लॉकडाउन के दौरान एल.पी.जी. भरने के कारखाने में मज़दूरों की परिस्थिति

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) ने कोरोना वायरस के संकट और लॉकडाउन के दौरान इंडियन ऑयल कार्पोरेशन (आई.ओ.सी.) के एल.पी.जी. भरने के कारखाने में मज़दूरों की परिस्थिति के बारे में इंडियन ऑयल एम्प्लाइज़ यूनियन की नेता, कामरेड प्रीति से साक्षात्कार किया, जिसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

म.ए.ल. : दुनियाभर में विभिन्न देश व लोग कोविड-19 वायरस संक्रमण से उत्पन्न भयंकर परिस्थिति से जूझ रहे हैं। हमारे देश में लॉकडाउन किया गया है जिसकी वजह से हिन्दोस्तानी मज़दूरों व लोगों को अकथित तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। इस संदर्भ में हम आई.ओ.सी. के मज़दूरों की परिस्थिति के बारे में जानना चाहते हैं।

का. प्रीति : आवश्यक सेवाओं के क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों पर कोविड-19 के संकट का सीधा असर पड़ा है। कोविड-19 के खिलाफ इस जंग में डॉक्टर, नर्सें, पराचिकित्सक, एंबूलेंस कर्मी जैसे स्वास्थ्य सेवा कर्मी तथा सफाई मज़दूर, राशन दुकानों के कर्मी व मालिक, पुलिस, इत्यादि जैसी आवश्यक सेवाओं में काम करने वाले अन्य लोग अग्रिम पंक्ति में हैं। इन मज़दूरों के अलावा, बैंक, पेट्रोलियम, पावर क्षेत्र के मज़दूर, इत्यादि भी वर्तमान परिस्थिति में जरूरी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। शायद लोग यह नहीं समझते हैं कि इन्हें भी मोर्चे पर काम करने वाले मज़दूरों की तरह जोखिमों का सामना करना पड़ता है।

म.ए.ल. : क्या आप एल.पी.जी. भरने के कारखाने में काम करने वाले आई.ओ.सी. के मज़दूरों की परिस्थितियों व जोखिमों के बारे में और विस्तार में बता सकते हैं?

का. प्रीति : आई.ओ.सी. की प्रमुख रिफाइनरी तमिलनाडु में चेन्नई पेट्रोलियम है। यहां पर करीब 5,000 मज़दूर काम करते हैं।

आई.ओ.सी. की प्रमुख सेवा यातायात के लिये पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल व डीज़ल उपलब्ध कराना है। चूंकि पूरी की पूरी परिवहन सेवाएं ठप्प हैं, इस क्षेत्र के लिये आपूर्ति की ज़रूरत अभी नहीं है। दूसरी सेवा पूरे तामिलनाडु के हर घर में रसोई गैस उपलब्ध कराने की है। तामिलनाडु में आई.ओ.सी. के करीब 10 एल.पी.जी. भरने के कारखाने हैं जिनमें करीब 3,000 मज़दूर काम करते हैं। इनमें से 70 प्रतिशत ठेका मज़दूर हैं। सब मज़दूर मिलाकर एक दिन में 2,90,000 सिलिंडर भरते हैं और उनका वितरण करते हैं। पूरे देश में प्रति दिन करीब 60 लाख सिलिंडर भरे जाते हैं।

हमारे कारखानों में मज़दूर एल.पी.जी. (लिक्वीफाइड पेट्रोलियम गैस) को सिलिंडरों में भरते हैं। हाल ही में सरकार ने घोषणा की है कि तीन महीनों के लिये उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस मुफ्त में दी जायेगी। अलग-अलग तरह से लॉकडाउन के बाद देश में गैस सिलिंडरों की खपत और बढ़ गयी है। इस मांग को पूरा करने के लिये अब हमारे मज़दूर सामान्य से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं।

