लॉकडाउन ने नौकरियों और आजीविका का भयंकर संकट पैदा किया है

25 मार्च से देशभर में लॉकडाउन लागू किया गया था, उस समय से बड़े पैमाने पर मज़दूरों की नौकरियां छिन गयी हैं। इसमें बड़े उद्योगों और सेवाएं प्रदान करने वाली बड़ी कंपनियों के मज़दूर, छोटी फैक्ट्रियों, दुकानों और अन्य सैकड़ों छोटे उद्योगों में काम करने वाले मज़दूर शामिल हैं। बड़े पैमाने पर मज़दूरों को अप्रैल और मई का वेतन नहीं दिया गया है और यहां तक कि लॉकडाउन से पहले किये गए काम का भुगतान भी नहीं किया गया है। बड़े उद्योगों और सेवा कंपनियों में काम करने वाले बेहद कम मज़दूरों को वेतन तो दिया गया है लेकिन उसमें भी काफी कटौती की गयी है। अधिकांश बड़ी कंपनियों ने वर्ष 2020-21 के लिए वेतन में बढ़ोतरी को रोक दिया गया है। अधिकांश मज़दूरों के लिए पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष के वेतन में गिरावट आएगी।

graph_unemployment_hindiलॉकडाउन की वजह से उद्योग-धंधों के बंद हो जाने की वजह से बेरोज़गारी किस स्तर तक पहुंच गयी है, इसका कोई भी अनुमान सरकार ने अभी तक जारी नहीं किया है। जून 2019 में आधिकारिक रूप से जारी पिछले आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पी.ई.एफ.एस.) के अनुसार जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच बेरोज़गारी की दर 6.1 प्रतिशत थी। यह पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक दर थी।

निजी संस्थाओं द्वारा किये गए सर्वेक्षणों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान बेरोज़गारी की दर बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी थी। सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सी.एम.आई.ई.) के अनुसार अप्रैल और मई 2020 के दौरान बेरोज़गारी के दर 23.5 प्रतिशत तक पहुंच चुकी थी, जो कि जनवरी 2020 में 7.2 प्रतिशत थी।

सी.एम.आई.ई. के सर्वे के अनुसार लॉकडाउन के वजह से अप्रैल 2020 के अंत तक 11.4 करोड़ मज़दूर अपना रोज़गार खो चुके थे। लॉकडाउन के पहले दो सप्ताह में 5 करोड़ मज़दूर किसी भी तरह के रोज़गार के बगैर जीने को मजबूर हो गए थे।

शहरी बेरोज़गारी की दर ग्रामीण बेरोज़गारी की दर से बहुत अधिक थी और अप्रैल की शुरुआत में 30.9 प्रतिशत तक पहुंच चुकी थी।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक सर्वे में यह देखा गया कि लॉकडाउन के दौरान दो-तिहाई मज़दूरों का रोज़गार छिन गया था। आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, और पश्चिम बंगाल में आयोजित किये गए इस सर्वे में यह देखने में आया कि शहरी इलाकों में 80 प्रतिशत मज़दूरों के रोज़गार छिन गए थे। ग्रामीण इलाकों में 60 प्रतिशत मज़दूर बेरोज़गार हो गए थे।

graph_unemployment_2_hindiशहरी इलाकों में सबसे बुरा हाल स्व-रोज़गार करने वाले मज़दूरों का था, जिनमें से 84 प्रतिशत लोगों के रोज़गार के साधन छिन गये थे। उनकी तुलना में 76 प्रतिशत वेतनभोगी मज़दूर और 81 प्रतिशत ठेका मज़दूर बेरोज़गार हो गए थे। किसी तरह के औपचारिक अनुबंध के बगैर काम करने वाले मज़दूर, दिहाड़ी मज़दूर, छोटी कंपनियों के मज़दूर, और स्व-रोजगार करने वाले मज़दूरों का सबसे बुरा हाल हुआ है। दरअसल पिछले काफी समय से रोज़गार की हालत बहुत खस्ता चल रही है। एक बड़ी रिटेल श्रृंखला में काम करने वाले एक मज़दूर ने बताया “मेरे पास कोई रोज़गार नहीं है, न ही कोई बचत या पैसे हैं”, देश के कोने-कोने से यही बात सुनाई दे रही है।

