लोगों के अधिकार और राज्य के फर्ज़

कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार द्वारा घोषित 21 दिन के लॉक डाउन के लगभग दस दिन पूरे हो चुके हैं। लॉक डाउन के पहले हफ्ते के अनुभव से कई समस्याएं सामने आयी हैं जिन्हें फौरी तौर पर हल करना होगा। यह एक सांझा संघर्ष है जिसमें सभी लोगों की भागीदारी की ज़रूरत है। इसमें सरकार के असरदार नेतृत्व की ज़रूरत है।

काम करने वाले लोग अपना काम तभी कर सकते हैं जब उन्हें अपने अधिकार मिलते हैं। कोरोना वायरस के खि़लाफ़ संघर्ष के दौरान, मज़दूरों के अधिकारों की हिफ़ाज़त करना राज्य का फर्ज़ है।

डॉक्टर, नर्स, दाई, आंगनवाड़ी कर्मी, आशा कर्मी तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मी अपनी जानों को जोखिम में डालकर, बड़ी बहादुरी के साथ समाज की सेवा कर रहे हैं। उनके प्रयासों पर तालियां बजाना काफी नहीं है। उनके अधिकारों को पूरा करने को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह बड़ी शर्म की बात है कि आज तक, डॉक्टरों, नर्सों और अस्पतालों व स्वास्थ्य केन्द्रों के अन्य सहायक स्वास्थ्य कर्मियों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की सिफारिशों के अनुसार, यूनिफार्म, ग्लव्स, मास्क और दूसरी सुरक्षा सामग्रियां व सुविधाएं मुहैया नहीं कराई गयी हैं। स्वास्थ्य कर्मी, जो इस समय समाज की सेवा करने में सबसे आगे हैं, उन्हें अच्छी से अच्छी सुरक्षा सामग्रियां मुहैया कराना राज्य का फर्ज़ बनता है।

स्वास्थ्य कर्मियों के अलावा, करोड़ों अन्य लोग भी इस लॉक डाउन के दौरान कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इनमें शामिल हैं दवाई की दुकानों में काम करने वाले, दूध, अंडे, ब्रेड, ताजी सब्जियां और दूसरे खाद्य पदार्थों को जुटाने व सप्लाई करने वाले लोग। इनमें सार्वजनिक स्थानों की सफाई करने वाले सफाई कर्मी भी हैं। पुलिस और निजी व सरकारी सुरक्षा कर्मी दिन-रात सड़कों पर व्यस्त हैं। रेल कर्मचारी, बिजली उत्पादन और वितरण के कर्मचारी, मीडिया, बैंक व टेलिकॉम कर्मी, पानी और अन्य आवश्यक सेवाओं के कर्मचारी, सभी इस संकट की घड़ी में, समाज को चलाते रहने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

लॉक डाउन के शुरू होने के जल्द बाद ही, दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों ने धमकी दी कि अगर उन्हें फौरन मास्क व दूसरी सुरक्षा सामग्रियां नहीं मुहैया कराई गईं तो वे हड़ताल करेंगे।

जबकि कुछ मज़दूर अपनी सेहत को ख़तरे में डालकर, समाज को चलाने की कोशिश कर रहे हैं, तो करोड़ों और मज़दूरों, खास तौर पर उद्योग और व्यापार के दिहाड़ी के मज़दूरों, की हालतें बहुत गंभीर हैं। करोड़ों दिहाड़ी मज़दूर अपना रोज़गार खो बैठे हैं। उनके पास कोई पैसे नहीं बचे हैं, इसलिए वे अपने परिजनों के साथ, अपने गांव के लिए पैदल ही निकल पड़े हैं। उनमें से कुछ तो रास्ते में ही, भुखमरी और थकावट के कारण, दम तोड़ चुके हैं। दसों-हजारों ऐसे मज़दूर अब जगह-जगह पर, अपने ही मुल्क के अन्दर शरणार्थी बनकर फंसे हुए हैं।

