निवारक निरोध – हिन्दोस्तानी संविधान के लोकतंत्र-विरोधी चरित्र की एक विशेषता 

आधुनिक लोकतंत्र का एक असूल यह है कि राज्य किसी भी नागरिक को बिना कारण गिरफ़्तार नहीं कर सकता है। हिन्दोस्तानी राज्य इस असूल का सरासर हनन करता है। हिन्दोस्तानी संविधान विधायिकी को निवारक निरोध के कानून लागू करने की पूरी इज़ाज़त देता है। सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.), राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) और अवैध गतिविधि निरोधक अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) कुछ ऐसे केन्द्रीय कानूनों के उदाहरण हैं, जो सरकारी सुरक्षा बलों को मनमानी से लोगों को गिरफ़्तार करने और बंद करने की पूरी छूट देते हैं। राज्यों के स्तर पर भी तमाम ऐसे कानून हैं, जैसे कि जन सुरक्षा कानून और संगठित अपराधों को निशाना बनाने का दावा करने वाले कानून। इन सभी कानूनों को निवारक निरोध के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हिन्दोस्तानी राज्य आतंकवाद, बग़ावत, संगठित अपराध, आदि के ख़तरों से देश को बचाने के लिए, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, निवारक निरोध के कानूनों को जायज़ ठहराता है। इन कानूनों के तहत सुरक्षा बलों को नागरिकों को गिरफ़्तार करने और अनिश्चित काल तक कारावास में बंद रखने की खुली छूट दी जाती है। हुक्मरान वर्ग निवारक निरोध के कानूनों के ज़रिये, लोगों के इरादों, आस्थाओं और विचारों को अपराधी करार कर देता है। निवारक निरोध के ये कानून मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों के मानव अधिकारों, जनवादी अधिकारों और राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्षों को कुचलने के लिए, हुक्मरान वर्ग के हथकंडे हैं।

निवारक निरोध की अवधारणा आधुनिक लोकतंत्र के प्रतिकूल है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करके महीनों या सालों तक बंद नहीं रखा जा सकता है, सिर्फ सुरक्षा बलों के इस शक के आधार पर कि वह आगे कभी अपराध कर सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नागरिकों को किसी अपराध के सबूत के बिना गिरफ़्तार किया जा सकता है। खुद को निर्दोष साबित करने का बोझ मुलजिम पर होता है। यह इस असूल का पूर्ण हनन है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक तहकीकात और सबूत के आधार पर उसे अपराधी नहीं साबित किया जाता है। हिन्दोस्तान का संविधान लोकतांत्रिक होने का दिखावा करता है परन्तु नागरिकों के अधिकारों के इस प्रकार के घोर हनन की इज़ाज़त देता है।

हमारे देश के लोकतंत्र-विरोधी कानून संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 के अनुकूल हैं, जो मौलिक अधिकारों के खंड का हिस्सा है।

अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि:

“किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।”

“विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया”: इस वाक्यांश का सत्तासीन सरकार पूरी मनमानी के साथ इस्तेमाल करती है। सरकार की नीतियों और कारनामों का विरोध करने की जुर्रत करने वाले नागरिकों और राजनीतिक दलों के खि़लाफ़, निवारक निरोध, पुलिस अत्याचार, अदालत में लम्बे अरसे तक चलने वाली सुनवाई, जेलों में उत्पीड़न, इन सब को जायज़ ठहराने के लिए बार-बार इस वाक्यांश को औचित्य के रूप में पेश किया जाता है।

अनुच्छेद 22 “कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण” के बारे में है। इसके खंड (1) में कहा गया है कि “किसी व्यक्ति को जो गिरफ़्तार किया गया है, ऐसी गिरफ़्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा …”। खंड (2) में कहा गया है कि गिरफ़्तार व्यक्ति को “चौबीस घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया” जाना चाहिए। परन्तु खंड (3) में इन्हें नकारा जाता है। खंड (3) में कहा गया है कि “खंड (1) और खंड (2) की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होगी जो –

(क) तत्समय शत्रु अन्यदेशीय है या

(ख) निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन गिरफ़्तार या निरुद्ध किया गया है।”

इसका यह मतलब है कि अगर किसी व्यक्ति को ए.एफ.एस.पी.ए., रासुका या यू.ए.पी.ए. जैसे संसद में पास किये गए किसी कानून के तहत गिरफ़्तार किया जाता है, तो संविधान उसे ‘मनमानी से की गयी गिरफ़्तारी से सुरक्षा’ के अधिकार से वंचित करता है।

खंड (4) में कहा गया है कि “निवारक निरोध का उपबंध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का तीन मास से अधिक अवधि के लिए … निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी”। परन्तु उसी खंड में आगे कहा गया है कि ऐसा सिर्फ तब तक है, जब तक कि “सलाहकार बोर्ड ने तीन मास की उक्त अवधि की समाप्ति से पहले यह प्रतिवेदन नहीं दिया है कि उसकी राय में ऐसे निरोध के लिए पर्याप्त कारण हैं”!