इस संकट का सबसे अधिक बोझ रोज़ कमाकर खाने वाले करोड़ों प्रवासी मज़दूरों को झेलना पड़ा है। शहरों में अपने कमरों का किराया देने और दो वक्त की रोटी जुटाने में असमर्थ होने के कारण और लॉकडाउन की वजह से सार्वजनिक यातायात पूरी तरह से बंद हो जाने की वजह से ये मज़दूर अपने परिवारों के साथ सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर पैदल चलकर या जो भी साधन मिले उससे अपने गांवों को लौटने के लिए मजबूर हो गए।

सी.एम.आई.ई. के द्वारा इकट्ठा की गयी जानकारी के अनुसार जून के महीने में देश के अधिकांश हिस्सों से लॉकडाउन हटाये जाने के बावजूद 7 जून के सप्ताह में बेरोज़गारी 17 प्रतिशत से अधिक थी।

होटल, रेस्टोरेंट, बड़े रिटेल और मॉल सहित सिनेमा, मनोरंजन और अंतर्राट्रीय उड़ानें अभी तक बंद हैं और इन क्षेत्रों में बहुत बड़े स्तर पर नौकरियां गयी हैं। आतिथ्य और पर्यटन, उड्डयन और रिटेल व्यापार क्षेत्र में कुल मिलाकर 5.25 करोड़ नौकरियां ख़त्म होने का अंदाजा लगाया जा रहा है। (देखें बॉक्स-1)

कोरोना वायरस के संकट ने निर्यात क्षेत्र पूरी तरह से विकलांग हो गया है। जैसे-जैसे दुनियाभर के तमाम देशों ने इस वायरस से लड़ने के लिए अपनी सीमाओं को बंद करना शुरू किया हिन्दोस्तान से होने वाली वस्तुओं के निर्यात में 34.6 प्रतिशत की रिकॉर्ड गिरावट आई है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाईजेशन का अनुमान है कि निर्यात क्षेत्र में काम करने वाले 1.5 करोड़ मज़दूरों की नौकरी जा सकती है। कपड़ा, हीरे-जवाहरात, हस्तकला और इंजीनियरिंग की वस्तुएं, ये सभी उत्पाद निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर हैं। केवल कपड़ा निर्यात क्षेत्र में ही 25-30 लाख मज़दूरों की नौकरी जाने का अनुमान लगाया जा रहा है।

आमदनी और वेतन में गिरावट की वजह से लोग गैर-ज़रूरी उपभोग के सामान की ख़रीदारी को घटाने को करने को मजबूर हो गए हैं। इसकी वजह से कपड़ा, उपभोग का सामान, मोटर वाहन, रियल एस्टेट, इत्यादि की मांग में भारी गिरावट आई है। कपड़ा, मोटर-वाहन, रियल एस्टेट इन क्षेत्रों में ही 2 करोड़ मज़दूरों की नौकरियां जा सकती हैं। (देखें बॉक्स-2)

आई.टी. क्षेत्र जिसमें आई.टी., आई.टी.ई.एस. और बी.पी.ओ. सेवाएं शामिल हैं, जो 45-50 लाख कुशल मज़दूरों को रोज़गार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। इस क्षेत्र में भी आई.टी. मज़दूरों को बड़े पैमाने पर नौकरियों से निकला जा रहा है। अगले तीन से पांच महीनों में इस क्षेत्र से 1.5 लाख आई.टी. मज़दूरों को नौकरी से निकाले जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसमें से अधिकांश नौकरियां छोटी आई.टी. और बी.पी.ओ. कंपनियों से खत्म होने जा रही हैं और यह सिलसिला शुरू हो चुका है।

