आई.एल. एंड एफ.एस. घोटाला – उच्चतम स्तरीय मिलीभगत

इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज़ के दिवालिया होने के दो साल बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट ने 21 अप्रैल, 2020 को एक आदेश पारित किया, जिसमें कंपनी के ऑडिटर्स – डेलॉइट हास्किन्स एंड सेल्स एंड बी.एस.आर. एंड एसोसिएट्स (के.पी.एम.जी. से जुड़ी एक कंपनी) पर केंद्र सरकार के प्रतिबंध को खारिज़ कर दिया। लेखा परीक्षकों पर कंपनी के प्रबंधन के साथ सहयोग करने, तथ्यों को छिपाने और वित्तीय वर्ष 2014-2018 की अवधि के खातों और वित्तीय विवरणों की पुस्तकों के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया था।

डेलॉयट और के.पी.एम.जी. की, दुनिया की सबसे बड़ी 4 ऑडिट कंपनियों में गिनती होती है। वे दुनियाभर में सबसे बड़ी कंपनियों को लेखांकन, लेखा परीक्षा और परामर्श सेवाएं प्रदान करते हैं। ऑडिटर के रूप में, उन पर यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी है कि कंपनियों के खातों को देश के कानून के अनुसार, मेन्टेन किया जा रहा है और यह भी कि वित्तीय विवरण, कंपनी की सही वित्तीय स्थिति को दर्शाते हैं। हालांकि, ये वैश्विक ऑडिट कंपनियां, कंपनियों के निदेशकों के साथ मिलकर, झूठे खातों को पेश करने के लिए और इस प्रकार दुनिया के सबसे बड़े घोटालों के लिए भी बदनाम हैं।

आई.एल. एंड एफ.एस. के मामले में, कंपनी के निदेशकों ने कई गैरकानूनी काम किए थे जैसे कि जिन कंपनियों पर वे एहसान करना चाहते थे उनको बड़ी मात्रा में कर्ज़ देना जबकि उन्हें पता था कि उनको उधार देना कितना जोखिम भरा क़दम है। उन्होंने जिस उद्देश्य से उधार लिया था, उसमें पैसा लगाने के बजाय उधार लिए हुए पैसों को किसी दूसरे धंधे में लगाया गया जो गैरकानूनी था। निदेशकों ने खुद को, प्रत्येक वर्ष न केवल 10 करोड़ रुपये से अधिक का भारी वेतन दिया, बल्कि इसके अलावा लाखों रुपये की राशि अच्छी परफॉरमेंस के लिए बोनस और ”कमीशन“ के नाम पर कलेक्ट किया, जबकि उनकी कंपनियां और उन कंपनियों से संलग्न सहायक कंपनियां सभी वास्तव में डूब रहीं थी।

आई.एल. एंड एफ.एस. के सबसे बड़े शेयरधारक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और संस्थान थे – कंपनी के 40 प्रतिशत हिस्से के मालिक, भारतीय जीवन बिमा निगम, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया थे। कई सरकारी नौकरशाह और पूर्व नौकरशाह, कंपनी के बोर्ड और मैनेजमेंट का हिस्सा थे। इसीलिए, कंपनी को करोड़ों की इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढ़ांचे) परियोजनाओं के आर्डर प्राप्त करने में कोई परेशानी नहीं हुई और इस तरह आई.एल. एंड एफ.एस., बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बन गई – राजमार्गों और पुलों का निर्माण, बुनियादी सुविधाओं के लिए उपक्रमों का निर्माण, इत्यादि में उसको करोड़ों के आर्डर मिले थे। अगस्त 2018 में कंपनी अपने ऋणों की किश्त का भुगतान करने में जब असमर्थ हो गई। इसका ऋणदाताओं और निवेशकों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। कई कंपनियों ने अपने प्रोविडेंट फंड्स और रिटायरमेंट फंड्स को, जिनकी राशि 15,000-20,000 करोड़ रुपये थी, आई.एल. एंड एफ.एस. में निवेश के लिए लगाया था, वे सब अब डूबने की स्थिति में हैं। हजारों मज़दूरों और पेंशनधारकों को सेवा निवृत्ति में मिलने वाली राशि अब ख़तरे में पड़ गयी है। यह अंदाज़ा है कि पूरा घोटाला लगभग 90 हजार करोड़ रुपये का है।

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी, आई.एल. एंड एफ.एस. को अधिक उधार लेने से रोकने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया, जबकि यह स्पष्ट था कि कंपनी, ऋण देने और उधार लेने से संबंधित नियमों का पालन नहीं कर रही थी। कई तथाकथित स्वतंत्र निदेशक जिनकी ज़िम्मेदारी होती है कि इस तरह के गैरकानूनी फ़ैसलों को रोकें, जिन्हें कंपनी के संचालन में ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए नियुक्त किया जाता है। लेकिन उन्होंने, प्रबंधन पर कोई सवाल नहीं उठाये।