अनुच्छेद 22 का खंड (5) कहता है कि “निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में जब किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जाता है तब आदेश करने वाला प्राधिकारी यथाशक्य शीघ्र उस व्यक्ति को यह संसूचित करेगा कि वह आदेश किन आधारों पर किया गया है और उस आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने के लिए उसे शीघ्रातिशीघ्र अवसर देगा”। परन्तु खंड (6) में लिखा गया है कि “प्राधिकारी के लिए ऐसे तनयों (यानि गिरफ्तारी के आधारों) को प्रकट करना आवश्यक नहीं होगा जिन्हें प्रकट करना ऐसा प्राधिकारी ‘लोकहित के विरुद्ध’ समझता है”!

अंत में, अनुच्छेद 22 का खंड (7) बाकी सभी खंडों को रद्द कर देता है। खंड (7) में कहा गया है कि संसद विधि द्वारा विहित कर सकेगी कि “किन परिस्थितियों के अधीन … किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन तीन मास से अधिक अवधि के लिए … सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किए बिना निरुद्ध किया जा सकेगा”।

यह स्पष्ट है कि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 मनमानी से किये गए निवारक निरोध से बचाव के अधिकार की कोई गारंटी नहीं देते हैं। (देखिये: मनमानी से की गई गिरफ़्तारी और निरोध से बचाव का अधिकार)।

सारांश में, राज्य का जिसे भी चाहे गिरफ़्तार करने और कैद रखने का अधिकार इस विधि व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था की अनेक लोकतंत्र-विरोधी विशेषताओं में से एक है, जो बरतानवी उपनिवेशवादी काल की एक विरासत है। निवारक निरोध लोगों के संघर्षों को कुचलने के लिए, हुक्मरान पूंजीपति वर्ग का एक हथकंडा है।

हिन्दोस्तान का संविधान मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों का पालन करने का दिखावा करता है। परन्तु हिन्दोस्तान का संविधान मनमानी से गिरफ़्तार और बंद होने से बचने के नागरिकों के अधिकार को सुनिश्चित नहीं करता है। बल्कि, संविधान सत्ता पर बैठी ताक़तों को मनमर्जी से किसी को भी गिरफ़्तार करने का आधिकारिक, विधिगत आधार प्रदान करता है।

मनमानी से की गई गिरफ़्तारी और निरोध से बचाव का अधिकार

दूसरे विश्व युद्ध के बाद और फासीवाद की पराजय के पश्चात, दुनिया भर के राष्ट्रों ने इस विषय पर चर्चा की कि मनमानी से की गई गिरफ़्तारी और निरोध से बचने के नागरिकों के अधिकार को कैसे मानव अधिकारों के असूलों के अंतर्गत शामिल किया जाये। मानव अधिकारों का घोषणापत्र और नागरिक व राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र, दोनों ही इस अधिकार को मान्यता देते हैं।

इस अधिकार पर वाद-विवाद करते समय, यह स्वीकार किया गया था कि “मनमानी” शब्द का मतलब है न सिर्फ ‘गैर-कानूनी’ बल्कि ‘स्वाभाविक न्याय व मानव सम्मान के असूलों के प्रतिकूल’ भी।

“मनमानी” शब्द का विषय वस्तु इस प्रकार से समझाया गया:

“कोई भी ऐसा काम जो न्याय, तर्क या विधि का हनन करता हो या किसी की मर्जी या बुद्धिमानी के अनुसार किया गया हो या मनमौजी से, निरंकुश तरीके से, राज्य के हुक्म से, दमनकारी ढंग से या अनियंत्रित तरीके से किया गया हो”।

अतः, “मनमानी” शब्द का पर्याय “गैर-कानूनी” नहीं है। गैर-कानूनी गिरफ़्तारी और निरोध लगभग हमेशा ही मनमानी से किया जाता है, परन्तु कानून के अनुसार की गयी गिरफ़्तारी या निरोध भी मनमानी से किया जा सकता है।

 

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