वेस्ट बैंक और जॉर्डन की घाटी पर इस्राईल के कब्ज़े का विरोध करें!

1 जुलाई, 2020 को फिलिस्तीन के प्रतिरोधी योद्धाओं और दुनियाभर में फैले उनके समर्थकों ने फिलिस्तीनी ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर इस्राईल द्वारा किये गये कब्ज़े और उस ज़मीन के हड़पे जाने के ख़िलाफ़ “रोष दिवस” (डे ऑफ रेज) घोषित किया। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार ये इलाके फिलिस्तीनी लोगों के हैं, लेकिन पिछले कई दशकों से इस्राईल ने इन पर जबरदस्ती से अपना कब्ज़ा जमा रखा है। 1 जुलाई से पहले के सप्ताहों में और उसके बाद भी इस पूरे इलाके में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए। इसके अलावा यूरोप, अमरीका, कनाडा और दुनियाभर में कई अन्य देशों में भी इस्राईल द्वारा इन इलाकों को हड़पने की निंदा करते हुए विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए।

1 जुलाई, 2020 को गाज़ा में 1 लाख लोगों का जुलूस

हालांकि इस्राईल की सरकार के नेताओं ने जॉर्डन की घाटी और वेस्ट बैंक के 30 प्रतिशत हिस्से पर औपचारिक तौर से कब्ज़ा करने के लिए 1 जुलाई, 2020 की तारीख की घोषण की थी, लेकिन फिलिस्तीनी लोगों के बहादुर प्रतिरोध के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जनवरी 2020 को घोषित किये गए फिलिस्तीन-विरोधी सौदे “डील ऑफ द सेंचुरी” को स्वीकार करने के लिए फिलिस्तीनी लोगों और उनके प्रतिनिधियों पर बहुत दबाव डाला जा रहा है। वेस्ट बैंक, ग़ाज़ा और दुनियाभर में बसे फिलिस्तीनी लोग और उनके साथ-साथ दुनियाभर के प्रगतिशील और अमन पसंद लोग, अपनी जन्मभूमि पर अधिकार हासिल करने की फिलिस्तीनी लोगों को आकांक्षा को पूरी तरह से ख़त्म करने की अमरीकी-इस्राइली योजना को ठुकराने के लिए हर रोज़ सड़कों पर उतर रहे हैं।

यदि इस्राईल जॉर्डन घाटी को हड़पने में क़ामयाब हो जाता है तो फिलिस्तीनी प्राधिकरण जॉर्डन नदी से कट जायेगा, जो मौजूदा समय में फिलिस्तीनी प्राधिकरण और जॉर्डन को बांटती है। ऐसा करने से यह इलाका सभी दिशाओं से इस्राईल से घिर जायेगा। यदि ऐसा होता है तो फिलिस्तीनी लोगों द्वारा अपना खुद का राज्य स्थापित करने का सपना एक मज़ाक बनकर रह जायेगा। रोज़ आयोजित किये जा रहे अपने प्रदर्शनों से वेस्ट बैंक, ग़ाज़ा और दुनियाभर में बसे फिलिस्तीनी लोगों ने ऐलान कर दिया है कि वे अपने लिए एक संप्रभु राष्ट्र बनाने के अधिकार का त्याग कभी नहीं करेंगे।

3 जुलाई, 2020, असिराह अल्शामलिया गांव में विरोध प्रदर्शन। कुछ ही दिन पहले जबरदस्ती बसाये गए इस्राइली लोगों ने इस्राइली सेना की सुरक्षा में इस गांव में एक गैरकानूनी बस्तीवादी चैकी खड़ी की है।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतेन्याहू द्वारा घोषित की गयी “डील ऑफ द सेंचुरी” पूरी तरह से फिलिस्तीन-विरोधी योजना है। यह योजना फिलिस्तीनी लोगों और दुनियाभर के लोगों से यह मांग करती है कि 1948 से आज तक इस्राईल ने फिलिस्तीनी ज़मीन पर जो कब्ज़ा किया हुआ है उसे जायज़़ मान लिया जाये। यह योजना मांग करती है कि फिलिस्तीनी लोग अपनी मातृभूमि के लिए किये जा रहे संघर्ष को त्याग दें। यह योजना यह मांग करती है कि फिलिस्तीनी लोग अपनी मातृभूमि की ज़मीन पर अपने अधिकार को छोड़ दें, जिस अधिकार को दुनियाभर के लोगों ने माना है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय कानून ने मान्यता दी है, और संयुक्त राष्ट्र संघ अपने फ़ैसल में हर साल जिसकी पुष्टि करता आया है। यह “डील” (सौदा) फिलिस्तीनी लोगों और दुनियाभर के लोगों से यह मांग करता है कि वे इस्राईल और अमरीका द्वारा किये गए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन और फिलिस्तीनी लोगों के विरूद्ध किये गए गुनाहों के लिए, इन दोनों देशों के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी कार्यवाही की मांग न करें।