भारत सरकार का कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय वह कार्यालय है जिसने कॉर्पोरेट धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सुरक्षा के लिए कानून बनाया है। सभी कंपनियों के लेखा परीक्षकों (ऑडिटर्स) की रिपोर्ट, जो कंपनियों के द्वारा पेश किया गया एक सर्टिफिकेट की तरह होता है और जो यह प्रमाणित करता है कि कंपनियों के खातों के बारे में वित्तीय विवरण सही हैं और कंपनी की सही वित्तीय स्थिति को दर्शाते हैं – ये ऑडिट रिपोर्टें इस मंत्रालय को पेश की जाती हैं। जब कंपनी दिवालिया हो गई, तो इसी मंत्रालय ने भारत सरकार के गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एस.एफ.आई.ओ.) को, आई.एल. एंड एफ.एस. के मामलों की जांच करने का निर्देश दिये। एस.एफ.आई.ओ. ने 750 पन्नों की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें 30,000 से अधिक पन्नों के अनुबंध (अनेक्स्चर) भी शामिल थे। ऑडिटरों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एम.सी.ए. का मामला, इस रिपोर्ट पर आधारित था। मुंबई उच्च न्यायालय ने इस आधार पर पूरे केस को खारिज़ कर दिया कि रिपोर्ट में धोखाधड़ी का एक भी सबूत पेश नहीं किया गया था। इसने ऑडिटरों के खि़लाफ़ केस को खारिज कर दिया जो अगर साबित होता तो भारत में इन सभी बड़ी ऑडिट कंपनियों पर उनके प्रतिबंध का कारण बनता। इस सनसनीखेज केस के खारिज होने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस केस में पूरी तरह से और व्यापक जांच नहीं हुई है और जिसकी ज़रूरत है क्योंकि इस घोटाले में कई समूह कंपनियां तथा कई और लोग भी शामिल हैं। सोचने की बात यह भी है कि भारत सरकार का कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय, जिसने कंपनी अधिनियम 2013 तैयार किया है और जो कंपनी कानूनों के विशेषज्ञों से भरा हुआ है, उसने ऑडिटरों की पेशेवर गड़बड़ियों के आरोप को साबित करने के लिए अधिनियम के एक गलत अनुभाग को इस केस में लगाने का फैसला किया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऑडिटरों पर प्रतिबंध लगाने के मामले को खारिज करने के अपने फैसले का आधार,  इस अनुभाग और अन्य तकनीकी मुद्दों को बताया – फै़सले में यह दावा किया कि कंपनी अधिनियम के इस अनुभाग का उपयोग उन ऑडिटरों के खि़लाफ़ नहीं किया जा सकता है जिन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया है!

यह स्पष्ट है कि एम.सी.ए. की इन बड़ी ऑडिट (लेखा परीक्षा) कम्पनियों पर प्रतिबंध लगाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि उच्च न्यायालय ने एम.सी.ए. की जांच पड़ताल के बाद पेश की गयी रिपोर्ट में कई खामियां पायीं, लेकिन उसने इस मामले की दोबारा जांच के निर्देश नहीं दिए, जबकि यह बहुत स्पष्ट था कि लेखा परीक्षकों ने वास्तव में इस भारी धोखाधड़ी में, प्रबंधन के साथ समझौता किया था।

यह पहली बार नहीं है जब ऑडिटरों ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर लोगों को उल्लू बनाने का काम किया है। पिछले साल, आई.एल. एंड एफ.एस. घोटाले के सामने आने के बाद, प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण ने जानी-मानी कंपनी, प्राइस वाटरहाउस को क्लीन चिट दे दी।

इससे पहले, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने, 7800 करोड़ रुपये के सत्यम कंप्यूटर घोटाले में, खातों की धोखाधड़ी करने के इलजाम के लिए प्राइस वाटरहाउस पर 2 साल का प्रतिबंध लगाया था। यह भी जानी-मानी बात है कि प्राइस वाटरहाउस कूपर्स, के.पी.एम.जी., अन्स्र्ट एंड यंग और डेलोइट एंड तूचे जैसी अंतर्राष्ट्रीय ऑडिट कंपनियां, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट में शामिल थीं और उन सभी बड़े बैंकों के खातों की धोखा-धड़ी की साज़िश में पूरी तरह मिली हुई थीं जो संकट के दौरान दिवालिये हो गए थे।

पूँजीवादी व्यवस्था इसी तरह काम करती है। यह मज़दूरों के शोषण और बड़े निगमों, सबसे बड़े बैंकों और ऋणदाताओं, मंत्रालयों और सरकारी विभागों के बीच उच्चतम स्तर पर भ्रष्टाचार पर आधारित है, इस पूंजीवादी व्यवस्था में, सरकारी मंत्रालय और सरकारी विभागों की ज़िम्मेदारी होती है कि इस तरह की धोखा-धडी के खि़लाफ़ सख्त कानून बनाएं. उनके द्वारा बनाये गए कानूनों और नियमों का पालन हो। दूसरी ओर, छोटे व्यवसायों और उद्यमों को सरकारी कानूनों और प्रक्रियाओं के मामूली उल्लंघन के लिए, परेशान और दंडित किया जाता है। सबसे बड़े पूंजीपतियों को अपनी पूंजी का विस्तार जारी रखने के लिए, हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी पर आसानी से पर्दा डाला जाता है।

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