सार्वजनिक अस्पताल सारा बोझ उठा रहे हैं जबकि सरकार की सारी नीतियां निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों की ओर उन्मुख हैं

वर्तमान के संकट ने हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की अपर्याप्तता का पर्दाफाश कर दिया है।

इस वायरस से लड़ने के लिए नाकाम साबित हुए निजी अस्पतालों का भी पर्दाफाश हुआ।

इस सब के बावजूद सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की जगह निजीकरण में निवेश कर रही है।

वर्तमान के संकट ने हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की अपर्याप्तता का पर्दाफाश कर दिया है।

इस वायरस से लड़ने के लिए नाकाम साबित हुए निजी अस्पतालों का भी पर्दाफाश हुआ।

इस सब के बावजूद सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की जगह निजीकरण में निवेश कर रही है।

कोरोना वायरस के खि़लाफ़ जंग मुख्य रूप से सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ लड़ रहे हैं, जिनके सर पर इस समय बेहद ज्यादा काम है। उपचार करवाने वाले लोगों के लिए अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में बिस्तर नहीं हैं। हमारे देश में हर 11,000 लोगों के लिए केवल एक सरकारी डॉक्टर है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बताए गए अनुपात का दसवां हिस्सा है।

जब प्रधानमंत्री मोदी ने आत्म-निर्भर भारत अभियान के नाम पर 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की, तब स्वाभाविक रूप से लोगों की उम्मीद थी कि उसमें एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करने के लिए होगा। लेकिन 17 मई को जब वित्त मंत्री ने उस पैकेज के बारे में विस्तार में बताया तब लोगों की सारी आशाओं पर पानी फिर गया।

वित्त मंत्री सीतारमन ने वादा किया था की “सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाया जाएगा”, लेकिन कब और कैसे इसके बारे में कुछ नहीं बोला गया। ऐसे वादे पहले भी बहुत बार किये जा चुके हैं। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकारों का कुल मिलाकर स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च पिछले 10 सालों में राष्ट्रीय आय या जी.डी.पी. के 1.5 प्रतिशत से भी कम रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में 2017 तक इस अनुपात को बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत करने का प्रस्ताव था। इस लक्ष्य को अब वर्ष 2025 तक धकेल दिया गया है।

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए राज्यों को मौजूदा व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और अन्य सामग्रियों के लिए 4100 करोड़ रुपये (पूरे पैकेज का 0.2 प्रतिशत) खर्च करने की केवल एक ठोस घोषणा वित्त मंत्री द्वारा की गई। अगर इस रकम को 28 राज्यों में बाटें तो हर एक राज्य के हिस्से में केवल 146 करोड़ रुपये आते हैं।

वित्त मंत्री की घोषणाओं में “इंडिया कोविड-19 इमरजेंसी रिस्पांस एंड हेल्थ सिस्टम प्रीपैरडनेस प्रोजेक्ट” के लिए विश्व बैंक द्वारा समर्थित ऋण से कुछ मध्यम अवधि के क़दम शामिल थे। इस प्रोजेक्ट का एक मुख्य लक्ष्य जो 2020-24 तक लागू होगा वह स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र की भूमिका को और बढ़ाना है।

आज हमारे देश में ज्यादातर डॉक्टरों को निजी अस्पतालों या क्लिनिकों द्वारा नियुक्त किया गया है। इनका हिस्सा उपलब्ध बेड के दो-तिहाई और 80 प्रतिशत वेंटीलेटर और आई.सी.यू. जितना है। हालाँकि, कोरोना वायरस से लड़ने के लिए इन अस्पतालों का योगदान 10 प्रतिशत से भी कम है। ज्यादातर निजी अस्पताल या तो बंद हो गए हैं या मरीजों की संख्या में गिरावट की भरपाई के लिए सरकार से मुआवज़ा मांग रहे हैं।