यह “डील ऑफ द सेंचुरी” कहे जाने वाला सौदा जाऊनवादी इस्राईल को वेस्ट बैंक पर बस्तीवादी कब्ज़़ा करने को खुले तौर से उकसाता है। यह सौदा अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा इस्राईली जाऊनवादियों को लंबे समय से दिए जा रहे समर्थन को और भी मजबूत करता है। इस सौदे का चरित्र इस क़दर फिलिस्तीन-विरोधी है कि यूरोपीय यूनियन के देशों सहित दुनियाभर के कई देश इस सौदे की खुली निंदा करने के लिए मजबूर हो गए हैं।

फिलिस्तीनी लोगों ने अपने लिए एक राष्ट्र और लोग बतौर मान्यता हासिल करने के अपने बहादुर संघर्ष को कभी भी कमज़ोर नहीं होने दिया है।

दक्षिण कोरिया

प्रथम विश्व युद्ध से पहले फिलिस्तीनी लोगों की ज़मीन तुर्की साम्राज्य के नियंत्रण में थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में ब्रिटेन ने “यहूदियों के लिए फिलिस्तीन में राष्ट्रीय घर बनाने” के अपने साम्राज्यवादी मंसूबे का ऐलान किया था। प्रथम विश्व युद्ध में जब तुर्की की हार हो गई तब बर्तानवियों ने फिलिस्तीनी ज़मीन को अपने नियंत्रण में लिया था। बर्तानवी साम्राज्यवादियों ने यूरोप में बसे यहूदियों को फिलिस्तीन की ज़मीन की ओर पलायन करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिनपर यूरोप के देशों में अत्याचार होता था। उन्होंने इन यहूदी आप्रवासियों और फिलिस्तीनी लोगों को एक दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काया और यहूदी आप्रवासियों को फिलिस्तीनियों की ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए उकसाया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन नाज़ियों द्वारा किये गये यहूदियों के जनसंहार की वजह से, यूरोप में ज़िंदा बचे यहूदी लोगों के प्रति दुनियाभर के लोगों में बहुत सहानुभूति पैदा हुई। ऐसे समय में जब फिलिस्तीन पर बर्तानवी हुकूमत ख़त्म होने जा रही थी, बर्तानवी साम्राज्यवादियों ने धर्म के आधार पर फिलिस्तीन का खूनी बंटवारा आयोजित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दो राज्यों – इस्राईल और फिलिस्तीन के गठन को मंजूरी दी। इस्राइली राज्य का गठन हुआ, लेकिन फिलिस्तीनी राज्य का गठन नहीं होने दिया गया।

14 मई, 1948 को इस्राइली राज्य के गठन की घोषणा की गयी। इसके तुरंत बाद इस्राइल ने उस ज़मीन पर हमला कर दिया जिसे बंटवारे के बाद फिलिस्तीनी राज्य के गठन के लिए निर्धारित किया गया था। उस ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर इस्राइल ने कब्ज़ा कर लिया और लाखों फिलिस्तीनी लोगों को अपने वतन को छोड़कर भागना पड़ा। बाकी की फिलिस्तीनी ज़मीन जो जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे पर थी, उस पर जॉर्डन ने कब्ज़ा कर लिया, जिसे वेस्ट बैंक कहा जाता है। उस समय से हर साल दुनियाभर के फिलिस्तीनी लोग 15 मई को नकबा दिन – “तबाही का दिन” के रूप में याद करते हैं, जिस दिन उन्हें अपने वतन से बेदख़ल किया गया था।

न्यूयॉर्क

इस हमले और कब्ज़े के दौरान अपना घर छोड़कर भागने को मजबूर फिलिस्तीनी लोगों को अपने घर वापस आने और अपनी संपत्ति पर अधिकार जताने से रोकने के लिए इस्राइल की पहली सरकार ने तुरंत कई कानून पारित किये। उस दिन से आज तक उनमें से कई लोग और उनके वंशज शरणार्थी बनकर जी रहे हैं!

