रूस में अक्तूबर क्रांति के 100 वर्ष :

रूस में अक्तूबर क्रांति के 100 वर्ष :

जुलाई के विद्रोह के बाद अस्थायी सरकार द्वारा रूस के क्रांतिकारी लोगों पर प्रति-क्रांतिकारी दमन के बीच, बोल्शेविक पार्टी ने अपनी 6ठी कांग्रेस को गुप्त रूप से आयोजित किया (मज़दूर एकता लहर, 1-15 अगस्त, 2017 का अंक देखें)। कांग्रेस ने हथियारों के बल पर अस्थायी सरकार का तख्ता पलट करने और राज्य सत्ता को सर्वहारा द्वारा अपने हाथों में लेने की तैयारी की ज़रूरत को सीधे अपने एजेंडे पर रखा।

इस बीच, रूसी सरमायदार वर्ग ने जुलाई के दिनों में सारी सत्ता अपने हाथों में ले ली तथा कमजोर हो गई सोवियतों को नष्ट करने और खुलेआम प्रति-क्रांतिकारी तानाशाही की स्थापित करने की तैयारी शुरू कर दी। पूंजीपतियों के प्रतिनिधियों ने सोवियतों को “मरा हुआ” घोषित कर दिया और जंग के लिये सीमा पर तैनात बाग़ी सिपाहियों से बदला लेने के लिए उनको कठोर कोर्ट-मार्शल द्वारा बड़े पैमाने पर मौत के घाट उतार दिया। 3 अगस्त, 1917 को सेना-प्रमुख जनरल कार्निलोव ने सरहद पर मौत की सज़ा देने की प्रथा को फिर से शुरू करने की मांग की।

अस्थायी सरकार ने सरमायदारी और जमींदारी शक्तियों को लामबंध करने के लिए, 12 अगस्त को राज्य परिषद की बैठक आयोजित की। इस परिषद में मुख्य तौर से जमींदारों, सरमायदारों, सेना के जनरलों, अधिकारियों और कोसैकों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। मेंशेविकों और सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरियों ने सोवियतों का प्रतिनिधित्व किया। सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरी करेंस्की जो कि अस्थायी सरकार का नेतृत्व कर रहा था, उसने बड़ी अकड़ के साथ क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने की धमकी दी और जनरल कार्निलोव ने सोवियतों को खत्म करने की मांग की। क्रांति को कुचलने के लिये किये गये उसके विद्रोह में, जनरल कोर्निलोव को रूसी सरमायदारों और जमींदारों के साथ-साथ ब्रिटेन और फ्रांस का खुलेआम समर्थन मिला तथा इसके लिये उसे वित्तीय सहायता भी मिली थी।

राज्य परिषद के बुलाये जाने के विरोध में, उससे एक दिन पहले ही बोल्शेविकों ने मॉस्को में आम हड़ताल का ऐलान किया, जिसमें अधिकांश मज़दूरों ने हिस्सा लिया। कई अन्य शहरों में भी हड़तालें आयोजित की गयीं।

कोर्निलोव ने क्रांति को कुचलने के लिये खुलकर तैयारी की। उसने अफवाह फैलाई कि बोल्शेविक 27 अगस्त को पेत्रोग्राद में विद्रोह की योजना बना रहे हैं। 27 अगस्त को फरवरी क्रांति के छह महीने पूरे होने जा रहे थे। करेंस्की की अगुवाई में अस्थायी सरकार ने बोल्शेविकों के खिलाफ़ आतंक की मुहिम छेड़ दी। इसी समय, जनरल कार्निलोव ने पेत्रोग्राद पर हमला करने, सोवियतों को खत्म करने और एक सैन्य तानाशाही की स्थापना करने के लिए सेना की टुकड़ियों को लामबंध किया। यह सब कुछ “पितृभूमि की रक्षा” के नाम पर किया गया।

 