हर एक कारखाने में हजारों की संख्या में खाली सिलिंडर आते हैं जिन्हें हमारे मज़दूर एल.पी.जी. से भरते हैं और फिर ये वितरण के लिये जाते हैं। ये सिलिंडर सभी घरों में जाते हैं, जिनमें वे घर भी शामिल हैं जो लाल ज़ोन में होते हैं जहां से कोरोना वायरस के फैलने की संभावना होती है। सभी सिलिंडरों को मज़दूरों को हाथों से उठाना व ले जाना होता है। इनमें से कुछ सिलिंडरों पर कोविड-19 वायरस हो सकते हैं। लेकिन हमारे मज़दूरों को पता नहीं होता कि कौन से सिलिंडर में वायरस है। उन्हें सभी को एक जैसे ही उठाना होता है। यह एक आवश्यक सेवा है जिसे रोका नहीं जा सकता है।

उत्पादन क्षेत्र में मज़दूरों के बीच शारीरिक दूरी उतनी ही है जितनी कोविड-19 संकट के पहले हुआ करती थी। कुछ भी बदला नहीं है। जबकि शारीरिक दूरी रखने की बात की जाती है, उत्पादन कारखानों में ऐसा नहीं किया जा सकता है। अभी भी उतने ही मज़दूर एक साथ काम करके उत्पादन कर रहे हैं। तो उन्हें सिलिंडरों से, नहीं तो दूसरे मज़दूरों से वायरस लगने का ख़तरा है अगर वे संक्रमित हों तो। उन्हें ख़तरनाक काम करने के लिये कोई विशेष मुआवज़ा नहीं मिल रहा है।

म.ए.ल. : इस संदर्भ में आई.ओ.सी. के मज़दूरों की क्या खास मांगें हैं?

का. प्रीति : वायरस के हमले के ख़तरे को झेलने के इस वक्त में, मज़दूर विशेष भुगतान की मांग कर रहे हैं, जैसे कि उनके वेतन को दो-गुना करना। दूसरे मज़दूरों के मुकाबले, वायरस का सबसे ज्यादा असर व जोखिम ठेका मज़दूरों पर है।

हालांकि कार्पोरेशन ने मास्क, दस्तानों व सैनेटाइज़र का प्रबंध किया है परन्तु ये मज़दूरों की संख्या के लिये अपर्याप्त हैं। काम के मुताबिक और दूसरी ज़रूरतों के लिये मज़दूरों को मास्क समय-समय पर उतार देने पड़ते हैं। एक बार मास्क को उतार देते हैं तो इन्हें दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। मास्क व दस्तानों की संख्या काफी नहीं है।

आई.ओ.सी. के मज़दूरों के यातायात का कोई प्रबंध नहीं किया गया है। उन्हें देहाड़ी मज़दूरों के जैसे माना जा रहा है। अगर वे एक दिन नहीं आते तो उनका उस दिन का वेतन काट लिया जाता है। कारखाने जाने-आने के वक्त, अपना पहचान पत्र दिखाने पर भी पुलिस मज़दूरों पर हमले करती है। मज़दूर मांग कर रहे हैं कि कम से कम लॉकडाउन की अवधि में उन्हें परिवहन की सुविधा दी जानी चाहिये।

कारखाने की केन्टीन पुराने तरीके से ही चल रही है। शरीरिक दूरी रखने, इत्यादि का कोई बंदोबस्त नहीं है। कुछ कारखानों में केन्टीन बंद है और मज़दूरों के भोजन का कोई इंतजाम नहीं है। मज़दूरों की मांग है कि प्रबंधन को उनके लिये चावल, दाल, तेल, इत्यादि का इंतजाम करना चाहिये ताकि वे मौजूदा परिस्थिति से जूझ सकें।

मज़दूरों के बीच कोरोना संक्रमण को समय पर पता करने के लिये, प्रबंधन को मज़दूरों के लिये दैनिक ज़रूरी स्वास्थ्य जांच का प्रबंध करना चाहिये और इसकी रोकथाम के लिये पहलकदमी लेनी चाहिये।

लेकिन कंपनी प्रबंधन ने मज़दूरों की उक्त ज़रूरतों पर गौर करने में कुछ भी गंभीरता नहीं दिखाई है।

म.ए.ल. : मौजूदा परिस्थिति क्या दिखाती है?