आज दुनियाभर में करीब 1 करोड़ 30 लाख फिलिस्तीनी लोग हैं। इनमें से 30 लाख वेस्ट बैंक और पूर्वी येरुशलम में हैं, 20 लाख ग़ाज़ा पट्टी में और 19 लाख ऐसे लोग हैं जो इस्राइल के नागरिक हैं। 56 लाख फिलिस्तीनी लोग अरब के अलग-अलग देशों में बसे हैं और बाकी दुनिया के अन्य देशों में बसे हुए हैं। करीब 15 लाख फिलिस्तीनी लोग आज भी 58 शरणार्थी कैम्पों में रहने को मजबूर हैं।

एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस्राइल को पूरी तरह से हथियारों से लैस किया है। इस्राइल दुनिया में सबसे अधिक सैनिकृत देश है जो फिलिस्तीनी और अन्य अरब लोगों की कनपटी पर अमरीकी पिस्तौल का काम करता है। जबसे इस्राइल का गठन हुआ है, तब से उसने एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवाद के सहयोग से फिलिस्तीनी लोगों की ज़मीन को हड़पने और उसे अपने उपनिवेश में बदलने का काम करता आया है। 1967 में इस्राइल ने फिलिस्तीनियों की ज़मीन वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा, सिरिया और यूनान इन देशों की ज़मीन पर हमला करके कब्ज़ा किया है।

लन्दन 4 जुलाई, 2020

इस्राइल वर्ष 2002 से 700 किलोमीटर लंबी दीवार का निर्माण कर रहा है। इस दीवार का 85 प्रतिशत हिस्सा वेस्ट बैंक में आता है और इस दीवार को जिस तरह से बनाया जा रहा है, उससे यह फिलिस्तीनी ज़मीन स्थायी तौर पर इस्राइल का हिस्सा बन जाएगी। इस दीवार की वजह से इस इलाके में फिलिस्तीनी लोगों की मुक्त आवाजाही में बाधा होती है। इसके अलावा पूरे वेस्ट बैंक में रास्तों के बीच में 700 से अधिक रुकावटें खड़ी की गयी हैं जिसमें 140 चेक पोस्ट शामिल हैं। ये चेक पोस्ट फिलिस्तीनी लोगों की आवाजाही में बाधा डालते है। करीब 70,000 फिलिस्तीनी लोग जिनके पास इस्राइली वर्क परमिट है, उन्हें हर रोज़ इन चेक पोस्टों से गुजरना पड़ता है।

इस्राइल की सरकार खुद फिलिस्तीनी लोगों की ज़मीन को हड़पने और उन पर यहूदियों को जबरदस्ती “बसाने” के लिए उकसाती रहती है। इस समय वेस्ट बैंक और पूर्वी येरुशलम में कम से कम 250 बस्तियों (130 अधिकारिक और 120 गैर-कानूनी) में 6 लाख यहूदी लोगों को बसाया गया है। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार ये सभी बस्तियां गैर-कानूनी हैं, क्योंकि यह चैथे जिनेवा कन्वेंशन की उन शर्तों का उल्लंघन करती हैं, जो कब्ज़ाकारी देश को उसके द्वारा कब्ज़ा किये हुए इलाके में अपने देश की आबादी को बसाने पर प्रतिबंध लगाता है। लेकिन इस्राइल ने बड़ी बेशर्मी से तमाम अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया है, जिसमें अमरीका का पूरा सहयोग उसे हासिल है। 2019 में अमरीका ने ऐलान किया कि फिलिस्तीनी लोगों की ज़मीन पर यहूदियों की जो बस्तियां बसाई गयी हैं, “ज़रूरी नहीं कि वे गैर-कानूनी हों”। ऐसा करते हुए अमरीका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो इस तरह की सार्वजनिक भूमिका लेता है।

रामाल्ल्हा 1 जुलाई, 2020

तमाम कठिनाइयों के बावजूद आज़ाद लोगों के रूप में खुद की पहचान क़ायम करने का फिलिस्तीनी लोगों का संघर्ष न तो कभी रुका है और न ही भटका है। वे चाहे सबसे दयनीय हालत में शरणार्थी कैम्पों में रहते हों या इस्राइल के भीतर सबसे दमनकारी हालत में या फिर अपने वतन से दूर किसी अन्य देश में।

अमरीका के समर्थन के साथ इसाइल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों की ज़मीन पर गैर-कानूनी कब्ज़ा करने की योजना की कड़ी निंदा की जानी चाहिए। ऐसी हालत में हिन्दोस्तान के लोगों को फिलिस्तीनी लोगों और उनके बहादुर संघर्ष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की ज़रूरत है, जो अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं।

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