किसानों और कृषि मज़दूरों द्वारा बड़े पूंजीपतियों के पक्ष में पारित किये गये अध्यादेशों का विरोध

देशभर के किसानों और उनके संगठनों ने सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र के लिये पारित किये गए दो अध्यादेशों का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने “आवश्यक वस्तु अधिनियम” में किये गये संशोधन का भी विरोध किया है।

photo_AIKU“कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश-2020”, “एक भारत, एक कृषि बाज़ार’ के लिये मार्ग प्रशस्त करता है। इससे निजी कंपनियों को राज्य-विनियमित बाज़ारों से बाहर किसानों की उपज खरीदने की अनुमति मिलती है। यह कृषि व्यापार करने वाली बड़ी इजारेदार कंपनियों को बिना किसी रोकटोक के कृषि उपज की ख़रीद करने की अनुमति देता है।

“मूल्य का आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश-2020”, का उद्देश्य कृषि अर्थव्यवस्था में अनुबंध-खेती और भविष्य में सट्टेबाजी के कारोबार को बढ़ावा देना है। यह कृषि व्यापार करने वाली बड़ी इजारेदार कंपनियों को हिन्दोस्तान की कृषि पर अपना नियंत्रण और वर्चस्व स्थापित करने में सक्षम बनाएगा।

“आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955” में संशोधन करने वाला अध्यादेश, देश की खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक, प्रमुख कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण और उपलब्धता पर वर्तमान के सभी नियमों को हटा देता है। यह अध्यादेश पूंजीवादी कृषि व्यापार करने वाली बड़ी इजारेदार कंपनियों को खाद्य पदार्थों की जमाखोरी करने और कृषि व्यापार के माध्यम से अधिकतम लाभ कमाने की खुली छूट देगा।

पंजाब के किसान

पंजाब में किसान संगठनों ने बड़ी पूंजीवादी व्यापार कंपनियों के पक्ष में जारी किये गए अध्यादेशों का विरोध किया है। उन्होंने घोषणा की है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को रद्द करना किसानों को विनाश की ओर धकेल देगा।

भारतीय किसान यूनियन (राजोवाल) के अध्यक्ष, बलबीर सिंह राजोवाल ने कहा कि, “नरेंद्र मोदी के मंत्रीमंडल द्वारा पारित यह नया अध्यादेश, स्पष्ट रूप से मौजूदा मंडी प्रणाली को ख़त्म करने जा रहा है।”

“केंद्र सरकार तालाबंदी के दौरान पूरे कृषि क्षेत्र को पूंजीवादी घरानों को सौंपने के लिए बहुत उत्सुक है। इस नए अध्यादेश के ज़रिए, पंजाब और हरियाणा की मंडियों का दायरा और भी सीमित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) पर ख़रीद बंद होने से किसान पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे।

भारतीय किसान यूनियन (लखोवाल) के नेता अजमेर सिंह लखोवाल ने कहा कि: “कृषि राज्य का विषय है लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार, राज्यों की शक्तियों को केंद्रीकृत करने के लिए पूरी तरह तुली हुई है।

“इन सब अध्यादेशों का फ़ायदा व्यापारियों को अधिक होगा … किसानों को अपने क्षेत्र में भी मंडियों तक पहुंचने में मुश्किल होती है। वे अन्य राज्यों में आसानी से फ़सल नहीं बेच पाएंगे। पूंजीवादी घराने निश्चित रूप से अपनी मनमर्ज़ी से खुलेआम लूट करेंगे। हम इस अध्यादेश के खि़लाफ़ राज्यव्यापी आंदोलन करेंगे।”

पंजाब के एक अन्य वरिष्ठ किसान नेता सुखदेव सिंह ने कहा कि: “एक देश-एक कृषि बाज़ार” की अवधारणा सरासर किसान-विरोधी है।”

