जस्टिस होस्बेट सुरेश के देहांत पर हम गहरा शोक व्यक्त करते हैं

मानव अधिकार और जनतांत्रिक अधिकारों के निडर समर्थक जस्टिस होस्बेट सुरेश ने 11 जून, 2020 को अंतिम सांसें लीं। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए लड़ने वाले इस अथक और बहादुर सिपाही के देहांत पर गहरा शोक व्यक्त करती है।

forgotan_citizen_Jastice_sureshजस्टिस होस्बेट सुरेश का जन्म 20 जुलाई, 1929 को कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में होसबेत्तु में हुआ था। उन्होंने मंगलोर विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि हासिल की और बेलगावी की के.एल.ई. सोसाइटी के राजा लखमनगौडा लॉ कॉलेज से एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की। केवल 24 वर्ष की आयु में उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत शुरू कर दी। साथ ही साथ वह गवर्नमेंट लॉ कॉलेज और के.सी. लॉ कॉलेज मुंबई में कानून के पार्ट-टाइम प्रोफेसर के रूप में काम करते रहे।

एक प्रतिभाशाली नौजवान होने के नाते वे मुंबई के मज़दूरों के अधिकारों के संघर्ष से बेहद प्रेरित हुए। मज़दूरों और दबे-कुचले लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त के प्रति अपने इस जूनून के चलते वे न्यायपालिका में शामिल हो गए।

1968 से 1982 के बीच वे ग्रेटर मुंबई के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एडिशनल सेशन जज), मुंबई शहर के सिविल न्यायालय और सेशन न्यायालय में अतिरिक्त मुख्य न्यायाधीश और मुंबई उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में कार्यरत रहे। 21 नवंबर, 1986 में उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला। 12 जून, 1987 को उन्हें मुंबई उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीश के रूप में मनोनीत किया गया। 19 जुलाई, 1991 को वे मुंबई उच्च न्यायालय से सेवा निवृत्त हुए।

जस्टिस सुरेश इस कहावत पर पूरा विश्वास करते थे कि “न्याय में देरी, यानी न्याय से वंचित करना है” (जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड)। न्यायाधीश बतौर उनके पूरे कार्यकाल में उन्हें मामलों का जल्दी-से-जल्दी निपटारा किये जाने के लिए जाना जाता था। वे अक्सर कहा करते थे कि किसी भी व्यक्ति की न्याय के लिए तीन बार से अधिक न्यायालय में आने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए और अपने इस विश्वास पर वह खुद पूरी तरह से अमल करते थे।

जस्टिस सुरेश एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में जाने जाते थे जिनका यह मानना था कि मज़दूर और मेहनतकश लोगों के मानव बतौर कुछ अधिकार होते हैं, और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, जैसे कि मौजूदा व्यवस्था में होता है। अपने कार्यकाल के दौरान मज़दूरों, रेड़ी-पटरी और अन्य शहरी ग़रीबों के हक़ में उन्होंने कई ऐतिहासिक फैसले सुनाये।

न्यायपालिका से सेवा निवृत्ति के तुरंत बाद उन्होंने इंडियन पीपल ह्यूमन राइट्स ट्रिब्यूनल का बीड़ा बड़े ही जोश के साथ उठाया, जिसकी स्थापना सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी.आर. कृष्णा आइयर ने की थी। इस ट्रिब्यूनल ने देश के कोने-कोने में राज्य द्वारा किये जा रहे मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं का लगातार पर्दाफाश किया। जस्टिस सुरेश और जस्टिस दाऊद ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के तुरंत बाद दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के दौरान मुंबई में आयोजित सांप्रदायिक हिंसा की जांच-पड़ताल की। केवल छः महीने के भीतर “पीपल्स वर्डिक्ट” नाम से प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में उन्होंने इस सांप्रदायिक हिंसा को आयोजित करने में प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ राज्य के अधिकारियों की गुनहगार भूमिका को साफ तौर से उजागर किया।

फरवरी 2002 में गुजरात के गोधरा काण्ड के बाद आयोजित सांप्रदायिक क़त्लेआम की खोजबीन करने के लिए जस्टिस सुरेश और जस्टिस सावंत, जस्टिस वी.आर. कृष्णा आइयर द्वारा गठित एक तथ्य खोजने के लिए गठित दल (फैक्ट फाइंडिंग टीम) का हिस्सा बतौर मार्च से अप्रैल 2002 के बीच गुजरात गए। इस दल ने लोगों के जुबानी और लिखित 2094 बयान और अनुभव दर्ज़ किये और साथ ही कई पुलिस और सरकारी अधिकारियों के साथ मुलाक़ात की। “क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी” (मानवता के ख़िलाफ़ गुनाह) के नाम से प्रकाशित उनकी रिपोर्ट में इस क़त्लेआम की योजना बनाने और उसे आयोजित करने में राज्य प्रशासन और पुलिस विभाग में सर्वोच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की भूमिका को साबित किया गया।