स्टार्ट-अप कंपनियों से भी कई मज़दूरों की छंटनी शुरू हो गयी है। गिग-अर्थव्यवस्था (देहाड़ी) में मज़दूरों की मांग में भारी गिरावट आई है और इन मज़दूरों के पास आमदनी का और कोई साधन नहीं है। कई मीडिया समूह जिसमें टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस भी शामिल हैं, इन मीडिया कंपनियों में भी मज़दूरों को निकाला जा रहा है या फिर बिना वेतन के छुट्टी पर जाने को कहा जा रहा है। (देखें बॉक्स-3)

कई बड़ी पूंजीवादी कंपनियां इस संकट का इस्तेमाल मज़दूरों की छंटनी करने और अपनी कंपनी का “सही-आकार” बनाने के लिए कर रही हैं। ऐसा करते हुए ये कंपनियां अपना काम आउटसोर्स करने और बाकी बचे मज़दूरों से अधिक से अधिक काम कराने के रास्ते पर चल रही हैं। सी.आई.आई. द्वारा कंपनियों के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ किये गए एक सर्वे से यह पता चला है कि इनमें से आधी कंपनियां मज़दूरों की संख्या को कम करने की योजना बना रही हैं; और एक तिहाई कंपनियां 15-30 प्रतिशत तक मज़दूरों की कटौती करने का विचार कर रही हैं।

जिन कंपनियों ने पिछले वर्ष बड़े मुनाफ़े कमाये थे वे कंपनियां इस महामारी के चलते अर्थव्यवस्था में आई मंदी का बहाना बनाकर मज़दूरों की छंटनी को जायज़ करार दे रही हैं। इसकी शुरुआत सरकार ने ही की थी, जब उसने मज़दूरों को मिलने वाले महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी को रोकने का ऐलान किया था, जबकि 2020-21 में दी जाने वाली बढ़ोतरी का फैसला महामारी आने से पहले से ही लिया जा चुका था। केंद्र सरकार के इस फैसले से केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनधारकों को केवल 2020-21 के दौरान 37,530 करोड़ रुपयों और राज्य सरकार के कर्मचारी और पेंशन धारकों को 82,566 करोड़ रुपयों से वंचित किया जायेगा!

देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों और उनकी कंपनियों ने वेतन में कटौती करने और मौजूदा वेतन में बढ़ोतरी पर रोक लगाने की घोषणा की है। देश की सबसे अधिक मुनाफेदार बड़ी निजी कंपनियों में से एक, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने वेतन में 10-50 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है। देश में आई.टी. क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस सहित सभी प्रमुख आई.टी. कंपनियों ने ऐलान किया है कि इस वर्ष वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। आई.टी. मज़दूरों की कुल आमदनी में बोनस और इंसेंटिव का बड़ा हिस्सा होता है और वेतन में कटौती की वजह से उनकी कुल आमदनी में प्रत्यक्ष गिरावट आएगी। हिन्दोस्तान में आई.टी. क्षेत्र में 45-50 लाख कर्मचारी काम करते हैं।

देश में बेरोज़गारी में फौरी तौर पर जो भारी बढ़ोतरी हुई है, इसका कारण कोविड -19 महामारी की वजह से लगाया गया लॉकडाउन है। पूंजीपति, फिर वे चाहे इजारेदार कंपनियां हों या फिर मंझोले से लेकर छोटे पूंजीपति हों, कोई भी पूंजीपति अपने मज़दूरों के लिए रोज़गार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी नहीं उठा रहा है।

मौजूदा बेरोज़गारी और लाखों करोड़ों मज़दूरों की खस्ता हालत, जो कि लॉकडाउन की वजह से और भी बदतर हो गयी है, इसकी जड़ इस पूंजीवादी व्यवस्था में और इस राज्य में है जो इस व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है।

लाखों करोड़ों मज़दूरों के श्रम के बगैर अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्र या समाज नहीं चल सकता। वह केवल मज़दूरों का श्रम ही है जो प्रकृति पर काम करते हुए समाज की तमाम संपत्ति पैदा करता है। लेकिन यह पूंजीवादी व्यवस्था मज़दूरों के ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती। इसकी वजह यह है कि इस व्यवस्था में उत्पादन के साधन पूंजीपतियों के हाथों में हैं। जो इन उत्पादन के साधनों का मालिक है और उसको नियंत्रित करता है, वही अर्थव्यवस्था की दिशा तय करता है। आज हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था को इजारेदार पूंजीपतियों की अधिकतम मुनाफ़ों की अमिट भूख को मिटाने की दिशा में चलाया जा रहा है।