Red Guard detachmentबिजली फैक्ट्री के मजदूरों की लाल सेना की टुकड़ी

बोल्शेविक पार्टी ने प्रतिक्रांति को टक्कर देने के लिए, उसके खिलाफ़ पेत्रोग्राद के मज़दूरों और सैनिकों का एक सक्रिय हथियारबंद प्रतिरोध संगठित किया। मज़दूरों ने भी तुरंत खुद को हथियारों से लैस कर लिया और इस प्रतिरोध के लिए तैयार हो गए। इसकी वजह से लाल सेना की टुकड़ियों को बहुत मजबूती मिली। ट्रेड यूनियनों ने अपने सदस्यों को भी इसके लिये लामबंध किया। पेत्रोग्राद में क्रांतिकारी सैनिक यूनिट भी जंग के लिए तैयार थी। कार्निलोव की टुकड़ियों को शहर में घुसने से रोकने के लिए, पेत्रोग्राद के चारों ओर खाई खोद दी गयी, कंटीली तारों की बाड़ खड़ी कर दी गयी, शहर में आने वाली रेल लाईन को तोड़ दिया गया। पेत्रोग्राद की हिफाज़त करने के लिए हजारों हथियारबंद नौसैनिक भी मज़दूरों और सैनिकों के साथ जुड़ गए। जो सैनिक दस्ते पेत्रोग्राद पर हमले के लिए तैयार किये जा रहे थे, उनसे बातचीत करने के लिए मज़दूरों और सैनिकों का प्रतिनिधिमंडल भेजा गया। जब इन सैनिकों को कार्निलोव की कार्यवाही की असली वजह का पता चला, कि वह क्रांति को कुचलना चाहता है, तो उन सैनिकों ने प्रतिक्रांति में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। हर एक स्थान पर कार्निलोव से जंग लड़ने के लिए क्रांतिकारी समितियां और मुख्यालय बनाये गए। कार्निलोव के हमले को हराने के लिए जनसमुदाय को लामबंध करने के साथ-साथ, बोल्शेविकों ने करेंस्की सरकार के खिलाफ़ अपना संघर्ष लगातार जारी रखा। उन्होंने करेंस्की सरकार, मेंशेविकों और सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरियों का लोगों के सामने पर्दाफाश किया और उनको बताया कि सरमायदारों का समर्थन करने और जंग को जारी रखने की पूरी नीति, दरअसल कार्निलोव के प्रति-क्रांतिकारी विद्रोह की ही सहायता कर रही है।

इन सब कदमों और कार्यवाहियों से, क्रांति के खिलाफ़ कार्निलोव के विद्रोह को कुचल दिया गया।

कार्निलोव के विद्रोह की पराजय से एक ही झटके में क्रांतिकारियों और प्रति-क्रांतिकारियों की शक्तियों का तुलनात्मक अंदाजा हो गया। मेंशेविकों और सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरियों द्वारा साम्राज्यवादी जंग को और लंबा चलाने की नीति का सक्रिय समर्थन और तेज़ी से बिगड़ती आर्थिक मुश्किलों की वजह से जनसमुदाय के बीच उनके बारे में भ्रम पूरी तरह से चकनाचूर हो गए।

कार्निलोव के विद्रोह की पराजय से यह बात भी साबित हो गयी कि बोल्शेविक पार्टी क्रांति की राह पर आगे बढ़ते हुए अब क्रांति की निर्णायक ताक़त बन गयी है। अब वह प्रतिक्रांति की किसी भी कोशिश को कुचलने के क़ाबिल है। कार्निलोव के प्रति-क्रांतिकारी हमले के दौरान, बोल्शेविक पार्टी ने हकीक़त में एक असली सत्ताधारी ताक़त की भूमिका निभाई। मज़दूर और सैनिक उसके निर्देशों पर बिना किसी झिझक के अमल करते थे।

कार्निलोव के विद्रोह की पराजय से यह भी साबित हो गया कि हकीक़त में सोवियतों में क्रांतिकारी प्रतिरोध की विशाल ताक़त है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सोवियतों और उनकी क्रांतिकारी समितियों ने कार्निलोव की सेना के रास्ते को रोक दिया और उसके हमलों को कुचल दिया। जबकि, कार्निलोव विद्रोह से पहले ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे कि सोवियतें खत्म हो गयी हैं।

कार्निलोव के खिलाफ़ संघर्ष ने मज़दूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की सोवियतों में एक नयी जान भर दी, जो अब तक हतोत्साहित थीं। इस संघर्ष से सोवियतें मेंशेविकों और सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरियों की समझौताकारी नीति के प्रभाव से मुक्त हो गयीं। कार्निलोव के खिलाफ़ लड़ाई उनको क्रांतिकारी संघर्ष के खुले रास्ते पर ले आई, और उन्होंने बोल्शेविक पार्टी की ओर रुख़ कर लिया। अब सोवियतों पर बोल्शेविक पार्टी का प्रभाव और भी मजबूत होने लगा, जितना पहले कभी नहीं था।

