अधिकारों की हिफ़ाज़त में संघर्ष

स्टेशन मास्टरों का विरोध प्रदर्शन

16 जून को भारतीय रेल में काम करने वाले स्टेशन मास्टरों ने आल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (ए.आई.एस.एम.ए.) की अगुवाई में अपनी मांगों को लेकर सरकार के खि़लाफ़ सांकेतिक प्रदर्शन किया।

उनकी मांगें इस प्रकार हैं :

  • जुलाई 2021 तक रोके गये भत्तों को नियमानुसार जारी किया जाए
  • स्टेशन मास्टर्स को भी 50 लाख का बीमा कवर प्रदान किया जाए
  • स्टेशन मास्टर कैडर का निम्न स्तरीय पदों में विलय रोका जाए
  • श्रम कानूनों में श्रमिक-विरोधी संशोधन करना बंद किया जाए
  • स्टेशन मास्टर का सिग्नल व टेलिकम्युनिकेशन विभाग के साथ विलय बंद किया जाए
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बापूधाम रेलवे स्टेशन पर विरोध में स्टेशन मास्टर

उपरोक्त मांगों को लेकर ए.आई.एस.एम.ए. के आह्वान पर स्टेशन मास्टरों ने 15 जून तक प्रधानमंत्री के नाम पोस्ट कार्ड लिखकर भेजने का अभियान चलाया। 13 जून से 15 जून के बीच विरोधस्वरूप काली पट्टी बांधकर ड्यूटी की। 15 जून को काम के साथ-साथ भूख हड़ताल की।

ए.आई.एस.एम.ए. के पश्चिमोत्तर रेलवे के महासचिव शरदचंद्र पुरोहित ने बताया कि यहां के स्टेशन मास्टरों ने ‘स्टाॅप मर्जिंग एसएम एंड ईएसएम (स्टेशन मास्टर स्टेशन और विद्युत सिग्नल मेंटेनर का विलय रोको) को ट्विटर पर टैग अभियान चलाकर रेल मंत्री, रेल मंत्रलाय और रेलवे चेयरमैन को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि पश्चिमोत्तर रेलवे के चारों मंडलों में स्टेशन मास्टर के पदों का विलयन बंद करके आवश्यक नये पदों पर नियुक्ति करने के क़दम लिये जायें और ओवरटाइम का तुरंत भुगतान करवाया जाए।

विलय को लेकर स्टेशन मास्टरों का कहना है कि वे वर्तमान में भी मल्टी स्केलिंग कार्य करते हैं। स्टेशन मास्टर का सिग्नल विभाग के साथ विलय संरक्षा सुरक्षा एवं समय पालन के दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। संरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऑपरेटिंग डिपार्टमेंट एवं सिग्नल विभाग को अलग-अलग होना अति आवश्यक है।

आंदोलित स्टेशन मास्टरों का कहना है कि सरकार ने पूरी तरह से रेल को निजी क्षेत्रों को सौपने की तैयारी कर ली है। स्टेशन मास्टरों का अन्य पदों में विलय छलावा है। सरकार आने वाले दिनों में छंटनी करके रेल कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएगी।

ए.आई.एस.एम.ए. के अनुसार, आज भारतीय रेल में काम करने वाले कर्मचारियों की हालत सुरक्षा तथा आराम की दृष्टि से दुनिया में सबसे बदतर है। भारतीय रेल को विकसित करने की ज़रूरत है, लेकिन उसकी दिशा देश के लोगों के हित में होनी चाहिये। सवारियों के साथ-साथ वह भारतीय रेल में काम करने वालों के हित में भी होनी चाहिए। एक के बाद एक सरकारें इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में चल रही हैं, ए.आई.एस.एम.ए. के आंदोलनकारी नेताओं ने कहा।

कोयला उद्योग में हड़ताल की घोषणा
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18 जून को प्रदर्शन करते कोल इंडिया के श्रमिक

सरकार द्वारा कोयला उद्योग क्षेत्र का निजीकरण किए जाने के विरोध में सभी श्रमिक यूनियनें और फेडरेशनें एकजुट हैं। सरकार से उनकी मांग है कि निजी कंपनियों को कोयला खनन करने की इजाज़त देने और नवरत्न कंपनी केन्द्रीय खान नियोजन और डिजाइन संस्थान को कोल इंडिया से अलग करने के फैसले को सरकार तुंरत वापस ले।

कोयला मज़दूरों की मुख्य ट्रेड यूनियनों के मिलकर यह घोषणा की है कि तीन दिन 2-3-4 जुलाई की प्रस्तावित हड़ताल को क़ामयाब करने के लिये 16 जून को प्रथम पाली में गेट मीटिंग और विरोध सभायें आयोजित की जायेंगी। साथ ही प्रस्तावित हड़ताल को क़ामयाब करने के लिए वाल राइटिंग की जायेगी और आम लोगों का समर्थन जुटाया जाएगा।

14 जून को ट्रेड यूनियनों द्वारा उपरोक्त मांगों को लेकर केंद्र सरकार को एक ज्ञापन सौंपा गया था। ज्ञापन में कहा गया था कि यदि सरकार ने उपरोक्त फैसलों को रोकने के लिए क़दम नहीं उठाया तो आने वाली 18 जून को जिस दिन सरकार कोल ब्लाक की नीलामी करेगी उसी दिन सभी कोयला खदानों के सामने प्रदर्शन करके हड़ताल का नोटिस दिया जाएगा।

पंजाब में बिजली कर्मचारियों का प्रदर्शन

PSEB_Protest_Patiala16 जून को पंजाब के पटियाला में पीएसईबी इंप्लाइज ज्वाइंट फोरम की अगुवाई में बिजली संशोधन विधेयक-2020 को रद्द करने सहित, अन्य मांगों को लेकर सैकड़ों बिजली कर्मचारियों ने पावरकॉम के मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन किया। इसी के साथ पूरे राज्य में स्थित बिजली दफ्तरों पर धरना प्रदर्शन आयोजित किए गए।

धरने में बिजली कर्मचारियों की 19 यूनियनें शामिल हुईं, जैसे कि टेक्निकल सर्विसेस यूनियन, पीएसईबी इंप्लाइज फेडरेशन, वर्कर्स फेडरेशन इंटक, इंप्लाइज फेडरेशन पीएसईबी (मंजीत ग्रुप), कर्मचारी दल, थर्मल इंप्लाइज कोआर्डिनेशन कमेटी, हेड आफिस इंप्लाइज फेडरेशन, मिनिस्ट्रियल सर्विसेस यूनियन और पंजाब राज्य बिजली मज़दूर संघ आदि।

धरने को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि एक तरफ लोग कोविड संकट से जूझने में लगे रहे तो उधर बिजली विधेयक-2020 को लाकर सरकार ने बिजली के निजीकरण का काम और बढ़ा दिया। यह बिल न तो कर्मचारियों के हित में है और न ही अवाम के। सरकार का मक़सद निजी क्षेत्र को फ़ायदा पहुंचाना है। जन-विरोधी और मज़दूर-विरोधी बिल को सरकार कोविड-19 के संकट के बीच पारित करने में लगी हुई है। इसका जमकर विरोध हो रहा है।

बिजली कर्मचारियों ने इसके साथ-साथ, वेतन संशोधन, महंगाई भत्ता, आउट सोर्सिंग, ठेके की नौकरियों को स्थाई करने, रिक्त पदों पर नियुक्ति करने आदि से सम्बंधित अपनी लम्बे समय से चली आ रही मांगों को भी उठाया।