सांप्रदायिक हिंसा की सभी घटनाओं में राज्य पर कमान की ज़िम्मेदारी का सिद्धांत स्वीकार कराने के संघर्ष में जस्टिस सुरेश सबसे आगे की कतार में लड़ते रहे, जिसमें 1984 के सिखों का जनसंहार और 2002 में आयोजित गुजरात में मुसलमानों का जनसंहार शामिल हैं। “द प्रिवेंशन ऑफ जेनोसाइड एंड क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी एक्ट 2004” (जनसंहार और मानवता के ख़िलाफ़ गुनाह प्रतिबंध कानून 2004) का मसौदा तैयार करने में जस्टिस सुरेश ने हिस्सा लिया, जबकि उनको ऐसा कोई भ्रम नहीं था कि सरकार इस कानून को पारित करेगी। वे अच्छी तरह से जानते थे कि लोगों के एक या दूसरे तबके के ख़िलाफ़ साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल करना मौजूदा हुक्मरान वर्गों की सबसे पसंदीदा नीति है।

जस्टिस सुरेश गुनहगार राजनीतिक पार्टियों और राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया के बीच पेचीदे संबंधों को अच्छी तरह जानते थे, जिसके ज़रिये ये राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का अंत करने के लिए लोगों के हाथों में सत्ता देना सबसे ज़रूरी कार्य है। वह समझते थे कि जनतंत्र की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में बुनियादी परिवर्तन करते हुए उसकी जगह पर एक ऐसी व्यवस्था क़ायम करने की ज़रूरत है जहां राजनीतिक सत्ता लोगों के हाथों में निहित होगी और इस बात को वह हर मौके पर दोहराया करते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि केवल लोगों के हाथों में सत्ता देकर ही हिन्दोस्तान को बचाया जा सकता है और हिन्दोस्तान के लोगों को एक ऐसे संगठन की ज़रूरत है जो इस दिशा में उसकी अगुवाई करेगा। उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा ऐसे संगठन का निर्माण करने में लगायी। लोक राज संगठन के साथ वे उसके गठन के समय से जुड़ गए, जिसकी शुरुआत अप्रैल 1993 में प्रीपरेटरी कमिटी फॉर पीपल्स एम्पावरमेंट के नाम से की गयी थी। 1998 में लोक राज संगठन की स्थापना सभा में उन्हें सर्व हिन्द परिषद का सदस्य चुना गया और लोगों के हाथों में सत्ता लाने के कार्यकम को विकसित करने में उन्होंने अपनी भूमिका निभाई।

जब कभी किसी भी तबके के लोगों के अधिकारों पर हमला होता था, तो उन्हें विश्वास रहता था कि जस्टिस सुरेश उनके साथ मज़बूती से खड़े रहेंगे। मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं की छानबीन करने के लिए देश के किसी भी कोने में यात्रा के लिए वे हमेशा तैयार रहते थे। अधिक मानव अधिकारों के उल्लंघन के विभिन्न मामलों से संबंधित 40 से रिपोर्टों से उनका नाम जुड़ा हुआ है। दिसंबर 1991 में कावेरी के पानी को लेकर बेंगलुरु में आयोजित दंगों का मामला, मुंबई में झुग्गी-झोपड़ी के उजाड़े जाने का मामला, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में गड़बड़ी का मामला और कश्मीर में हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा आयोजित हिंसा का मामला, इसमें शामिल हैं। वह हमेशा इस बात पर ज़ोर देते थे कि जीवन के अधिकार में एक मानव जैसे सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है।

जस्टिस सुरेश ने अपने ज्ञान, विवेक और ज़मीन से जुड़े व्यवहार और सादगी से उन सभी लोगों को प्रेरित किया जिन्हें उनके साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में टाडा, पोटा, यू.ए.पी.ए. और सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफ्स्पा), जैसे काले कानूनों की निंदा की, जो राजकीय आतंकवाद को जायज़ करार देते है। राज्य के अलग-अलग अंगों द्वारा उनको डराने और धमकाने की कोशिशों का उन्होंने हमेशा बहादुरी के साथ सामना किया।

जस्टिस सुरेश का जीवन और उनका कार्य सदा के लिए उन सभी लोगों को अपने संघर्षों में प्रेरित करता रहेगा, जो एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते है जहां फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों में निहित होगा और सभी के लिए मानव अधिकारों और जनतांत्रिक अधिकारों की हक़ीक़त में गारंटी होगी।

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