इसके साथ-साथ किसानों और ग्रामीण जनसमुदाय पर भी बोल्शेविक पार्टी का प्रभाव और ज्यादा मजबूत होने लगा। किसानों का विशाल जनसमुदाय अब यह महसूस करने लगा कि केवल बोल्शेविक पार्टी ही उनको जंग से छुटकारा दिला सकती है। केवल यही पार्टी जमींदारों को कुचलने की क़ाबिलीयत रखती है और जमींदारों से छीनी गयी ज़मीन को किसानों के हाथों में सौंपने को तैयार है। जबरदस्त दमन के बावजूद किसानों ने बड़े जमींदारों की ज़मीनों को हड़पना शुरू कर दिया। अब वे क्रांति की राह पर निकल पड़े थे।

सोवियतों का बोल्शेविकीकरण शुरू हो गया। कारखानों, मिलों और सैनिक टुकड़ियों में नए चुनाव आयोजित किये जाने लगे, मेंशिविकों और सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरियों के प्रतिनिधियों की जगह पर वे बोल्शेविकों के प्रतिनिधियों को चुनकर भेजने लगे। कार्निलोव के खिलाफ़ जीत के अगले ही दिन 31 अगस्त को पेत्रोग्राद सोवियत ने बोल्शेविक पार्टी की नीति का अनुमोदन किया। 5 सितम्बर को मज़दूरों के प्रतिनिधियों की मॉस्को सोवियत, बोल्शेविकों के पक्ष में आ गयी।

बोल्शेविक पार्टी हालात का मूल्यांकन करते हुए, इस नतीजे पर पहुंची कि एक कामयाब क्रांतिकारी विद्रोह के लिए अब परिस्थितियां तैयार हो गयी हैं। “सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में दो!” यह नारा फिर से गूंजने लगा। लेकिन अब इसका यह मतबल नहीं था की सत्ता मेंशिविकों और सोशलिस्ट-रेवोल्यूशनरियों के हाथों में जाएगी, जैसे कि फरवरी क्रांति के दिनों में हुआ था। अब यह नारा अस्थायी सरकार के खिलाफ़ सोवियतों के विद्रोह का ऐलान था, जिसका मकसद था सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में देना, जिसकी अगुवाई अब बोल्शेविक कर रहे थे।

लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने तेज़ी से क्रांति के लिए तैयारी शुरू कर दी। उनके इस संघर्ष में जीत तब हासिल हुई, जब बोल्शेविक पार्टी की अगुवाई में रूस के मज़दूर वर्ग ने 7 नवम्बर, 1917 को रूस से सरमायदारों की सत्ता का सफलतापूर्वक तख्ता पलट कर दिया और दुनिया में पहली श्रमजीवियों की हुकूमशाही पर आधारित राज्य सत्ता की स्थापना की।    

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अक्टूबर क्रांति    October Revolution    Aug 16-31 2017    Voice of the Party    History    2017   

पार्टी के दस्तावेज

8 Jan General Strike

Call of the Mazdoor Ekta Committee

The all India general strike has been called to resolutely oppose the course of enriching the capitalist minority by impoverishing the toiling majority. It has been called to assert the rights that belong to workers, peasants and other toiling people who create the wealth of India.

Hum Hain Iske Malik! Hindostan Humara!

Election manifesto of a CGPI supported candidate for Lok SabhaParties of the capitalist class claim that there is no alternative to the program of globalisation,liberalisation and privatisation. The truth is that there IS an alternative.The alternative is to reorient the economy to fulfil people’s needs instead of fulfilling capitalist greed. This is the program for the Navnirman of India.

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5th Congress DocumentThe Report to the Fifth Congress of the Communist Ghadar Party of India, presented by Comrade Lal Singh, General Secretary of the CGPI, on behalf of its Central Committee, was discussed and adopted by the Fifth Congress of the CGPI, held in November 2016. By decision of the Fifth Congress, this report has been edited for publication.

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Click to Download PDFThe first part of this pamphlet is an analysis of facts and phenomena to identify and expose the real aims behind the Note Ban. The second part is devoted to a critical appraisal of the government’s claims that it will reduce inequality, corruption and terrorism. The third part is what Communist Ghadar Party believes is the real solution to these problems and the immediate program of action towards that solution.

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These Elections are a FarceInterview with Comrade Lal Singh, General Secretary of Communist Ghadar Party of India by Comrade Chandra Bhan, Editor of Mazdoor Ekta Lehar

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Manifesto 2014Unite around the program to reconstitute the Indian Republic and reorient the economy to ensure prosperity and protection for all!

There is growing realisation among workers, peasants and other self-employed people that the program of liberalisation and privatisation only serves to enrich an exploiting minority at their expense. Mass resistance is growing to this anti-worker, anti-peasant and anti-national program.

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