कोविड-19 का संकट :

स्वास्थ्य कर्मियों की खुद की जान जोखिम में

देशभर में डॉक्टर, पैरामेडिकल, नर्स, तकनीशियन, आशा कार्यकर्ता, एम्बुलेंस चालक और सहायक, तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मी दिन-रात ऐसे लोगों की जांच और इलाज कर रहे हैं, जिन्हें कोविड वायरस से संक्रमित होने का संदेह है। ये सभी स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान को जोखिम में डालकर पर्याप्त व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट – पी.पी.ई.)  के अभाव के बाजवूद, संभावित संक्रमित लोगों के लिए सेवाओं का प्रबंध कर रहे हैं।

व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पी.पी.ई.) में मास्क, चश्मा, जूते के कवर, गाउन और दस्ताने शामिल होते हैं। लेकिन समाचार सूत्रों के अनुसार, इन सभी ज़रूरी सुरक्षा उपकरणों के अभाव में वे रेनकोट, मोटरसाइकिल हेलमेट, जल मिश्रित सैनीटाईजर और कपड़ों के मास्क का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। यहां तक कि मुंबई जैसे बड़े शहर में, रेजिडेंट डॉक्टर बता रहे हैं कि उनके पास एन-95 मास्क उपलब्ध नहीं हैं। उसके बदले में उन्हें दो-परतों वाले पतले मास्क का तीन-चार दिनों तक पुनः इस्तेमाल करना पड़ रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में एम्स में कोविड मरीजों की जांच और देखभाल करने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैण्ड सैनीटाईजर और प्लास्टिक के फेस-शील्ड का पी.पी.ई. की तरह उपयोग कर रहे हैं, जिसे उन्होंने खुद ही बनाया है।

दरअसल सामान्य परिस्थितियों में भी डॉक्टर और उनके सहायकों को मरीजों की जांच करते समय मास्क या चश्मे या फेस शील्ड, दस्ताने और कवरआल का उपयोग करना अनिवार्य है, ताकि मरीजों के लिए कीटाणुरहित वातावरण बनाये रखा जा सके और आई.सी.यू. और ऑपरेशन थिएटर के बाहर बैठे लोगों की और खुद अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। एक बेहद संक्रामक वायरस से सुरक्षा के लिए इस तरह की सुरक्षा निहायती ज़रूरी है।

लेकिन मौजूदा महामारी के संदर्भ में, सभी सरकारी अस्पताल इन पी.पी.ई. के अभाव का सामना कर रहे हैं और इसलिए डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी अपनी सुरक्षा का ख्याल किये बिना ही मरीजों का इलाज और देखभाल करने के लिए मजबूर हैं। खबरों के अनुसार, बिहार में 83 जूनियर डॉक्टर कोविड-19 के लक्षण होने के बावजूद मरीजों का इलाज कर रहे हैं। राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और केरल सहित कुछ अन्य राज्यों से आ रही ख़बरों के अनुसार कई डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की जांच से पता चलता है कि वे भी कोविड-19 से संक्रमित हो गये हैं, या वे कोविड-19 संक्रमित मरीजों के संपर्क में आये हैं।

पी.पी.ई. के अभाव के अलावा, देशभर में स्वास्थ्यकर्मियों को बिना किसी आराम के लगातार लंबे समय के लिए काम करना पड़ रहा है। वैसे तो हमारे देश में जब महामारी नहीं होती है, उस समय भी स्वास्थ्यकर्मियों को कई बार लगातार 36 घंटे और सप्ताह में 80 घंटे तक काम करना पड़ता है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में हिन्दोस्तान में डॉक्टर और जनसंख्या का अनुपात सबसे निम्न स्तर पर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के अनुसार प्रत्येक 1000 आबादी के लिए एक डॉक्टर होना चाहिए। एक अनुमान के मुताबिक, हमारे देश में 6 लाख डॉक्टरों, दसियों लाखों विशेषज्ञों और 20 लाख नर्सों के अलावा, बहुत बड़ी तादाद में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा कर्मियों की भारी कमी है।

आज जब पूरे देश में लॉक-डाउन लागू किया गया है, ऐसे समय में स्वास्थ्यकर्मियों को अपने घरों से कार्य-स्थलों तक आने-जाने में कई दिक्कतों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। ख़बरों के अनुसार कई स्वास्थयकर्मियों को “कफ्र्यू तोड़ने” के नाम पुलिस द्वारा पर बुरी तरह से पीटा गया है, जबकि उनके पास अपने कार्यस्थल का पहचान पत्र मौजूद था। इसके अलावा, पड़ोस में रहने वाले लोगों को इन स्वास्थ्यकर्मियों से संक्रमित होने का डर है और इसकी वजह से उन्हें घरों से निकाला जा रहा है। कुछ स्वास्थ्यकर्मियों को कई महीनों से वेतन नहीं दिया गया है।

देशभर के स्वास्थ्यकर्मी मांग कर रहे हैं कि उन्हें पर्याप्त मात्र में पी.पी.ई. दिए जायें और साथ ही उनके रहने और काम करने की हालातों को सुरक्षित बनाया जाये। वे मांग कर रहे हैं कि उनके बकाया वेतन का तुरंत भुगतान किया जाये। उत्तर प्रदेश में झांसी मेडिकल कॉलेज के नर्सिंग स्टाफ ने एक दिन के लिए काम का बहिष्कार किया और मांग की कि उनके सात महीने के बकाया वेतन का भुगतान किया जाये। लेकिन कोविड-19 के मरीजों की मांग के मद्देनज़र उन्होंने अगले दिन से काम शुरू कर दिया। मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में डॉक्टरों को न तो पी.पी.ई. किट दिए गए और न ही हैण्ड सैनीटाईजर। जब तक ये वस्तुएं बाज़ार में उपलब्ध थीं, स्वास्थ्यकर्मी अपने खर्चे से इनको खरीदकर इस्तेमाल कर रहे थे। 31 मार्च को उत्तर प्रदेश में सरकारी अस्पतालों के 4,700 ड्राइवरों ने हड़ताल कर दी और सुरक्षा उपकरण और स्वास्थ्य बीमा की मांग की। हरियाणा के रोहतक जिले में एक राज्य-संचालित अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों ने सुरक्षा उपकरणों के बगैर मरीजों का इलाज करने से इंकार कर दिया।

कोविड-19 वायरस के खि़लाफ़ जंग में अग्रिम पंक्ति में काम कर रहे सभी स्वास्थ्य कर्मियों और सहायकों के लिए पी.पी.ई. का तुरंत इंतजाम किया जाना बेहद ज़रूरी है। स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देनी होगी, जिसका मतबल है स्वास्थ्यकर्मियों के लिए ऐसे इंतजाम किया जायें जिससे वे एक सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जी सकें।

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