का. प्रीति : बड़े पूंजीपतियों के हित में हिन्दोस्तानी सरकार विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, खास कर पेट्रोलियम कंपनियों, का निजीकरण करने की जबरदस्त कोशिश कर रही है। आई.ओ.सी. व अन्य पेट्रोलियम उत्पादन कंपनियां अर्थव्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कोरोना वायरस जैसे वर्तमान संकट, जंग या हिन्दोस्तान पर व्यापारिक प्रतिबंधों व नाकेबंदी के हालातों में ऊर्जा के क्षेत्र की यही सार्वजनिक कंपनियां अपने देश को चलाने में रीढ़ की हड्डी साबित होंगी। अगर ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र का निजीकरण किया जायेगा तो आपात्काल और संकट में देश के लोग सुरक्षाहीन हो जायेंगे। अपने मुनाफे को अधिकतम बनाने के उद्देश्य से चलाई जाने वाली एक निजी कंपनी मुश्किल परिस्थिति में लोगों के सर्वाधिक हित में क्यों काम करेगी? ऐसी कठिन परिस्थितियों में मुद्दों को सुलझाने की जगह, उसकी कोशिश होगी कि किसी तरह से एक कृत्रिम कमी बनाई जाये। अपने मुनाफे के लिये वह देश से फिरोती वसूलने में नहीं हिचकिचायेगी। यही आज हम बड़े खुदरा व्यापार व वितरण कंपनियों में देख सकते हैं जो ज़रूरी वस्तुओं की जमाखोरी कर रही हैं ताकि समाज के हित की बलि चढ़ा कर पैसे बनाये जा सकें। अधिकतम मुनाफा बनाने के उद्देश्य के साथ-साथ ये कंपनियां मज़दूरों का शोषण, विदेशों से काम करवाना और देश में बेरोज़गारी बढ़ाने को और तीव्र कर रही हैं।

अतः कोरोना संकट साफ-साफ दिखा रहा है कि अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रों के उद्यमों को निजी मालिकी में नहीं जाने देना चाहिये बल्कि उन्हें सामाजिक नियंत्रण में लाना चाहिये।

म.ए.ल. : कोरोना महामारी से हमें क्या सबक लेना चाहिये?

का. प्रीति : अपने देश में अधिकांश लोग सार्वजनिक हस्पतालों में जाना चाहते हैं न कि निजी हस्पतालों में। क्योंकि अगर किसी मरीज को वेंटीलेटर जैसे किसी उपकरण की ज़रूरत होगी तो निजी हस्पताल में इसका खर्चा लाखों में हो जायेगा, जो अधिकांश लोग सह नहीं सकेंगे। लोगों के हितों की रक्षा के लिये सभी ज़रूरी उत्पादन व सेवाओं की मालिकी सार्वजनिक होनी चाहिये। चाहे वह दवा उत्पादन हो या स्वास्थ्य उपकरणों का उत्पादन, या स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध का काम हो या स्वास्थ्य संबंधी और कोई सेवा हो, यह अत्यंत आवश्यक है कि ऐसी वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन व वितरण सार्वजनिक नियंत्रण में होना चाहिये, न कि मुनाफे से प्रेरित किसी निजी कंपनी के हाथों में।

दुनियाभर में बहुत से देशों में सार्वजनिक धन का एक बहुत बड़ा हिस्सा सैन्यीकरण पर खर्च होता है। इसकी जगह यह खर्च स्वास्थ्य व अन्य ज़रूरी सामाजिक वस्तुओं व सेवाओं पर होना चाहिये। वर्तमान संकट ने दिखाया है कि स्वास्थ्य सेवा पर कितना कम निवेश किया जा रहा है और इस महामारी का सामना करने के लिये स्वास्थ्य व्यवस्था में कितनी भारी कमियां हैं। जो धन सेना व हथियारों पर खर्च किया जा रहा है उसे उत्पादक उद्देश्यों पर लगाया जाना चाहिये। इसे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा व लोगों के कल्याण बढ़ाने की अन्य सेवाओं के लिये इस्तेमाल किया जाना चाहिये।

हम सभी को जन केन्द्रित सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था को स्थापित करने के लिये काम करना चाहिये।

म.ए.ल. : आई.ओ.सी. के मज़दूरों की मांगों का मज़दूर एकता लहर हार्दिक समर्थन करता है। अपने विचार और समय देने के लिये हम आपके आभारी हैं।

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