विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने ऑन लाइन परीक्षा को आयोजित करने के एम.एच.आर.डी. के फैसले का विरोध किया

देशभर में विश्वविद्यालयों के शिक्षक और छात्र शैक्षणिक वर्ष 2019-2020 के अंत में छात्रों के लिए ऑन-लाइन परीक्षा कराने के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एम.एच.आर.डी.) के फैसले का विरोध कर रहे हैं। देश के कई शीर्ष विश्वविद्यालयों ने इस तरह से परीक्षा न करवाने की घोषणा की है। पिछले कुछ हफ्तों में कोविड-19 की वजह से लॉकडाउन के दौरान शिक्षकों और छात्रों ने बैनर और तख्तियां लेकर देश के अलग-अलग भागों में कई सारे विरोध प्रदर्शन आयोजित किये।

देशभर में विश्वविद्यालयों के शिक्षक और छात्र शैक्षणिक वर्ष 2019-2020 के अंत में छात्रों के लिए ऑन-लाइन परीक्षा कराने के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एम.एच.आर.डी.) के फैसले का विरोध कर रहे हैं। देश के कई शीर्ष विश्वविद्यालयों ने इस तरह से परीक्षा न करवाने की घोषणा की है। पिछले कुछ हफ्तों में कोविड-19 की वजह से लॉकडाउन के दौरान शिक्षकों और छात्रों ने बैनर और तख्तियां लेकर देश के अलग-अलग भागों में कई सारे विरोध प्रदर्शन आयोजित किये।

दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसियेशन (डूटा) के बैनर तले दिल्ली विश्वविद्यालय के  शिक्षकों ने विश्वविद्यालय में वार्षिक और छमाही परीक्षाओं को ऑनलाइन खुली किताब परीक्षा (ओ.बी.ई.) आयोजित करने के विश्वविद्यालय के अधिकारियों के फैसले का विरोध किया है। शिक्षकों और छात्रों के लगातार विरोध के बावजूद, शिक्षकों के प्रतिनिधित्व वाली किसी भी समिति जैसे कि शैक्षणिक या कार्यकारी परिषद में चर्चा किए बिना, विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा यह एकतरफा फैसला लिया गया है। पिछले कई महीनों से कोविड-19 की महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से छात्रों को कक्षाओं की पढ़ाई से वंचित होना पड़ा है। इसलिये ऐसी ऑनलाइन परीक्षा, देश के अलग-अलग कोनों और विविध सामाजिक-आर्थिक तबकों से आने वाले अधिकतम छात्रों के साथ अन्याय होगी। शिक्षक लगातार यही बात विश्वविद्यालय के अधिकारियों को बताते आ रहे हैं।

विभिन्न राजनीतिक संगठनों से जुड़े अधिकतम छात्रों और उनकी यूनियनों ने एम.एच.आर.डी. के इस फैसले को लेकर चिंता व्यक्त की है और इसका कड़ा विरोध किया है। यह बात साफ तौर पर डूटा द्वारा आयोजित सर्वेक्षण एवं जनमत संग्रह में बाहर निकल कर आई, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के 50,000 छात्रों में से तक़रीबन 85 प्रतिशत छात्रों ने ओ.बी.ई. के खि़लाफ़ वोट किया है। हैदराबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित सर्वेक्षण में भी ऐसे ही परिणाम बाहर निकलकर आए हैं।

शिक्षकों ने 27 मई को शिक्षा मंत्री को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने एम.एच.आर.डी. और विश्वविद्यालय अधिकारियों के फ़ैसले पर शिक्षकों और छात्रों के विरोध करने के मुख्य कारणों को सामने रखा। उन्होंने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि कई स्थानों पर स्मार्टफोन और बुनियादी इंटरनेट सुविधाओं की कमी के कारण लॉकडाउन के दौरान कुछ प्रतिशत छात्र ही ऑन-लाइन शिक्षण और ई-संसाधनों का इस्तेमाल करने में सक्षम हो पाये हैं। उन्होंने यह बात भी सामने रखी है कि स्मार्टफोन पर पढ़ाई न केवल समझ को सीमित करती है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी ख़तरनाक है। जिसके परिणाम स्वरूप 90 प्रतिशत छात्रों को लगता है कि वे परीक्षा के लिये बिल्कुल तैयार नहीं हैं।

तक़रीबन 50 प्रतिशत छात्र जो मार्च में सेमेस्टर के बाद की छुट्टियों के लिए घर गए थे, वे इस अनापेक्षित लॉकडाउन की वजह से बिना किसी तैयारी के फंस गये हैं। उनके पास न तो किताबें हैं, न ही कक्षा में पढ़ाए गए पाठों के नोट्स या कोई और ई-संसाधन और न ही उनकी व्यवस्था करने का कोई तरीक़ा। कई छात्रों की शिकायत है कि आजीविका के नुकसान, भविष्य को लेकर असुरक्षा और अनिश्चितता और समाज में फैले कोरोना वायरस की महामारी और मौतों के वजह से बढ़ रहे गंभीर तनाव का असर उन पर भी हो रहा है, जिसके चलते वे पढ़ाई में ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा कई छात्रों को स्मार्टफोन या लैपटॉप की ख़राबी, नए एप्स का इस्तेमाल करने में कठिनाइयां और हिंदी और अन्य हिंदोस्तानी भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण ई-संसाधनों की कमी का सामना करना भी पड़ रहा है।

ऑन-लाइन ओ.बी.ई. (सभी छात्रों के लिए एक ही तरह की परीक्षा) अधिकांशतः उन छात्रों के साथ भेदभाव करती है जिनके पास किताबें, नोट्स और ऑन-लाइन संसाधनों की कमी है और उन छात्रों के साथ भी जिनकी कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं। इस तथ्य को उजागर करते हुए सरकार को लिखा हुआ पत्र इस निर्णय को तुरंत वापस लेने की मांग करता है। विभिन्न शिक्षक एसोसिएशनों ने ऐलान कर दिया है कि जब तक शिक्षकों और छात्रों की मांगें पूरी नहीं होतीं वे सभी अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।

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