आपरेशन ब्लू स्टार की 36 वीं वर्षगाँठ :

स्वर्ण मंदिर पर सैनिक हमले से सबक

वह सिख धर्म के लोगों को बेइज़्ज़त करने के लिए राज्य द्वारा एक आतंकवादी हमला था

सरकारी प्रचार में उसे एक आतंकवाद-विरोधी अभियान बताया गया है

राजकीय आतंकवाद और धर्म के आधार पर उत्पीड़न आज भी हमारे सामने बहुत बड़ी समस्याएं हैं

पीड़ितों को ही दोषी ठहराया जाता है – सच को झूठ और झूठ को सच बताया जाता है

6 जून, 2020 को हिन्दोस्तानी राज्य की बेहद जघन्य हरकतों में से एक की 36वीं वर्षगांठ है। इस दिन पर, 1984 में, हिन्दोस्तानी सेना ने “सिख आतंकवादियों को खदेड़ने” के नाम पर, अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर “अंतिम हमला” किया था।

उस समय वास्तव में क्या हुआ था और क्यों, इसके बारे में सच्चाई को जानना आज की पीढ़ी के लिए अत्यावश्यक है। यह इसलिए अत्यावश्यक है क्योंकि आज भी राजकीय आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा हमारे सामने बहुत बड़ी समस्याएं हैं। धार्मिक उत्पीड़न के पीड़ितों को आज भी दोषी ठहराया जाता है, जैसा कि इसी वर्ष के फरवरी के महीने में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुयी सांप्रदायिक हिंसा के हालिया मामले में देखने में आ रहा है।

आपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत 1 जून, 1984 को हुयी थी। 2 जून को पंजाब में सैनिक शासन लागू किया गया। सेना की कम से कम 7 टुकड़ियां – यानी एक लाख से अधिक सैनिक – पंजाब में तैनात किये गए। 3 जून को गुरु अर्जुन देव की शहादत का दिन था। उस पाक अवसर पर हजारों श्रद्धालू स्वर्ण मंदिर परिसर में एकत्रित हुए थे, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं, लड़कियां व बच्चे भी थे। सेना लगातार 6 दिन तक स्वर्ण मंदिर परिसर पर गोलियां बरसाती रही। अंत में, टैंक और सैनिक ढाल वाले वाहनों के ज़रिये पवित्र अकाल तख़्त पर बम बरसाए गए और स्वर्ण मंदिर को तथाकथित “आतंकवादियों” से “मुक्त” कराने के लिए सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में प्रवेश किया।

हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग को यह अच्छी तरह मालूम था कि लोग इस भयानक अपराध के खि़लाफ़ बग़ावत करेंगे। जब हजारों-हजारों किसान अपने पवित्र धर्म स्थल की हिफ़ाज़त करने के लिए वहां आने लगे, तो सेना ने उन पर हमला बोल दिया। उसके बाद, पूरे पंजाब में गुरुद्वारों पर हमले किये गए।

स्वर्ण मंदिर पर हमला हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा एक आतंकवादी हमला था, जिसका इरादा था सिख धर्म के लोगों को बेइज्ज़त करना।

उन दिनों, हिन्दोस्तानी राज्य और इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित मीडिया लगातार लोगों के दिमाग में यह ज़हर डालती रहती थी कि सिख लोग “आतंकवादी”, “रूढ़ीवादी”, “अलगाववादी”, “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता के दुश्मन”, “पाकिस्तानी एजेंट” आदि हैं। ऐसा प्रचार करके, सिख लोगों के ऊपर हिन्दोस्तानी राज्य के हर तरह के हमले को जायज़ ठहराया जाता था। हिन्दोस्तानी राज्य ने आपरेशन ब्लू स्टार और उसके साथ-साथ फैलाये गए राजकीय आतंकवाद के खि़लाफ़ लोगों की बग़ावत को सोच-समझकर सांप्रदायिक रंग दिया। राज्य का मक़सद था लोगों की एकता को तोड़ना और धर्म के आधार पर लोगों को आपस में लड़वाना।

स्वर्ण मंदिर पर सैनिक हमला एक सांप्रदायिक हमला था, जिसमें राज्य ने किसी धार्मिक सभा में खुलेआम हस्तक्षेप किया। राज्य का काम है लोगों के जीवन की रक्षा करना और हर धर्म को मानने वालों के अपने-अपने तरीके से पूजा-इबादत करने के अधिकार की रक्षा करना। परन्तु उस अवसर पर राज्य ने अपनी सेना को भेजकर, एक धर्मस्थान पर हमला किया था और वहां एकत्रित हुए बहुत सारे लोगों की हत्या की थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह दावा किया था कि उनकी सरकार के पास “कोई और चारा नहीं था”, क्योंकि उन्हें तथाकथित गुप्त सूचना मिली थी कि स्वर्ण मंदिर के अन्दर छुपे हुए आतंकवादी देशभर में हिन्दुओं की हत्या करने जा रहे थे। लेकिन यह सरासर झूठ साबित हुआ है और बीते 36 वर्षों में ऐसी किसी साज़िश का कोई सबूत नहीं पेश किया गया है।