अब तक कोरोना वायरस के खि़लाफ़ जंग मुख्य तौर पर सिर्फ शहरों और नगरों में लड़ी जा रही थी, लेकिन अब ये गांवों में भी फैलने लगी है। ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में शहरों से भी अधिक कर्मचारियों और ज़रूरत के सामानों में कमी की समस्या बढ़ रही है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में, जो ग्रामीण क्षेत्रों में 30 बिस्तर वाले सरकारी अस्पताल हैं, डॉक्टरों के 80 प्रतिशत और प्रयोगशाला तकनीशियनों के 40 प्रतिशत पद खाली हैं।

निजी संस्थान असहाय मरीजों को बिना ज़रूरत वाले टेस्ट बताकर या ज़रूरत से ज्यादा समय तक अस्पताल में रखकर उन्हें लूटने में माहिर हैं। राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण संगठन (एन.एस.एस.ओ.) द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में यह निकलकर आया कि निजी अस्पताल में भर्ती मरीज औसतन 31,845 रूपए खर्च करते हैं। यह रकम सरकारी अस्पतालों में औसतन खर्च की जाने वाली 4,452 रुपयों की क़ीमत से तकरीबन 7 गुना ज्यादा है।

कुल मिलाकर, स्वास्थ्य के कुल खर्च का केवल 30 प्रतिशत खर्च केंद्र और राज्य सरकारें करती हैं, जबकि 70 प्रतिशत मरीजों द्वारा स्वयं भरा जाता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में कर्मचारी और ज़रूरत की वस्तुओं की बढ़ती और गंभीर समस्या को हल करने के बजाय, नई दिल्ली में सत्ता पर आनेवाली एक के बाद एक सरकारें निजीकरण की नीति को आगे बढ़ा रही हैं। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को अधिक से अधिक हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों के अधिकतम मुनाफे़ के स्रोत के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।

2013-14 और 2017-18 के बीच निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा जमा किये गए प्रीमियम 15,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 33,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, यानि 22 प्रतिशत की सालाना औसतन बढ़त। 2017 में घोषित की गई “नई स्वास्थ्य नीति” का उद्देश्य निजी अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की बढ़त को और तेज़ करना था।

विदेशी कंपनियों ने हिन्दोस्तान के अस्पतालों की श्रृंखला खरीदने के लिए ढेर सारे पैसों का निवेश करना शुरू कर दिया है। अमरीकी निवेश कंपनी के के.आर. ने मैक्स हैल्थकेयर का अधिग्रहण करने के लिए रेडियंट लाइफ केयर की सहायता की। सिंगापुर स्थित टेमासेक के साथ एक अन्य अमेरिकी निवेश कंपनी टी.पी.जी. कैपिटल मेदांता अस्पताल की श्रृंखला को खरीदने की कोशिश कर रहे हैं। एशिया का सबसे बड़ा मलेशिया-सिंगापुर का एक निजी गुट, आई.एच.एच. हैल्थकेयर ने 2018 में फोर्टिस को खरीद लिया। उसने कॉन्टिनेंटल अस्पतालों और ग्लोबल अस्पतालों का भी अधिग्रहण किया।

सितम्बर 2018 को शुरू की गई आयुष्मान भारत – राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना, सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित है, जिसके तहत ग़रीब लोगों के निजी अस्पतालों में इलाज के लिए सरकार पॉलिसी प्रीमियम का भुगतान करती है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पी.पी.पी.) के नाम पर, जिला अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक बुनियादी सुविधाओं को निजी खिलाड़ियों को सौंप दिया जा रहा है।

जहाँ एक तरफ मौजूदा संकट ने सभी राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के लिए तेज़ी से बढ़ते बजट आवंटन के महत्व को उजागर किया है, वहीं दूसरी ओर हिन्दोस्तान की सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की तरफ तेजी से लगातार क़दम बढ़ा रही है। यह साफ दिखता है कि उनका उद्देश्य हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों का मुनाफ़ा सुनिश्चित करना है न कि सभी के लिए पर्याप्त और किफ़ायती स्वास्थ्य सेवाओं को सुनिश्चित करना है।

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