शिरोमणि अकाली दल ने इन अध्यादेशों का विरोध किया है। वरिष्ठ अकाली नेताओं ने इसे किसानों के लिए “हानिकारक और आत्मघाती” हमला बताया है और आलोचना की है, क्योंकि यह “कृषि के कॉर्पोरेटीकरण” का मार्ग प्रशस्त करेगा।

उन्होंने राज्य द्वारा दी जाने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी को रद्द करने के क़दम की निंदा की है, जो किसानों के एक बड़े हिस्से के लिए आय का एकमात्र स्रोत है। उन्होंने संसद में बिना किसी भी बहस के अध्यादेश के माध्यम से “आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955”, में संशोधन की कड़ी आलोचना की है।

अखिल भारतीय किसान सभा

अखिल भारतीय किसान सभा (ए.आई.के.एस.) ने 10 जून को इन अध्यादेशों का विरोध करने के लिए देशभर के किसानों का आह्वान किया।

Agriculture_workers_5x3बड़े पूंजीपतियों द्वारा किसानों की लूट को आगे बढ़ाने वाले और देश की खाद्य सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाले इन अध्यादेशों की आलोचना करते हुए, ए.आई.के.एस. ने अपनी सभी इकाइयों को सरकार के किसान-विरोधी इन अध्यादेशों का पर्दाफाश करने और उनके अपने संबंधित गांवों, कार्य स्थलों और रहने के स्थानों पर अध्यादेशों की प्रतियां जलाकर, अपना विरोध व्यक्त करने का आह्वान किया।

ए.आई.के.एस. के आह्वान को भारी समर्थन मिला है, यह बताया गया है कि हिन्दोस्तान भर में लाखों किसानों और कृषि मज़दूरों ने किसान-विरोधी अध्यादेशों की प्रतियां जलाईं। तमिलनाडु में 96 स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए और 2839 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।

केरल, बंगाल और त्रिपुरा में सभी मुख्य सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ राज्यों के गांवों में विरोध प्रदर्शन किए गए। भारी बारिश के बावजूद, महाराष्ट्र में 100 से अधिक स्थानों पर इसी तरह के विरोध प्रदर्शन हुए।

राजस्थान, असम, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़, आदि राज्यों के शहरों से भी किसानों द्वारा बड़े जोश से किये गए विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टें मिली हैं।

अन्य किसान संगठन

इन अध्यादेशों का विरोध करते हुए, महाराष्ट्र शेतकरी संगठन के संस्थापक सदस्य, विजय जंधिया ने कहा है कि महाराष्ट्र और देश के कई हिस्सों में, किसानों के लिये घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) भी नहीं मिल रहा है। अगर सरकार एम.एस.पी. को पूरी तरह से ख़त्म कर देती है तो इससे किसान बर्बाद हो जाएंगे।

भारतीय किसान यूनियन के और किसानों के आंदोलन की भारतीय समन्वय समिति के राष्ट्रीय सचिव, युद्धवीर सिंह ने कहा कि सब्जी और फल उत्पादकों को तबाह कर दिया गया है क्योंकि तालाबंदी के दौरान पूरी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) टूट गई थी। पूरे हिन्दोस्तान में कई स्थानों पर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) से भी कम दामों पर (1,000-1,200 प्रति क्विंटल) गेहूं बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने एम.एस.पी. को ख़त्म करने और किसानों की उपज की सुनिश्चित खरीदी को समाप्त करने के सरकार के क़दम का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इन अध्यादेशों से कृषि-व्यापार कंपनियों को मदद मिलेगी और बड़े पैमाने पर किसानों की तबाही होगी। भारतीय किसान यूनियन ने इस तथ्य पर भी चिंता व्यक्त की है कि शहरों में अपनी आजीविका खो चुके मज़दूरों की गांवों में वापसी के कारण ग्रामीण क्षेत्र के किसान, अब अपनी आय के एक महत्वपूर्ण स्रोत से वंचित हो जाएंगे और यह उनके हालातों को और भी बदतर कर देगा।

