कोयला क्षेत्र को वाणिज्यिक खनन के लिए खोले जाने का विरोध

18 जून को केंद्र सरकार ने कोयला खदानों को वाणिज्यिक खनन के लिए नीलाम करने की घोषणा की। छत्तीसगढ़, झारखंड और देश की कोयला पट्टी के अन्य राज्यों में केंद्र सरकार को इस घोषणा के लिये जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

कोयला क्षेत्र को निजी वाणिज्यिक खनन के लिए खोलने के केंद्र के फैसले के खि़लाफ़, लोगों के संगठनों के एक राज्य-स्तरीय गठबंधन, झारखंड जनाधिकार महासभा (जे.जे.एम.) ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।

18 जून को जारी एक बयान में, जे.जे.एम. ने सरकार के द्वारा इसे “आत्मनिर्भरता की पहल” कहे जाने पर कहा है कि सरकार का यह क़दम “जमीन के मालिक और ग्राम सभा से सभी मालिकी अधिकारों को छीन लेता है और प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों द्वारा लूट के लिए खोल देता है।”

अपने राज्य में लोगों के भारी विरोध के दबाव में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्रीय कोयला मंत्री से कोयला क्षेत्र में नीलामी प्रक्रिया को 6 से 9 महीने तक निलंबित करने का अनुरोध किया है।

लेकिन 18 जून को केंद्र सरकार ने एकतरफा पहल करते हुए वाणिज्यिक खनन के लिए 41 कोयला ब्लाकों की नीलामी शुरू कर दी, जिसमें झारखंड के 20 ब्लाक भी शामिल हैं। जबकि कोयला मंत्रालय के आधिकारिक बयान में दावा किया गया है कि, “इस क़दम से हिन्दोस्तान का कोयला क्षेत्र सारे बंधनों से मुक्त हो जाएगा और विकास की नयी ऊंचाइयों तक पहुंच जायेगा।” लेकिन सरकार के इस क़दम का विरोध करने वाले इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि, “देसी और विदेशी पूंजीवादी खनन कंपनियों को राज्य में खनन की खुली छूट देने से पर्यावरण और लोगों की आजीविका और अधिक नष्ट हो जाएगी।”

जे.जे.एम. के एक प्रवक्ता ने बताया कि, “ये खनन कंपनियां पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए बनाये गए कानून का सरकार के समर्थन के साथ तमाम तरीकों से उल्लंघन करती हैं। राज्य में चारों तरफ ऐसी कई खाली खदानें फैली हुई हैं जिनको खुला छोड़ दिया गया है, जिसपर किसी का दावा नहीं है। हम अपने झारखंड में यह नहीं होने देंगे।” उन्होंने यह भी बताया कि इससे पहले भी निजी कंपनियों को कुछ कोयला ब्लॉक दिए गए थे, लेकिन आदिवासी लोगों के बहादुर प्रतिरोध की वजह से वे इन खदानों में खनन शुरू नहीं कर पाए। सरकार के इन क़दमों को आदिवासी अपने जीवन और आजीविका पर सीधा हमला मानते हैं।

विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले संगठन अपने क्षेत्र में लोगों को व्यापक रूप से एकजुट कर रहे हैं। वे अपनी ग्राम सभाओं में इस क़दम के ख़िलाफ़ संकल्प पारित करने के लिए को बुलावा दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र के 9 निर्वाचित सरपंचों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नीलामी का विरोध किया है और क्षेत्र में खनन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। वे विभिन्न संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों के समक्ष प्रतिनिधिमंडल भेजन की योजना बना रहे हैं और यह मांग कर रहे हैं कि राज्य में वाणिज्यिक खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

सरकार के इस क़दम की व्यापक रूप से आलोचना की गई है क्योंकि ये निजी पूंजीवादी खनन कंपनियों के हितों के पक्ष में है, जो निजी लाभ के लिए क्षेत्र की विशाल समृद्ध खनिज संपदा की लूट करना चाहती हैं और आदिवासी और वहां रहने वाले अन्य लोगों को ग़रीबी की ओर धकेल देना चाहते हैं। इसके अलावा जिस तरह से केंद्र सरकार ने अपनी योजना की घोषणा की है, वह संसाधनों पर लोगों के अधिकारों से संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करती है, जिसे वहां के लोगों ने कई कठिनाइयों से लड़कर हासिल किए हैं।

जे.जे.एम. के बयान में कहा गया है कि यह केंद्र सरकार का यह फैसला आदिवासियों के स्वशासन के अधिकार के कई कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है। इस बयान में आगे बताया गया है कि “पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू) अधिनियम और संविधान की 5वीं अनुसूची ग्राम सभाओं की भूमिका को एक गांव के प्राथमिक निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं। … खनन किये जाने चाहिए या नहीं इस चर्चा की शुरुआत इस सवाल से होनी चाहिए, कि क्या उस क्षेत्र के लोग खनन करना चाहते हैं या नहीं … यदि लोग और ग्राम सभाएं खनन चाहते हैं, तो भूमि मालिकों या ग्राम सभाओं की सहकारी समितियों को खनन और संबंधित गतिविधियों को खुद ही करने के लिए सरकार द्वारा पूंजी और तकनीकी सहायता दी जानी चाहिए”।

प्राकृतिक संसाधनों की सामुदायिक मालिकी और कृषि भूमि या वन भूमि का उपयोग किसी भी प्रकार के खनन के लिए किए जाने के विरोध को मजबूती से दोहराते हुए, जे.जे.एम. का मानना है कि ग्राम सभाओं ने वन और वन-आधारित उत्पादों के प्रबंधन की अपनी क्षमता का प्रभावी ढंग से प्रदर्शन किया है।

बयान में आगे कहा गया है कि, “हम मांग करते हैं कि राज्य सरकार वाणिज्यिक खनन और कोयला ब्लाकों की नीलामी करने के केंद्र के फैसले के खि़लाफ़ कड़ा रुख़ अपनाए, प्राकृतिक संसाधनों और लोगों द्वारा स्वशासन के अधिकारों की रक्षा करने वाले तमाम कानूनों और विधानों को पूरी तरह से लागू करे और देश के सामने एक शोषण मुक्त विकल्प प्रस्तुत करे”।

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