दूसरी ओर, इस बात का बहुत ही विश्वसनीय सबूत प्राप्त हुआ है कि हिन्दोस्तानी सेना की चकराता की छावनी में, जून 1984 से कई महीने पहले से ही, स्वर्ण मंदिर का एक नमूना बनाकर, हिन्दोस्तानी सेना के कुछ कमांडो यूनिटों को उस आपरेशन के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा था। यह सबूत भी प्राप्त हुआ है कि हिन्दोस्तानी सरकार ने स्वर्ण मंदिर पर हमले की योजना बनाने की शुरुआत में ही ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर सरकार से मदद मांगी थी और उन्हें वह मदद मिली थी।

अब तक यह साबित हो चुका है कि 1980 के दशक में पंजाब में कार्यरत कई आतंकवादी गिरोहों को केन्द्रीय सरकार की खुफिया एजेंसियों से समर्थन व धन मिलता था। पंजाब पुलिस के कई वरिष्ठ अफ़सरों ने यह स्वीकार किया है कि उनके ख़ास “आतंकवाद-विरोधी” यूनिट होते थे जिनका काम था समय-समय पर बसों और बाज़ारों में जाकर हिन्दुओं का क़त्ल करना और फिर उसके लिए सिख आतंकवादियों को दोषी बताना। इस प्रकार की आतंकवादी हरक़तों से लोगों को भड़काकर, हुक्मरानों ने खूब प्रचार किया कि पंजाब में चल रहे संघर्ष “सिख रूढ़ीवाद” से प्रेरित थे। इस तरह, पंजाब में तथा पूरे हिन्दोस्तान में संघर्ष कर रहे लोगों को बांटा और गुमराह किया गया और उन पर हमला किया गया।

उस समय देश के लोगों में बहुत असंतोष फैला हुआ था। आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के मज़दूर हड़ताल करने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे थे। देश के कई भागों में किसान अपनी फ़सलों के लिए स्थाई और लाभकारी दाम की मांग कर रहे थे। पंजाब, असम और कई दूसरे राष्ट्रों के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों की मांगें भी उठायी जा रही थीं।

इजारेदार पूंजीवादी घराने राज्य सत्ता पर अपने नियंत्रण को मजबूत करना चाहते थे और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के रास्ते में सभी रुकावटों को हटाना चाहते थे। “सिख आतंकवाद” का हव्वा खड़ा करके बड़े पैमाने पर राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराना – यही इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उनका पसंदीदा हथकंडा बन गया। सिखों को देश के दुश्मन बताकर और उन पर हिंसा फैलाकर, मज़दूरों और किसानों के अधिकारों के संघर्षों को भी बांटा और गुमराह किया गया। पंजाब के बड़े जमींदार और दूसरे प्रांतीय संपत्तिवान तबके जो अपने राज्य की नदियों के पानी और अन्य संसाधनों पर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे, उन्हें भी इस तरह कुचल दिया गया।

उस समय अमरीका और ब्रिटेन में शासन करने वाले इजारेदार पूंजीपति सभी देशों में सार्वजनिक सेवाओं को ख़त्म करके उनका निजीकरण करने की खुलेआम वकालत कर रहे थे। सोवियत संघ घोर संकट में था और उसका विघटन होने जा रहा था। हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीवादी घराने तथाकथित “समाजवादी नमूने के समाज” की पुरानी व्यवस्थाओं और नीतिगत ढांचे को ख़त्म करने की उचित हालतें तैयार करना चाहते थे। उन्होंने अपने साम्राज्यवादी इरादों को हासिल करने के लिए, भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के नए नीतिगत नुस्खों को अपनाने का फैसला किया। स्वर्ण मंदिर पर सैनिक हमला करने और पंजाब व पूरे हिन्दोस्तान में राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंक फैलाने के पीछे उनका यही एजेंडा था।