कृषि मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन

कृषि मज़दूरों ने हाल ही में पारित अध्यादेशों के खि़लाफ़, 4 जून को पूरे देश में एक विरोध प्रदर्शन किया। अपने हाथों में बैनर और तख्तियां पकड़े हुए, प्रदर्शनकारी मज़दूरों ने नारे लगाए और विभिन्न स्थानों पर भाषण दिए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि सरकार का यह क़दम, बड़ी निजी कंपनियों के पक्ष में है और कृषि क्षेत्र से जुडी आबादी को और भी ग़रीबी में और बड़े पैमाने पर तबाही की तरफ धकेलेगा।

देश के 15 राज्यों में आयोजित इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व ऑल इंडिया एग्रीकल्चर वर्कर्स यूनियन ने किया था। कोविड-19 की वजह से देशव्यापी लॉकडाउन के कारण, पहले से ही अपने ज़िन्दा रह पाने के लिए संघर्ष कर रहे कृषि मज़दूरों ने, केंद्र सरकार के इन क़दमों की कड़ी निंदा की है। उन्होंने अपनी कठिनाइयों को कम करने के लिए मनरेगा योजना के तहत अपने बैंक खातों में सीधे नकद ट्रांसफर और मनरेगा योजना के अंतर्गत और भी अतिरिक्त कार्य दिवसों को बढ़ाने की मांग की है।

कृषि मज़दूरों ने केरल में, कम से कम 10,000 गांवों की इकाइयों में और पंजाब के 22 जिलों में से कम से कम 14 जिलों में विरोध प्रदर्शन किया। महाराष्ट्र और तेलंगाना सहित कुछ अन्य राज्यों में, मनरेगा में लगे मज़दूरों के कार्य स्थलों पर प्रदर्शन हुए। उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में कृषि मज़दूरों ने, पंचायत मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किये।

ऑल इंडिया एग्रीकल्चर वर्कर्स यूनियन के नेता विक्रम सिंह के अनुसार, “तालाबंदी के दौरान बहुत से मज़दूर अपनी आजीविका खो चुके हैं। उनकी कठिनाइयां और भी बढ़ेंगी जब निजी कंपनियों को कृषि अर्थव्यवस्था में मुक्त हाथ से मनमानी करने की अनुमति दी जाएगी। … इन दोनों अध्यादेशों का उद्देश्य किसानों की उपज की निजी खरीद को प्रोत्साहित करना है … इससे केंद्र सरकार के दावों के विपरीत, क़ीमतों में और भी गिरावट आएगी। किसानों के पास इन बड़ी कंपनियों के साथ सौदेबाजी करने के कोई साधन नहीं हैं। इससे कृषि मज़दूरों की मज़दूरी में भी गिरावट आएगी।“

उन्होंने कहा कि “इसके अलावा, कृषि क्षेत्र को नियंत्रण मुक्त करने का क़दम ऐसे समय में आया है जब सरकार से किसानों को और भी अधिक समर्थन की ज़रूरत थी।“ विक्रम सिंह ने यह भी कहा कि “राष्ट्रव्यापी तालाबंदी 24-25 मार्च की आधी रात को लागू हुई, जिसके परिणामस्वरूप किसानों ने अप्रैल और मई के कटाई के महीनों – को खो दिया गया, क्योंकि कृषि मज़दूरों, जिनमें से बड़ी संख्या में समय-समय पर आने वाले प्रवासी हैं, उन्होंने अपने मूल स्थानों के लिए वापस लौटने का विकल्प चुना। हम सरकार से मांग करते हैं कि सरकार इन कर्मचारियों को तुरंत, 7,500 रुपये सीधा उनके बैंक खातों में नगद ट्रांसफर करे,”। ऑल इंडिया एग्रीकल्चर वर्कर्स यूनियन ने मनरेगा के तहत काम के दिनों को 100 दिन से बढ़ाकर 200 दिन करने की मांग भी की है।

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