अर्थव्यवस्था की दिशा को इजारेदार पूंजीपतियों की अधिकतम मुनाफ़ों की अमिट भूख को मिटाने की दिशा से मोड़कर सभी इंसानों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाने की ज़रूरत है। इसके लिए मज़दूर वर्ग को सभी प्रमुख उत्पादन के साधनों को पूंजीपति वर्ग के हाथों से छीनकर सामाजिक नियंत्रण में लाने की ज़रूरत है। ऐसी व्यवस्था में मज़दूरों को उत्पादन प्रक्रिया में एक और “खर्च” नहीं समझा जायेगा जिसे पूंजीपति मालिक के निजी मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए “कम करने” की ज़रूरत है। बल्कि ऐसी व्यवस्था में उत्पादन का लक्ष्य सभी मज़दूरों और किसानों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना होगा।

पूंजीवाद न तो सभी के लिए सामाजिक तौर पर ज़रूरी रोज़गार दे सकता है और न ही कभी ऐसा हुआ है। रोज़गार के इस संकट का हल केवल उस समय हो पायेगा जब मौजूदा व्यवस्था की जगह पर एक ऐसी व्यवस्था क़ायम की जाएगी जहां सभी के लिए सुरक्षा और सम्मान का जीवन सुनिश्चित किया जायेगा। एक ऐसी व्यवस्था को क़ायम करने के लिए मज़दूरों और सभी मेहनतकशों को संघर्ष करना होगा।

बॉक्स-1

आतिथ्य, उड्डयन और खुदरा व्यापार में नौकरियों की कटौती

आतिथ्य एवं पर्यटन उद्योग: 3.8 करोड़ मज़दूरों में से 70 प्रतिशत मज़दूरों की नौकरी जाने की संभावना (फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया का अनुमान)

उड्डन क्षेत्र : इस क्षेत्र में 20 लाख नौकरियां जाने का ख़तरा है (इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का अनुमान)।

स्पाइस जेट और गो-एयर जैसी अंतर्देशीय विमान कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को बिना-वेतन के छुट्टी पर जाने के लिए कहा है और विदेशी पायलटों को नौकरी से निकाल दिया है। इंडिगो जैसी कई विमान कंपनियों ने अपने वरिष्ठ और उच्चतम मैनेजरों के वेतनों में कटौती की घोषणा की है।

खुदरा व्यापार : इस क्षेत्र में 1.25 करोड़ मज़दूरों की नौकरी जाने का ख़तरा है। यह मज़दूरों की कुल संख्या का 25 प्रतिशत है। मॉल और उनके अंदर चलने वाली दुकानों के बंद हो जाने से गैर-ज़रूरी सामान बेचने वाली दुकानों के मज़दूरों के पास कोई काम नहीं है।

 

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कपड़ा, मोटर वाहन, रियल एस्टेट उद्योग

कपड़ा क्षेत्र : 1 करोड़ मज़दूरों की नौकरियां जाने की संभावना है (क्लॉथ मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया का अनुमान)

मोटर वाहन उद्योग : अर्ध-कुशल मज़दूर तथा सेल्स और डीलर नेटवर्क से जुड़े 10 लाख कर्मचारियों की नौकरियां जाने का ख़तरा है।

मोटर वाहन पुर्जा उद्योग: इस क्षेत्र में 50 लाख मज़दूर काम करते हैं। मांग में कमी की वजह से 20 लाख मज़दूरों की नौकरियां जा सकती हैं।

रियल एस्टेट क्षेत्र : कृषि के बाद रोज़गार का यह सबसे बड़ा स्रोत है। रियल एस्टेट क्षेत्र में मांग पर संबंधित क्षेत्र के 250 अन्य उद्योग निर्भर करते हैं। यह क्षेत्र देशभर के प्रवासी मज़दूरों के लिए रोज़गार का सबसे बड़ा स्रोत है। पिछले दो वर्षों में मंदी के चलते पहले ही एक लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां ख़त्म हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में इस वर्ष मांग 15-20 प्रतिशत तक कम होने का अनुमान है, जिससे इस क्षेत्र से जुड़े निर्माण और औद्योगिक रोज़गार पर बहुत बड़ा असर होने वाला है।