बीते 36 सालों में राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हत्याकांड और धार्मिक स्थानों पर हमले बार-बार व बहुत कम-कम समय के अंतर के बाद होते रहे हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह इजारेदार पूंजीवादी घरानों का, लोगों पर अपनी हुक्मशाही को थोपने के लिए, पसंदीदा हथकंडा बन गया है। हुक्मरानों ने इस प्रकार के अनेक सांप्रदायिक क़त्लेआम आयोजित किये हैं, जिनमें शामिल हैं नवम्बर 1984 में सिखों का जनसंहार, हजरतबल दरगाह पर हमला, बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उसके बाद सांप्रदायिक हिंसा, गुजरात में मुसलमानों का जनसंहार, ओडिशा में गिरजाघरों पर हमले, मुज्जफ्फरनगर में मुसलमानों पर हमले और हाल में, पूर्वोत्तर दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा।

बीते 36 वर्षों के अनुभव का एक अहम सबक यह है कि साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का स्रोत लोगों की धार्मिक आस्थाओं में नहीं है। समस्या का स्रोत मुट्ठी-भर अति धनवान इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों में आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के बढ़ते संकेंद्रण में है। साम्प्रदायिकता, सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद इसी अल्पसंख्यक हुक्मरान वर्ग की हुक्मशाही को बरकरार रखने का काम करते हैं, क्योंकि इनसे लोगों को बांटा जाता है, अपने असली दुश्मनों को पहचानने से गुमराह किया जाता हैं और हर प्रकार के विरोध को कुचलने के लिए क्रूर बल प्रयोग को जायज़ ठहराया जाता है।

एक और अहम सबक यह है कि हिन्दोस्तानी लोगों की एकता के लिए ख़तरा अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों से नहीं है, चाहे वे पंजाब, असम, कश्मीर, मणिपुर या किसी और इलाके के लोग हों। हमारी एकता को ख़तरा हिन्दोस्तानी संघ की सांप्रदायिक और उपनिवेशवादी नीति से है। हमारी एकता को ख़तरा इसलिए पैदा होता है क्योंकि हिन्दोस्तानी राज्य राजनीतिक आंदोलनों के साथ ऐसा बरताव करता है जैसे कि वे कानून-व्यवस्था की समस्याएं हैं।

अंतिम और बहुत ही अहम सबक यह है कि लोगों को बड़ी दृढ़ता के साथ इस सोच का विरोध करना होगा और इसे ठुकराना होगा, कि हिन्दोस्तानी राज्य धर्म-निरपेक्ष है, कि सिर्फ कुछ धार्मिक कट्टरपंथी ही समस्या खड़ी करते हैं। 1980 के दशक में कम्युनिस्ट आन्दोलन के अन्दर कुछ लोगों ने सरकार के प्रचार – कि “सिख रूढ़ीवाद” समस्या की वजह है – के साथ समझौता कर लिया था। वह बहुत बड़ी गलती थी। उसकी वजह से, राजकीय आतंकवाद और इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुक्मशाही के खि़लाफ़ राजनीतिक एकता बनाने का संघर्ष कमजोर हुआ। आज सरकारी प्रचार के अनुसार, मुख्य समस्या “इस्लामी रूढ़ीवाद” है। यह कम्युनिस्टों की बहुत बड़ी भूल होगी अगर वे इस प्रचार का खंडन करने के लिए, “हिन्दू रूढ़ीवाद” को समस्या बताएं और हिन्दोस्तानी राज्य की “धर्म निरपेक्ष बुनियादों” के बारे में भ्रम फैलाएं। मज़दूर वर्ग और कम्युनिस्ट आन्दोलन के संघर्ष का निशाना होना चाहिए – राज्य और इजारेदार पूंजीपतियों की हुक्मशाही। तभी हम समाज की समस्याओं को हल करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।

ज़मीर का अधिकार हर इंसान का अलंघनीय अधिकार है और उसकी हिफ़ाज़त के संघर्ष में हमें मज़दूर वर्ग को अगुवाई देनी होगी। ज़मीर का अधिकार न सिर्फ धार्मिक आस्थाओं के लिए बल्कि राजनीतिक मत के लिए भी लागू होता है। हमें ऐसा राज्य हरगिज मंजूर नहीं है, जो किसी व्यक्ति को ज़मीर के अधिकार से वंचित कर सकता है, सिर्फ इसलिए कि उसके मत राज्य सत्ता को पसंद न हों।

हमें किसी के भी ज़मीर के अधिकार का हनन करने वाले राज्य के हर क़दम का विरोध करना होगा। एक पर हमला सब पर हमला! इसे अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए।

मौजूदा सांप्रदायिक और आतंकवादी राज्य की जगह पर, हमें एक नए हिन्दोस्तानी संघ की स्थापना करने के लिए संघर्ष करना होगा, जो स्वेच्छा पर आधारित होगा और सभी लोगों के मानव अधिकारों व लोकतांत्रिक अधिकारों को सुनिश्चित करने पर वचनबद्ध होगा।

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