शहरों के दिहाड़ी मज़दूर, इतनी बड़ी संख्या में, अपने गांवों की ओर क्यों चल पड़े थे? इसलिए कि उन्हें मालूम नहीं था कि बिना रोजगार के, अगले 21 दिन कैसे गुजारेंगे। राज्य ने उनकी देखभाल करने के लिए पहले से कोई योजना नहीं बनाई थी। शहर में, बिना काम के, कैसे जीयेंगे, इसके बारे में उन्हें किसी ने कुछ नहीं बताया था।

केंद्र और राज्य सरकारों को लॉक डाउन के दौरान सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। रोज़गार और आमदनी खत्म हो जाने पर मज़दूरों को सुरक्षा दिलाने की ज़िम्मदारी सरकार को उठानी होगी। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पूंजीपति मालिक मज़दूरों को पूरे वेतन दें, वरना सरकारी धनकोष से मज़दूरों के वेतन देने होंगे। मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा करने और ज़रूरतों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए सरकार को यह सब कुछ करना होगा।

वर्तमान हालत में, कोरोना वायरस के खि़लाफ़ संघर्ष में सभी लोगों को लामबंध करने के लिए, केन्द्रीय तौर पर उच्चतम योजना और संचार की आवश्यकता है। राज्य को यह दायित्व अपने हाथों में लेना होगा और सभी निजी व सार्वजनिक संसाधनों व सुविधाओं को समाज कल्याण के काम के लिए लामबंध करना होगा।

निजीकरण और उदारीकरण के हिमायती कहते हैं कि हर इंसान को अपने हाल पर छोड़ देना चाहिए। राज्य को इस अवधारणा को खारिज करना होगा। सभी देशों का अनुभव यही दिखाता है कि अगर सब कुछ “बाज़ार की ताक़तों” के हाथों में छोड़ दिया जाता है और राज्य की भूमिका को सिर्फ पूंजीपतियों के लिए “धंधे चलाना आसान बनाने” तक सीमित किया जाता है, तो सबकी खुशहाली और रोज़गार की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। पूंजीपतियों की आपसी स्पर्धा से, तथाकथित “बाज़ार के गुप्त हाथ” से, और हरेक इंसान को अपने हाल पर छोड़ देने से कहीं भी पूरे समाज की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती है।

वर्तमान संकट में यह स्पष्ट हो रहा है कि अर्थव्यवस्था को चलाने में सामाजिक योजना की निर्णायक भूमिका है, न कि पूंजीवादी स्पर्धा और निजी मुनाफ़ों को अधिकतम बनाने की। अगर दैनिक ज़रूरत की चीजों को उपलब्ध कराना है तो यह ज़रूरी है कि निजी व्यापारियों को जमाखोरी करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े बनाने से रोका जाये। तथाकथित “मुक्त बाज़ार” को खुली छूट देने के बजाय, राज्य को सभी दैनिक ज़रूरत की चीजों को मुहैया कराने का दायित्व लेना होगा। राज्य को निजी व्यापारियों के लिए सख्त कानून बनाने होंगे और इस सामाजिक योजना का उल्लंघन करने वालों के खि़लाफ़ कड़ी कार्यवाही करनी होगी।

न सिर्फ कोरोना वायरस की तत्कालीन समस्या को हल करने के लिए, बल्कि हिन्दोस्तानी समाज की सारी समस्याओं को हल करने के लिए, जनता की भागीदारी के साथ, केन्द्रीय तौर पर योजना बनाना और उसे सुनियोजित तरीके से लागू करना ही आगे बढ़ने का सही रास्ता है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी लोगों से आह्वान करती है कि सारे निर्धारित सुरक्षा क़दमों का सख्ती से पालन करें और राज्य से मांग करें कि वह अपनी ज़िम्मेदारी निभाए। अधिकारियों को लोगों को पूरी सूचना देनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी को अपने हाल पर न छोड़ दिया जाये। आवश्यक सामग्रियों और सेवाओं की सप्लाई सुनिश्चित करने से लेकर, सभी विस्थापित, बेघर और ग़रीब लोगों के लिए आवास और भोजन सुनिश्चित करना, समाज के सभी सदस्यों के मानव अधिकारों की हिफाज़त करना, यह राज्य का फर्ज़ बनता है।

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