 

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आई.टी. और मीडिया क्षेत्र

इस क्षेत्र की 75 प्रतिशत आमदनी उत्तरी अमरीका और यूरोप के बड़े बाज़ारों में निर्यात से आती है। इन देशों में भी कोरोना वायरस की वजह से मंदी आ गयी है, जिसका सीधा असर हिन्दोस्तान के आई.टी. उद्योग पर पड़ेगा। सैकड़ों आई.टी. कर्मचारियों को जुलाई तक बिना-वेतन की छुट्टी पर जाने को कहा जा रहा है और कुछ कंपनियों में इससे भी बूरे हालात हैं। जिन आई.टी. मज़दूरों के पास कोई प्रोजेक्ट नहीं हैं या जो बेंच पर बैठे हैं, उनकी नौकरी पर भारी ख़तरा मंडरा रहा है।

कॉग्निजेंट टेक्नोलॉजी सलूशन : “उन्होंने मुझे दो विकल्प दिए – या तो छुट्टी सहित तीन महीने का वेतन लेकर कंपनी छोड़ दो या फिर एक महीने के लिए बिना प्रोजेक्ट के बेंच पर बैठो। इसमें दुविधा यह है कि यदि एक महीने में कोई प्रोजेक्ट नहीं आता है तो मुझे बिना किसी मुआवजे़ के नौकरी छोड़नी पड़ेगी। 31 मई से 2 जून के बीच 700 अन्य कर्मचारियों को इसी तरह से नौकरी से इस्तीफा देने के लिए कहा गया है। असली आंकड़े इससे भी ज्यादा हो सकते है।” (एक आई.टी. मज़दूर का बयान)

हेक्सावेयर : मई, जून और जुलाई के लिए बेंच पर बिठाये गए आई.टी. मज़दूरों को कोई वेतन नहीं दिया गया। जो मज़दूर जुलाई के बाद भी बेंच पर रहेंगे उन्हें नौकरी से निकाल दिया जायेगा (कंपनी का जुबानी बयान)।

फेयरपोर्टल : केवल दो घंटे का नोटिस देकर 300 आई.टी. मज़दूरों को नौकरी से इस्तीफा देने के लिए कहा गया। (पर्यटन उद्योग में काम करने वाली एक आई.टी.ई.एस. कंपनी)

मज़दूरों की छंटनी :

उबेर: 500-700 मज़दूर ; ओला-करीब 1400 मज़दूर, जोमाटो: 520 मज़दूर, स्विगी: 1100 मज़दूर, शेयरचैट (विडियो शेयरिंग सोशल नेटवर्किंग सर्विस): 101 मज़दूर, वीवर्क (एक कमर्शियल रियल एस्टेट के लिए शेयर्ड ऑफिस): 100 मज़दूर, क्यूरफिट (फिटनेस श्रृंखला): 1000 मज़दूर, मीशो (सोशल कॉमर्स स्टार्ट-अप): 200 मज़दूर, बाउंस (स्कूटर रेंटल स्टार्ट-अप): 100 मज़दूर, एक्को (बीमा स्टार्ट-अप): 50 मज़दूर।

मीडिया: टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवार सप्लीमेंट में काम करे वाले 8 में से 3 कर्मचारियों को 14 अप्रैल से निकाल दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रिंट प्रकाशन से जुड़े कुछ कर्मचारियों को नौकरी से इस्तीफा देने के लिए कहा गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सभी स्तरों पर वेतन में कटौती करने का फैसला लिया है।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने कर्मचरियों को “कुछ समय के लिए वेतन में कटौती” मंजूर करने के लिए कहा है।

न्यूज वेबसाइट क्विंट ने अपने 45 कर्मचारियों को अनिश्चित समय के लिए बिना वेतन के छुट्टी पर जाने के लिए कहा है।

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