाभ में गिरावट के कारण इजारेदार घरानों के बीच घमासान लड़ाई देखने को आई है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार, जुलाई-सितम्बर 2019 के दौरान 2700 गैर-वित्तीय पूंजीवादी कंपनियों का समस्त मुनाफ़ा पिछले वर्ष की उसी तिमाही की तुलना में आधे से भी कम था। अनिल अम्बानी और जेपी समूह सहित अनेक इजारेदार घराने समाप्त होने की कगार पर हैं। रुईआ जैसे कुछ समूह बहुत कमज़ोर हो गए हैं।

ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां न्यायव्यवस्था का इस्तेमाल पूंजीपति वर्ग के भीतर आपसी दुश्मनियों को निपटाने और लोगों के अधिकारों पर खुल्लम-खुल्ला हमलों को जायज़ ठहराने के लिए किया गया है। जो न्यायाधीश सत्ताधारी पार्टी की इच्छा अनुसार उसका समर्थन नहीं करता है, उसकी फौरन बदली कर दी जाती है।

आई.बी., सी.बी.आई., प्रवर्तन निदेशालय (ई.डी.) और राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (एन.आई.ए.) जैसे केंद्रीय संस्थाओं का इस्तेमाल पूंजीपतियों के विरोधी गुटों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

निष्कर्ष

आज जो उथल-पुथल और राजनीतिक झगड़े देश में और विश्व भर में देखने को मिल रहे हैं उनका आधार पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में निहित है।

पूंजीवाद के गहरे होते संकट का मूल कारण वस्तुओं के सामाजिक उत्पादन और निजी लूट के बीच अंतर्विरोध में निहित है। इस अंतर्विरोध का हल ही सदैव के लिए संकट का अंत करेगा और निरंतर सामाजिक उन्नति के लिए मार्ग खोलेगा। इस अंतर्विरोध को हल करने के लिए मुख्य उत्पादन के साधनों को निजी संपत्ति से सामाजिक संपत्ति में परिवर्तित करना होगा।

हिन्दोस्तान में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अति-उत्पादन के संकट में फंसी हुई है, विश्व भर में आयात और निर्यात में गिरावट के कारण यह संकट और भी गंभीर हो गया है। आर्थिक संकट सभी वर्गों को प्रभावित कर रहा है। वह शोषकों और शोषितों के बीच और शोषकों के बीच आपसी अंतर्विरोधों को तीव्र कर रहा है। मज़दूरों और किसानों के बढ़ते शोषण के खि़लाफ़ बढ़ते विरोध संघर्ष के अलावा प्रादेशिक पूंजीपति के हित हैं, जो सभी क्षेत्रों को विदेशी और हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजी के लिए खोले जाने का विरोध कर रहे हैं। प्रतिस्पर्धी इजारेदार घरानों के बीच गलाकाट स्पर्धा बहुत तीखी हो गई है जिस कारण कुछ इजारेदार घरानों को व्यापार बंद करना पड़ा है।

शासक वर्ग श्रम के शोषण और लघु-स्तर के उत्पादकों की लूट को और तीव्र करने के लिए उदारीकरण तथा निजीकरण के कार्यक्रम को लगातार चला रहा है। वह अर्थव्यवस्था का फ़ौजीकरण कर रहा है और हिन्द-अमरीकी सैनिक तथा रणनैतिक गठबंधन को मजबूत कर रहा है। अर्थव्यवस्था की समस्याओं को हल करना तो दूर रहा, यह दिशा भविष्य में और भी गहरे संकट के साथ-साथ हिन्दोस्तान को एशिया में अन्यायी साम्राज्यवादी युद्ध में घसीटे जाने के ख़तरे को बढ़ाता है।

अपने देश में बार-बार हो रहे संकट को समाप्त करने का एक ही तरीक़ा है। इजारेदार पूंजीपतियों से वह “अधिकार” छीनना होगा जो उन्हें मज़दूरों और किसानों द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का अपनी मनमर्ज़ी से उपयोग करने देता है। निर्णय लेने की शक्ति मज़दूरों और किसानों के हाथों में लानी होगी। उत्पादन और विनिमय के मुख्य साधन, जो आज इजारेदार घरानों की निजी मालिकी में हैं उन्हें सामाजिक मलिकी और नियंत्रण में लाना होगा। तभी अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी लालच को पूरा करने के बजाय लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने दिशा में मोड़ा जा सकता है।

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